यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
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शुक्रवार, 11 जनवरी 2013
शनिवार, 1 दिसंबर 2012
तुम नक़ल, वो है असल 'आह'
कै से क रूँ - तुम को क्षमा
है क्या मिला - जीवन जला
तुम हो प र न्तु है अमा।
ओ चन्द्रमा ...
मे रा प रा जि त प्रेम है
उस पर बिगड़ता क्षेम है
तुम व्यर्थ शीतलता धनी
तन राख से उड़ता धुँआ।
ओ चन्द्रमा ...
हूँ देखता तुमको निरंतर
नयन चल पाते कहाँ
है दैव को स्वीकार कैसा
तुम वहाँ और मैं यहाँ।
ओ चन्द्रमा ...
वे दिन पुराने याद आते
जागते जब थे निशा
होकर निशाचर घूमते
था जीव तुझसे ही थमा।
ओ चन्द्रमा ...
ते रे द र्श न में मु झे
मिलती रही पिय बेपनाह
फिर भी कसक बाक़ी रही
तुम नक़ल, वो है असल 'आह'
अब से काव्य का सस्वर पाठ कर सकूँगा। कविता को पाठक अपनी रुचि अनुसार विलंबित, मध्यम या द्रुत गति से पढ़ता है। इसमें कवि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। जो पारंगत कवि होते हैं वे अपने शब्दों की बुनावट वैसी ही रखते हैं जैसी वे चाहते हैं। अर्थात उनकी चयनित शब्दावली गति की ओर स्वतः धकेल देती है। इसका अर्थ ये हुआ कि कविता में निहित 'गीति' शब्दों पर निर्भर है।
मेरे ब्लॉग का दूसरा युग 'सस्वर' आरम्भ हो रहा है। इस नवीनता को अपनाने में मेरे सहयोगी रहे हैं : अर्चना चावजी जी और संजय अनेजा जी। मैं कृतज्ञ भाव से उनका आभार व्यक्त करता हूँ।
सोमवार, 12 मार्च 2012
कविता-काढ़ा
पतला ही रह गया रसायन
नहीं हुआ वो गाढ़ा.
क्षीर समझकर पीने आये
हंसराज सित काढ़ा.
स्नेह शुष्क चौमासा बीता
बीता थरथर जाड़ा.
लेते रहे अलाव विद्युती
देह से स्नेहिल भाडा.
दर्शन अभिलाषा की मथनी
मथती कविता-काढ़ा.
पर हंसराज मुख अम्ल मिला
पी जाते गाढ़ा गाढ़ा.
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