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सोमवार, 28 जनवरी 2013

दुःस्वप्न

निशा आधी नग्न होकर
मेरी शैया के किनारे
आई सुधा-मग्न होकर
लिए नयनों में नज़ारे।
 
आँख के तारे नचाकर
अनुराग से पाणि बढ़ाकर
कर लिया मेरा आलिंगन
बिन हया ही मुस्कुराकर।
 
मैं विमर्ष से निशीथ में
निस्पंद, नीरव नेह को
किस तरह कर दूँ निराहत?
विदग्ध तृषित देह को।
 
श्वास में मिलती मलय-सी
अनिल, तन से फूटती है
कर रही मदमत्त मुझको
प्यार पाकर झूमती है।
 
श्याम अंबर चीर देखा
दीपिका ने क्रोध से तब
निशा भागी, निमिष मुकुलित
किये मैंने, लाल था नभ।

गुरुवार, 17 मई 2012

हे अंध निशा, गूंगी-बहरी !

हे अंध निशा, गूंगी-बहरी !
मत देखों निज पीड़ा गहरी.
तेरी दृष्टि पड़ते ही खिल
उठती है हिय में रत-लहरी.
न बोलो तुम, मृदु हास करो
चन्दा किरणों सह रास करो
तुम सन्नाटे के साँय-साँय
शब्दों पर मत विश्वास करो.
हे मंद-मंद चलने वाली,
तम-पद-चिह्नों की अनुगामी !
पौं फटने से पहले जल्दी
प्रिय-तम से मिल लेना, कामी !