मंगलवार, 5 मार्च 2013

शापित सुनार

हर ह्रदय विदारित तार-तार
संवेदन सरिता स्फुटित थार
बह चली कूल दोनों नकार
दामिनि दामन सुन चीत्कार।
 
सभ्यता हो चली शर्मसार
आवरण गया देह को डकार
उबला अबला जबरन विकार
तामस में कुचली ज्योति नार।
 
'हा-हा-हा-हा' कानों के द्वार
कोमल कातर स्वर की कतार
आती टकराती बार-बार
आखेटक मन करता शिकार।
 
हर ओर न्याय को हो गुहार
अनुत्तरित प्रश्न दहलीज पार
कंधों पर किसके न्याय भार
हावी लुहार शापित सुनार!!!
 
 
[व्यापक जन-जागृति की उत्प्रेरक बनी 'बहिन ज्योति पाण्डेय' को भावाञ्ज्ली]
 

शनिवार, 2 मार्च 2013

चिंतन की रस यात्रा

"एक बार काव्य-साधना के समय सहसा मेरा चिंतन साहित्यिक रसों के पथ पर निकल पड़ा। समस्त रसों को 'काम' की तीव्रता के आधार पर विभाजित करके समझने लगा। पहले पहल अतिकाम, मध्यकाम, और शून्यकाम करके सभी रसों को इन श्रेणियों में रखा। फिर श्रेणियों के नाम बदलकर उसे फिर से विभाजित किया। .... अद्भुत आनंद मिला।"
 
जब कोई काव्य-साधक नया चिंतन करता है तो वह मन में उपजे स्थायी-अस्थायी भावों को कुछ कक्षाओं में अनुशासित करने का खेल खेलता है। आने वाले समय में यदि काव्य-अभ्यासियों और काव्य-रसिकों को वह रुचता है तो वे उसके ज्ञात-अज्ञात रूप से प्रचारक हो जाते हैं।

'काव्यशास्त्र की शिक्षा वर्तमान समय में अपनी महत्ता कैसे स्थापित करे?' – इस चिंता से कई विद्वान् और विदूषियाँ अपने-अपने प्रयास ज़ारी रखे हुए हैं। कुछ काव्यशास्त्र पर अच्छी कक्षाएँ दे रहे हैं तो कुछ उत्कृष्ट काव्य-लेखन कर रहे हैं। सभी के प्रयासों से काव्य की समृद्ध परम्परा चलायमान है।
एक सुबह जिस चिंतन ने 'कलम' खिलौना लेकर खेल आरम्भ किया उस 'चिंतन-क्रीड़ा' में आप भी सम्मिलित हो सकते हैं :
पहले पहल कलम ने पाला खींचा :
अति काम — जिसमें शृंगार, हास्य, अद्भुत नाम के फुर्तीले खिलाड़ी खड़े किये।
मध्य काम — जिसमें वीर, करुण, वात्सल्य नाम के शारीरिक सौष्ठव वाले खिलाड़ी खड़े किये।
शून्य काम — जिसमें शांत, वीभत्स, रौद्र, भयानक नाम के खिलाड़ी रह गए जो हार-जीत की चिंता से मुक्त दिख रहे थे।
पाला खींचने के बाद संतोष नहीं हुआ। चिंतन ने खींचे हुए पाले को नए नाम दिए :
द्रुत काम — जिसमें खिलाड़ी वही थे -- शृंगार, हास्य, अद्भुत
श्लथ काम — जिसमें खिलाड़ी वही थे -- वीर, करुण, वात्सल्य
अकाम — जिसके दो उपभाग किये -- निष्काम / दुष्काम
  • निष्काम में – शांत को खड़ा किया
  • दुष्काम में – वीभत्स, रौद्र, भयानक (दूसरे उपभाग में) खड़े हो गए।
शृंगार — अति, मध्य, मंद 
अति शृंगार : संयोग (निःशब्द रति-व्यापार) / वियोग (प्रसुप्त विरह-ज्वार)
मध्य शृंगार : संयोग (आकर्षण, परस्पर वार्तालाप, सानिध्य) / वियोग (सुखद स्मृतियाँ, दुखदायी परदेशगमन, मान, पूर्वराग)
मंद शृंगार : संयोग (साक्षात शब्द संवाद, चाहना) / वियोग (कथन मात्र, कविताई)
हास्य — प्रौढ़, युवा, बाल
प्रौढ़ : अट्टहास, अपहसित, अतिहसित
युवा : हसित (खिलखिलाहट), विहसित (परिहासात्मक हँसी)
बाल : सुस्मित (मुस्कान)
करुण — आभ्यंतर, बाह्य
आभ्यंतर : मानसिक वेदना से उपजा कातर स्वर
बाह्य : शारीरिक वेदना से उपजी कराह
अद्भुत* — विश्वसनीय, अविश्वसनीय, कपटपूर्ण ... [इस पर कभी और क्रीड़ा रचेंगे]
वीर* — उदात्त, ललित, प्रशांत, उद्धत या, युद्धवीर, कर्मवीर, धर्मवीर, दानवीर  [शास्त्रोक्त]  
वात्सल्य — प्रौढ़, युवा, बाल
प्रौढ़ : माता-पिता (अभिभावक) का अपने बच्चों से
युवा : प्रत्येक बड़े का प्रत्येक छोटे से, प्रत्येक सबल का प्रत्येक निर्बल से, प्रत्येक सक्षम का प्रत्येक असहाय से
बाल : जीवों से वस्तुओं से और स्थान से।
शांत
लक्ष्य साध्य (अर्थ मौन) : विपरीत स्थिति में प्रतिक्रिया भाव, ज्ञानपरक तप, वैराग्य भाव युक्त ऋषि-मुनियों की साधना
अलक्ष्य साध्य (व्यर्थ मौन) : प्रतिक्रियाहीनता, उदासीनता, तटस्थता
वीभत्स
क्षोभज (शुद्ध) : पापी (अपराधी) से घृणा, रुधिर आदि से उत्पन्न घृणा, सुन्दरी के उरु-उरोजों के प्रति वैराग्य
उद्वेगी (अशुद्ध) : पाप (अपराध) से घृणा, कृमि विष्ठा, शव आदि से उत्पन्न घृणा।
रौद्र —
अत्यंत क्रोध : विनाश भाव (अनिष्ट), पूर्णतया समाप्त कर देने की इच्छा
क्षीण क्रोध : क्षत-विक्षत करने का भाव, चोट या घात करने की इच्छा
भयानक —
जड़ भय : स्तब्ध रह जाना, स्थिर रह जाना, अवाक रह जाना, कंठावरुद्ध होना
चेतन भय : कम्पन होना, भागना-दौड़ना, सुरक्षा के लिए चीख-पुकार करना, हकलाना, छिपते फिरना, सामने न आना, नज़रें नीची कर लेना, विपरीत कार्य करने लगना।
इस चर्चा का उद्देश्य है –
विद्वान् साथियों और गुरुओं को विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करना, गुरुओं का मार्गदर्शन लेना।

मेरा यह अनुभव है अपरिपक्व चिंतन तभी पुष्ट होता है –
जब उसमें सुधार के अवसर खुले हों।
आलोचना के लिए सम्मान भाव हो।
विरोधियों का भी स्वागत हो।

[*तारांकित रसों पर मन-मुताबिक़ क्रीड़ा की फिर कभी छूट लूँगा।]

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

वासंतिक मान

प्रथम बार
था मौन संयमित
कोकिल का कल गान
संभवतः कर रहा
पिकानद आने का अपमान।
 
अंधकार
छिपकर भी विचलित
खोता था पहचान
उषा-सुंदरी आयी
करता अंगहीन प्रस्थान।
 
शयन-कक्ष
में रमणी व्याकुल
करने को वपु-दान
पर प्रियतम से कर बैठी थी
वह पहले ही मान।
 
कोप-भवन
से निकल कोकिले!
पंचम स्वर आलाप
मान मिटे रमणी आवे
पी आलिंगन में आप।

सोमवार, 28 जनवरी 2013

दुःस्वप्न

निशा आधी नग्न होकर
मेरी शैया के किनारे
आई सुधा-मग्न होकर
लिए नयनों में नज़ारे।
 
आँख के तारे नचाकर
अनुराग से पाणि बढ़ाकर
कर लिया मेरा आलिंगन
बिन हया ही मुस्कुराकर।
 
मैं विमर्ष से निशीथ में
निस्पंद, नीरव नेह को
किस तरह कर दूँ निराहत?
विदग्ध तृषित देह को।
 
श्वास में मिलती मलय-सी
अनिल, तन से फूटती है
कर रही मदमत्त मुझको
प्यार पाकर झूमती है।
 
श्याम अंबर चीर देखा
दीपिका ने क्रोध से तब
निशा भागी, निमिष मुकुलित
किये मैंने, लाल था नभ।

रविवार, 13 जनवरी 2013

सच कहता हूँ...

सच कहता हूँ, सच कहता हूँ
अकसर तो मैं चुप रहता हूँ
तन मन पर पड़ती मारों को
बिला वजह सहता रहता हूँ .... सच कहता हूँ।
 
वर्षों से जो जमा हुआ था
जो प्रवाह हृत थमा हुआ था
आज नियंत्रित करके उसको
धार साथ में खुद बहता हूँ ... सच कहता हूँ।
 
इस दृष्टि में दोष नहीं था
भावुकता में होश नहीं था
खुद को दण्डित करने को अब
धूर्तराज खुद को कहता हूँ ... सच कहता हूँ।

___________________

कंठ शीत ने बिगाड़ दिया है। अन्यथा सस्वर प्रायश्चित करता!!

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

तुम नक़ल, वो है असल 'आह'

 
ओ चन्द्रमा - सम प्रियतमा 
कै से क रूँ - तुम को क्षमा
है क्या मिला - जीवन जला 
तुम हो प र न्तु है अमा।
ओ चन्द्रमा ...
 
मे रा प रा जि त प्रेम है 
उस पर बिगड़ता क्षेम है 
तुम व्यर्थ शीतलता धनी 
तन राख से उड़ता धुँआ।
ओ चन्द्रमा ...
 
हूँ देखता तुमको निरंतर 
नयन चल पाते कहाँ 
है दैव को स्वीकार कैसा
तुम वहाँ और मैं यहाँ।
ओ चन्द्रमा ...
 
वे दिन पुराने याद आते 
जागते जब थे निशा
होकर निशाचर घूमते 
था जीव तुझसे ही थमा।
ओ चन्द्रमा ...
 
ते रे द र्श न में मु झे 
मिलती रही पिय बेपनाह 
फिर भी कसक बाक़ी रही 
तुम नक़ल, वो है असल 'आह'
ओ चन्द्रमा ...


 
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अब से काव्य का सस्वर पाठ कर सकूँगा। कविता को पाठक अपनी रुचि अनुसार विलंबित, मध्यम या द्रुत गति से पढ़ता है। इसमें कवि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। जो पारंगत कवि होते हैं वे अपने शब्दों की बुनावट वैसी ही रखते हैं जैसी वे चाहते हैं। अर्थात उनकी चयनित शब्दावली गति की ओर स्वतः धकेल देती है। इसका अर्थ ये हुआ कि कविता में निहित 'गीति' शब्दों पर निर्भर है।
 
मेरे ब्लॉग का दूसरा युग 'सस्वर' आरम्भ हो रहा है। इस नवीनता को अपनाने में मेरे सहयोगी रहे हैं : अर्चना चावजी जी और संजय अनेजा जी। मैं कृतज्ञ भाव से उनका आभार व्यक्त करता हूँ।
 

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

'नमस्ते ...भैया!'

एक राह में
बार-बार मिलने से
मैं परच गया उससे।
 
चाहा बात करूँ उससे
परिचय से
स्नेह हुआ जिससे।
 
एक बार मैं
असमंजस में था
कि क्या बात करूँ मिलने पर।
 
सहसा वह
बोल पड़ी मुझसे - 'भैया'
'कहाँ खोये रहते हो, शरम से कुछ न कहते हो।'
 
चाल रोक कर
उन शब्दों का
जिनमें मिला हुआ था स्नेह सुधा-सा
- श्रवण कर लिया
- 'भैया' शब्द स्वीकार कर लिया
सहसा मुख से शब्द निकल गया 'बहना !'
 
बार-बार फिर
जब भी मिलते
हँसते, फिर भी बात न करते
वह थोड़ा रुकती चलते-चलते
शरम से कर देती झुक कर 'नमस्ते ...भैया!'
 

सोमवार, 12 नवंबर 2012

स्मृति-दीप

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
जला रहा हूँ आपके* बहाने  कुछ स्मृति-दीप ...
 

"चलो किसी बहाने सही
आप आये तो मिलने 'मुझसे'
-- ये भ्रम पाल रहा हूँ।"

"फिर से अपना परिचय मुझको
दे दो तो 'मैं जानूँ'
-- मानो कि भूल गया हूँ।"
 
"फिर वही बाल छवि कवि को तुम
दिखला दो तो 'दे दूँ सब'
-- ना समझो टाल रहा हूँ।"
 
"है ही क्या सोचोगे तुम 
देने को मुझपर 'तुमको'
-- तुमसे ही माँग रहा हूँ।"
 
"दे दो मुझको फिर शब्द वही 
जो बोला करते 'गुपचुप'
-- विनती कर माँग रहा हूँ।''
 
"ना जाने कौन तृप्ति होती है
इससे मेरे मन की
-- फिर फिर फिर माँग रहा हूँ।"
 
"हो प्रथम आप जिससे 'भैया' का
शब्द सुना ऐसा जो
-- कविता को प्राप्त हुआ हूँ।"

"गुड़िया आयी, चली गयी
है दण्ड सही - ईश्वर का
-- मन ही मन भोग रहा हूँ।"
 
"फिर चाह एक 'अमृता' बनी
उससे भी मैं ना हुआ धनी
-- अंतर्मन सुला रहा हूँ।"
 
"है मोह नहीं छूटता अभी
अब इंतज़ार है कल का
-- 'अमिलन' अभ्यास डाल रहा हूँ।"

"जाओ जल्दी से समझ
विज्ञान हमारे मन का
-- 'अवली' दीपक लगा रहा हूँ।"


*आपके = अमृता बिटिया

बुधवार, 7 नवंबर 2012

अब्धि-हार

उर्मि लालिमा की लाली से
माँग भर रही है सिन्दूर।
आशा ले उर मिला सकेगी
सागर से, तम में भरपूर।
पर सागर विधु से लड़ने को
सजा रहा है ज्वाला-शूल।
छिपा लिया खुद को उसने पर
नभ की ओर उड़ाकर धूल।
चला चाँद चुपचाप चरण धर
नभ पर, हँसकर धीरे-धीरे।
भेद दिया तम धूल सभी को
चंद बाण से सागर-तीरे।
उद्वेलन हो उठा ह्रदय में
सागर ने कर दिया प्रहार।
था वेश पूर्ण आवेश भरा
पर हुई अंत में अब्धि-हार।
 
___
शब्दार्थ :
उर्मि = लहर, तरंग,
उर = ह्रदय,
विधु = चन्द्रमा,
ज्वाला-शूल = ज्वारों रूपी भाले,
धूल = धुंध,
उद्वेलन = क्रोध से भड़कना,
आवेश = क्रोध,
अब्धि-हार =सागर की पराजय

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

'नो''दो' ग्यारह हुआ हास

'दो''नो' का है प्रेम यही वे ग्यारह नहीं कभी हो पाये।
'नो''दो' ग्यारह हुआ हास जब उसने उनके मुख पलटाये।
अर्थ हुआ असमर्थ गर्त में गिरा व्यर्थ ही हाय-हाय।
मुहावरे का पहन मुखौटा हास हुआ हास्यास्पद काय।
किया बहुत प्रयास किन्तु कुछ, तुमसे सीधा कह ना पाये।
इसीलिए सब कुछ कहने का करता मन है नये उपाय।
कभी हास के पीछे छिपकर कभी व्यंग्य का गला दबाय।
तरह-तरह की वक्र उक्ति को करता रहता दाएँ-बाएँ।
मन पर बढ़ता बोझ उभरतीं माथे पर चिंता रेखायें।
सरल भाव को तरल पात्र में मेरे प्रियतम पी ना पायें!!


ग्यारह - साथ

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

कौमुदी !

अय उद्यान की प्रिये !
बैठ आ मधु पियें !!
प्रेम से दो पल जियें !
कौमुदी, कर दीजिये।।
 
आइये इत आइये !
उर-पुष्प बैठ जाइये !!
तनु पंख खोल दीजिये !
तुम वक्ष के, मेरे लिए।।
 
निहार लूँ, मैं दृष्टि से
सौन्दर्य देह-यष्टि का।
मैं सदा-सदा के लिये
फिर बाँध लूँगा मुष्टिका।।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

छंदशाला में आवेदन

श्लिष्ट वक्रोक्ति :
उलट-पलट कर भाव ने, लिया अंत संन्यास।   
छंद शर्त को मान के, सिकुड़े शैली* व्यास*।।

करुण हास्य [ठेस] :
प्रतियोगी बन आ गये, हम कविता के देस।
अब ना जाने क्या मिले, ठाले बैठे ठेस।।

काम्य भक्ति [आशा] :
'रविकर' से दोहे रचूँ, 'स्वर्णकार' से शेर।
मद 'नवीन' से छंद का, होगा देर-सबेर।।

चातकी शृंगार [सुन्दरता] :
मन की सुन्दरता छिपी, तन के भीतर जाय।
खोज करूँ अनुमान से, नित टकटकी लगाय।।

प्रतिक्रियात्मक दोहा :
पहलवान भी जानता, मिट्टी की सौंधास।
नित्य अखाड़े में करे, कुश्ती के अभ्यास।।


[27-09-2012]

सोमवार, 17 सितंबर 2012

मीत-पिता

ओ मीत पिता, दो मुझे बता
क्या दोष प्रीत में है मेरे?
क्यूँ नहीं पास आने देते
सविता को, अब भी घन घेरे.
मन मीत कल्पनाओं में आ
लिख देती हृत पर प्रेम-लेख.
फिर हृदय चुरा लेती मेरा
वह प्रेम लेख न सकूँ देख.
प्रतिकार आपसे लूँगा मैं
करवा तुमको अपराध-बोध.
मेरे औ' मेरे मीत बीच
शंका करके क्यूँ किया शोध?
कामुक कराल कहकर तुमने
मुझपर डाली है पंक-छींट.
उस पर भी हैं कुछ छींट गये
जो था श्रद्धा का हृत-किरीट.
शललित वचनों की शरशय्या
जिस पर लेटा हूँ निरपराध.
शश दे तुमने अपमान किया
मेरे यश में बन गया बाध.
मैं खुद को दंडित करने की
लेता हूँ निष्ठुर आज़ शपथ
मेरी पावनता बनी रहे
तुम भी हो जावोगे अवगत.
हीनोडुराज अम्बर तल में
शश पाकर भी ना हुआ हीन.
शोभा शशीश बनकर सर की
अस्थिर यश को भी किया पीन.
हूँ तोड़ रहा संबंध मीत
जोडूँगा अब संबंध मौन.
उदघाटित भी होगा तो तुम
पाओगे बस 'बहना' अमौन.
 

शनिवार, 1 सितंबर 2012

प्रियंवदा-प्रवास पर

तू ही मेरा मधुमेह है
तू ही मेरा अस्थमा
तू ही है पीलिया पियारी
तू ही नज़ला प्रियतमा.
 
तुममें जितनी भी मिठास थी
मैंने पूरी पान करी
हृदय खोलकर सुन्दरता भी
तुमने मुझको दान करी.
 
स्पर्श तुम्हारा मनोवेग को
शनैः शनैः उकसा देता
उस पर शीतल आलिंगन फिर
स्नेह वर्षण करवा लेता.
 
तुम हो नहीं, इसी से अब तो
समय-असमय खाता हूँ
हलक सूखता, श्वास उखड़ता
हृदय-काम ढुलकाता हूँ.
 
जितनी भी शर्करा आपसे
समय-समय पर पान करी
निकल रही निज संवादों में
श्वास तप्त के साथ अरी!
 
 

सोमवार, 27 अगस्त 2012

कविता

पहली बार जब आईं तुम
मेरी जिह्वा अपरिचित थी.
ना बैठाया मैंने तुमको
ना जाना था तुम जीवन हो.
 
पय पीकर भी तरसते थे
पीने को स्नेह-नीर अधर.
तुम अधरों तक आईं किन्तु
मैंने अज्ञ बन विदा किया.
 
तुम मेरे सह हँसी खेली
मुझको निज मीत बनाकर
लोय-लोर शैशव के तुमने
सुखा दिये लोरी गाकर.
 
वय-संधि में अचानक ही
तुम भूल गईं लोरी गाना.
चंचल बन तुमने शुरू किया
मुझे प्रेम-गीत सुनाना.
 
 

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

आपका नाम

द्वार पर शुक बैठा-बैठा
राम का नाम लिया करता.

दिया था जो तुमने उपहार
वही है उसका कारागार
बद्ध करना उसका विस्तार
कहाँ तक किया उचित व्यवहार.

द्वार पर शुक बैठा-बैठा
काल की बाट जुहा करता.

रूठता प्राणों से पवमान
देह जाने को है श्मसान
आपका बहुत किया सम्मान
नेह का होता है अवसान.

द्वार पर शुक बैठा-बैठा
आपको कोसा है करता.

किया जब मैंने उसको मुक्त
जगा जैसे युग से हो सुप्त
किया मेरा उसने जयनाद
द्वार पर स्वयं हुआ नियुक्त.

द्वार पर शुक बैठा-बैठा
आपका नाम लिया करता.

शनिवार, 4 अगस्त 2012

न्यायकारी की भेद दृष्टि

ओ न्यायकारि परमेश्वर !
तू न्याय एक सा तो कर
उर्वरा और ऊसर पर
वर्षण करके न चुपकर!!

उर्वरा पे है हरियाली
ऊसर की गोदी खाली
ये न्याय तुम्हारा कैसा!
दोनों के तुम हो माली!!

ये भेद दृष्टि अनुचित है
ऊसर में भी संचित है
अंकुरित करन की इच्छा
पर रोध हुआ किञ्चित है.

कैसे भी उसे हटाओ
तुम जिस भी रस्ते आओ
मैं तुझे पा सकूँ ईश्वर!
कुछ चमत्कार दिखलाओ!!

______________

न्यायकारि = न्यायकारी

शनिवार, 28 जुलाई 2012

दिक् शूल

सोम-शनि है प्राची प्रतिकूल
दिवस रवि का उसके अनुकूल.
प्रतीची में मंगल-बुध जाव
शुक्र-रवि में होवें दिकशूल.
उदीची में बुध-मंगल भार
शुक्र शुभ होता शुभ गुरुवार.
अवाची को जाना शनि-सोम
गुरु को चलना शकुन-विलोम.
______________
उदीची - उत्तर दिशा
अवाची - दक्षिण दिशा
प्राची - पूर्व दिशा
प्रतीची - पश्चिम दिशा
मैं इस कविता को देना नहीं चाहता था.... क्योंकि अब मैं इस विचारधारा से बिलकुल सहमत नहीं हूँ कि 'दिकशूल' जैसा कुछ होता है.... ये कोरा अंधविश्वास है... जब ये रचना बनायी थी. तब मैं दिकशूल से बहुत प्रभावित रहता था.

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

तुम पुष्प भाँति मुस्कान लिये

तुम धरा धीर धारो बेशक 
बदले में ना कुछ चाह करो. 
ये धरा सहिष्णु स्वभावी 
केवल स्व-गुण प्रवाह करो. 

तुम रहो पपीहे-सी प्यासी 
बदले में ना कुछ आह करो. 
ये बहुत अधिक स्वाभिमानी  
वारिवाह की ना वाह करो. 

तुम करो स्वयं को रजनीगंध 
बदले में ना अवगाह करो. 
ये गंध देखती नहीं अमा, 
राका की अब ना राह करो. 

जीवन-कागज़ कोरा कर लो 
तो उसको जबरन नहीं भरो. 
यदि ज्ञान-बूँद की भाँति बनो 
तो एकाधिक मन शुक्ति करो. 

चिड़ियों-सा चहको मन-आँगन 
आखेटक दृग से नहीं डरो. 
यदि निद्रा में लेना सपना, 
तो भोर-नींद की चाह करो. 

[आलोकिता जी के लिए लिखी कविता जो मेरे संग्रह से छिटकी पड़ी थी। आज शामिल कर रहा हूँ ]