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शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

वासंतिक मान

प्रथम बार
था मौन संयमित
कोकिल का कल गान
संभवतः कर रहा
पिकानद आने का अपमान।
 
अंधकार
छिपकर भी विचलित
खोता था पहचान
उषा-सुंदरी आयी
करता अंगहीन प्रस्थान।
 
शयन-कक्ष
में रमणी व्याकुल
करने को वपु-दान
पर प्रियतम से कर बैठी थी
वह पहले ही मान।
 
कोप-भवन
से निकल कोकिले!
पंचम स्वर आलाप
मान मिटे रमणी आवे
पी आलिंगन में आप।

रविवार, 6 मार्च 2011

आपके घर की हवा चली

आपके घर की हवा चली 
मिली राहत हेमंत टली 
पिकानद* हल्दी अंगों पर 
लगाकर लगती है मनचली. 

शिशिर तो खेल रहा स्वच्छंद 
बहिन मुख पर मलता हैं रंग 
सभी को छूट मिली है आज़ 
फाग खेलन की हो निर्बन्ध. 

मुझे मदमत्त कर रही है 
आपको छूकर आयी पौन.
कौन आलिंगन देगा आज़ 
पिया बैठी है होकर मौन. 

सुहाता वसन आपका आज़ 
कली खिलती हैं सारी साज 
देह को, फिर से आयी लाज 
राज करता है अब ऋतुराज. 

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*पिकानद = बसंत ऋतु