यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
विपरीत से तुम सीध में आओ
विपरीत से तुम सीध में आओ.
अरी! पीठ न तुम मुझको दिखाओ.
मैं तुम्हें बिन देखकर पहचान लेता हूँ.
कल्पना से मैं नयन का काम लेता हूँ.
एक बार फिर कवि से आँख मिलाओ.
अयि! मुझे तुम नेह का फिर गीत सुनाओ.
कल्पना-विमान फिर से भेज देता हूँ.
"कंठ में आना" — तुम्हें सन्देश देता हूँ.
कल्पना-विमान पर तुम बैठ आ जाओ.
अयि! प्रिय कविते! कवि ह्रदय में बस जाओ.
जिह्व का आसन तुम्हें उपहार देता हूँ.
बस प्रिये! मैं आपसे रस-प्यार लेता हूँ.
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
परिवर्तन है या पतन-परा?
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा.
निर्लज लज्जा लुटने को थी
मैं देख रहा था खड़ा-खड़ा.
आँखों में आँसू नहीं कहीं
था उनमें इक आश्चर्य भरा.
आ रही स्वयं लज्जा लुटने
परिवर्तन है या पतन-परा?
आँखें मरने को हैं तत्पर
इक शील-भंग की घटना पर.
जो रहीं अभी तक मर्यादित
इक भूल हुई धोखा खाकर.
इक सुन्दर पुरुष देख मैंने
दूरी पर खड़े हुए सोचा.
क्या सुन्दरता पायी इसने
क्या वक्षस्थल पाया चौड़ा.
आया समीप दर्शन करने
'छाती खोलो, देखूँ' कहने.
था भेष पुरुष, नारी उसमें
हा! बड़ अपराध किया मैंने.
वो हँसी देख मेरी हालत
बोली — 'परिवर्तन जीवन है,
तुम अभी तलक अनजान रहे
बेकार तुम्हारा यौवन है."
सचमुच पाया मैंने खुद को
अपराधी मूरख बहुत बड़ा.
दण्डित आँखों को करूँ फोड़,
या करूँ ह्रदय को और कड़ा.
लज्जा परिभाषा बदल गयी
बदली नारी की परिभाषा
अब समझ नहीं आती मुझको
लज्जा की मौनमयी भाषा.
जब परिवर्तन ही जीवन है
तो बदले क्यूँ ना परिभाषा.
मंडूक-कूप मन यथारूप
की लगा रहा अब भी आशा.
[इसमें एक नूतन अलंकार "श्येन भ्रम अलंकार" है, व्याखा और परिभाषा वर्ष-दो वर्ष बाद एक नए ब्लॉग "काव्य-प्रतुल" में दिए जायेंगे. तब तक नवीन अलंकारों का रसास्वादन करने के लिए आपको थोड़े दिवसों के अंतराल पर नवीन रचनाओं को दिया जाएगा. आप टिप्पणी देखर मेरा प्रोत्साहन बढ़ा सकते हैं. मुझे तो यह भी पता नहीं कि इस ब्लॉग को कोई पढता है या नहीं.]
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा.
निर्लज लज्जा लुटने को थी
मैं देख रहा था खड़ा-खड़ा.
आँखों में आँसू नहीं कहीं
था उनमें इक आश्चर्य भरा.
आ रही स्वयं लज्जा लुटने
परिवर्तन है या पतन-परा?
आँखें मरने को हैं तत्पर
इक शील-भंग की घटना पर.
जो रहीं अभी तक मर्यादित
इक भूल हुई धोखा खाकर.
इक सुन्दर पुरुष देख मैंने
दूरी पर खड़े हुए सोचा.
क्या सुन्दरता पायी इसने
क्या वक्षस्थल पाया चौड़ा.
आया समीप दर्शन करने
'छाती खोलो, देखूँ' कहने.
था भेष पुरुष, नारी उसमें
हा! बड़ अपराध किया मैंने.
वो हँसी देख मेरी हालत
बोली — 'परिवर्तन जीवन है,
तुम अभी तलक अनजान रहे
बेकार तुम्हारा यौवन है."
सचमुच पाया मैंने खुद को
अपराधी मूरख बहुत बड़ा.
दण्डित आँखों को करूँ फोड़,
या करूँ ह्रदय को और कड़ा.
लज्जा परिभाषा बदल गयी
बदली नारी की परिभाषा
अब समझ नहीं आती मुझको
लज्जा की मौनमयी भाषा.
जब परिवर्तन ही जीवन है
तो बदले क्यूँ ना परिभाषा.
मंडूक-कूप मन यथारूप
की लगा रहा अब भी आशा.
[इसमें एक नूतन अलंकार "श्येन भ्रम अलंकार" है, व्याखा और परिभाषा वर्ष-दो वर्ष बाद एक नए ब्लॉग "काव्य-प्रतुल" में दिए जायेंगे. तब तक नवीन अलंकारों का रसास्वादन करने के लिए आपको थोड़े दिवसों के अंतराल पर नवीन रचनाओं को दिया जाएगा. आप टिप्पणी देखर मेरा प्रोत्साहन बढ़ा सकते हैं. मुझे तो यह भी पता नहीं कि इस ब्लॉग को कोई पढता है या नहीं.]
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
उडाओ ना समीर में रेत
अरी! तू सुन्दरता में छिपी, छ्लेगी कब तक ऐसे ही.
कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.
करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग.
छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग.
केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा.
जिसे सहलाया करता पवन, उसे तुम समझे रहा 'पटा'.
दिया जिसने तुमको निज नेह, उसी पर करती हो संदेह.
पवन तो रहता सबके साथ, नहीं तन है उसका ना गेह.
नहीं तुमने जाना कुछ भेद, पवन-प्राणों में किया अभेद.
प्राण हर कर पावोगी पवन, आपकी भूल, मुझे है खेद.
श्याम मन से ऊपर से श्वेत, अरी ओ घटा आज तो चेत.
करो ना मर्यादा को भंग, उडाओ ना समीर में रेत.
कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.
करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग.
छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग.
केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा.
जिसे सहलाया करता पवन, उसे तुम समझे रहा 'पटा'.
दिया जिसने तुमको निज नेह, उसी पर करती हो संदेह.
पवन तो रहता सबके साथ, नहीं तन है उसका ना गेह.
नहीं तुमने जाना कुछ भेद, पवन-प्राणों में किया अभेद.
प्राण हर कर पावोगी पवन, आपकी भूल, मुझे है खेद.
श्याम मन से ऊपर से श्वेत, अरी ओ घटा आज तो चेत.
करो ना मर्यादा को भंग, उडाओ ना समीर में रेत.
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010
कुम्भ का मेला
सभी स्वच्छ पथ उर के मेरे
अब चलो आप निर्भय होकर
सब तरफ आज घेरेंगी, पिय
कष्टों की टोली 'हो'...'हो' कर.
छिप गयीं आप क्यूँ घबराकर
मेला है ये तो कुम्भ, मकर
राशि में मिलने अब गुरु से
आना चाहे है बस दिनकर.
चख-बाण छोड़ दो तुम धनु से
मन के तापों का हरण करो
सब कष्ट निवारण हो जाएँ
ओ कन्या! कवि को वरण करो.
अब चलो आप निर्भय होकर
सब तरफ आज घेरेंगी, पिय
कष्टों की टोली 'हो'...'हो' कर.
छिप गयीं आप क्यूँ घबराकर
मेला है ये तो कुम्भ, मकर
राशि में मिलने अब गुरु से
आना चाहे है बस दिनकर.
चख-बाण छोड़ दो तुम धनु से
मन के तापों का हरण करो
सब कष्ट निवारण हो जाएँ
ओ कन्या! कवि को वरण करो.
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
स्वीकार
मुझसे तुम घृणा करो चाहे
चाहे अपशब्द कहो जितने
मैं मौन रहूँ, स्वीकार करूँ.
तुम दो जो तुमसे सके बने.
मुझपर तो श्रद्धा बची शेष.
बदले में करता वही पेश.
छोडो अथवा स्वीकार करो.
चाहे अपनत्व का करो लेश.
चाहे अपशब्द कहो जितने
मैं मौन रहूँ, स्वीकार करूँ.
तुम दो जो तुमसे सके बने.
मुझपर तो श्रद्धा बची शेष.
बदले में करता वही पेश.
छोडो अथवा स्वीकार करो.
चाहे अपनत्व का करो लेश.
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
मान्यताओं को बदलने का साहस मुझमें नहीं!
निद्रा — मेरा असमय आना द्वारपाल के लिए बुरा है. मेरा अधिक आना विद्यार्थी के लिए दोष है, ब्रह्मचर्य का नाशक है. मेरा कम आना रोगी के लिए दुःखदायक है. किन्तु, मेरा शैशव के प्रति स्नेह सभी को भाता है. क्यों? क्या मैं मात्र शिशुओं के प्रेम की अधिकारिणी हूँ? क्या मैं मैं किसी पवित्र ह्रदय वाले स्वस्थ पुरुष से प्रेमिकावत प्रेम ना पा सकूंगी?
नेपथ्य से आवाज — अवश्य पा सकोगी देवि!
निद्रा — तुम कौन?
नेपथ से आवाज — मैं स्वप्न. तुम्हारी इस अकस्मात् चिंता का कारण, देवि! क्या मेरा प्रेम आपको पर्याप्त नहीं या मेरे प्रेम पर तुम्हें संदेह है?
निद्रा — निःसंदेह तुम मुझसे प्रेम करते हो. किन्तु...
स्वप्न — 'किन्तु' क्या? निद्रे!
निद्रा — हे स्वप्न! तुम अमैथुनीय सृष्टि का एक सुन्दर उदाहरण हो. पर लोगों की मान्यता को बदलने कि मुझमें सामर्थ्य नहीं. लोग आज भी तुम्हें मेरे द्वारा उत्पन्न मानते हैं.
(किसी की भी मान्यताओं को बदलना सहज नहीं.)
नेपथ्य से आवाज — अवश्य पा सकोगी देवि!
निद्रा — तुम कौन?
नेपथ से आवाज — मैं स्वप्न. तुम्हारी इस अकस्मात् चिंता का कारण, देवि! क्या मेरा प्रेम आपको पर्याप्त नहीं या मेरे प्रेम पर तुम्हें संदेह है?
निद्रा — निःसंदेह तुम मुझसे प्रेम करते हो. किन्तु...
स्वप्न — 'किन्तु' क्या? निद्रे!
निद्रा — हे स्वप्न! तुम अमैथुनीय सृष्टि का एक सुन्दर उदाहरण हो. पर लोगों की मान्यता को बदलने कि मुझमें सामर्थ्य नहीं. लोग आज भी तुम्हें मेरे द्वारा उत्पन्न मानते हैं.
(किसी की भी मान्यताओं को बदलना सहज नहीं.)
रविवार, 4 अप्रैल 2010
विचित्र बात
हे अज्ञातयौवना !
मैं बन गया महात्मा.
पर छूटते ही जा रहे, किस ओर से ये बाण हैं.
कितनी विचित्र बात है, कितनी विचित्र बात है.
इधर तुणीर रिक्त है.
उस ओर का भी रिक्त है.
पर क्या चला, किसको लगा
और कब चला, किस पर चला?
— यह पूछने की बात है.
इसमें किसी का हाथ है.
या फिर,
यूँ ही बात है!!
मैं बन गया महात्मा.
पर छूटते ही जा रहे, किस ओर से ये बाण हैं.
कितनी विचित्र बात है, कितनी विचित्र बात है.
इधर तुणीर रिक्त है.
उस ओर का भी रिक्त है.
पर क्या चला, किसको लगा
और कब चला, किस पर चला?
— यह पूछने की बात है.
इसमें किसी का हाथ है.
या फिर,
यूँ ही बात है!!
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