शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

दर्शन-प्राशन



लम्ब उदर के हो जाने से 
कर ना पाता हूँ जो आसन 
उसे तुरत करती है बेटी 
सुन्दरतम ये 'दर्शन प्रासन'*।  


कर्मकाण्ड वाला क्रम पूजन 
आता है किञ्चित जो रास न 
उसे नक़ल करती है बेटी 
मनमोहक ये 'दर्शन प्रासन'।


ये है उचित और वो अनुचित 
देता रहता हूँ जो भासन* 
उसे ध्वस्त करती है बेटी 
चख-उद्घाटक 'दर्शन प्रासन'।


* प्रासन = प्राशन 
* भासन = भाषण 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

संन्यासी सुत

सौंदर्य सुधा घट में भरते 
हे देव, आप क्योंकर हाला 
क्यों बना रहे कोमल तन को 
बालाओं के बंकिम भाला। 


था हुआ कभी आहत मैं भी 
है पीर अभी उसकी भारी 
मैं निर्माता बन हटा तभी 
तो लगा आपने ली बारी। 


अब तलक ओट से देखी थी 
अवगुंठनमय अवनत नारी 
विपरीत लगा प्रतिघात भवन 
में देखी जब सूरत प्यारी। 


हे देव, जानता हूँ मैं सब 
तुममें मुझमें है भेद बहुत 
तुम संयम के बुत हो तो मैं 
संन्यासी संयम का हूँ सुत। 


सोमवार, 8 सितंबर 2014

भाव-स्फोट

जब नदी उफान पर होती है, किनारे तोड़कर अपने आसपास के क्षेत्रों में तबाही लाती है तब केवल एक ही उपाय बचता है - उसके शांत होने की प्रतीक्षा।
वैसे ही , जो परस्पर आत्मीय होते हैं या लम्बे समय तक एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहे होते हैं अथवा रक्त सम्बन्धी होते हैं। 'भाव' के स्तर पर उनमें भी भयावह उठा-पटक हो जाती है, क्रोध मन-मस्तिष्क की समस्त विकृतियाँ उगल रहा होता है, सम्बन्ध बिगड़ते हैं, तब मात्र एक ही उपाय रह जाता है - स्थितियों के सामान्य होने की प्रतीक्षा।
'पुरानी डायरी' के पन्ने पलटते हुए आज मैंने 'समय विशेष' में बने भाव के दर्शन किये --- [यहाँ आपको संचारी भावों की मूसलाधार बारिश होती दिखेगी ३३ में से अधिकांश भावों का आना-जाना बहुत तीव्रता से हुआ है।]
 
 
स्वसा सम _______,
नमस्ते ! आपका स्मरण निरंतर करता हूँ। आपकी शिष्ट मधुरम क्षणिक किलक हृत में आई शुष्कता को दूर करती है, मस्तिष्क में बसे अहंकार पर चोट करती है।
अति व्यस्त समय में भी आप जटिल विचारों और तनावों के बीच कौंधकर 'चोट पर मरहम' सा आराम देते हो। आपको प्रतीक्षा रही इस पत्र की किन्तु इसे पत्र रूप देने में मेरी कार्य व्यस्तता ही व्यवधान बनी रही। अब इसे दूर करने की शीघ्रता पर विचारता हूँ।
हर 'माँ' माँ होती है। 'पिता' भी पिता होते हैं। दोनों आदरणीय हैं। दोनों का अपमान मेरी कल्पना में भी नहीं हो सकता किन्तु मेरा स्वभाव विश्वासों और मान्यताओं के अंधत्व पर व्यंग्योक्ति करने का रहा है। सो छोड़े नहीं छूटता। यदि मेरे स्वभाव से किसी को पीड़ा पहुँचती है तो मेरे सम्पूर्ण चरित्र और कार्यों पर दृष्टि डाल मूल्यांकन करें। अन्यथा मैं बार-बार बड़ों की कोपदृष्टि से ग्रस्तता रहूँगा।
यहाँ मेरे जन्मपिता और माता द्वारा माता तुल्य अन्य माँ के सम्मान को ठेस पहुँची। जीवन पर्यन्त क्षमा माँगू तो भी ग्लानि नहीं मिटेगी।
इसी अनुभूति के साथ …
आपका भ्रातसम
_______
 
जो प्रिय थे बालपन से अब तलक
काल्पनिक विलगाव जिनका असह्य था
गर्व होता था कि वे माता-पिता
हैं हमारे, मैं उन्हीं का पुत्र हूँ।

 
आज स्मृत होता सभी उनका किया
एक झटके में घृणा जिनसे हुई।
ईश ! उनकी बुद्धि में सबके प्रति
प्रेम, ममता, विनम्रता का भाव दो।
 
अब नहीं वो भाव मन में घूमता
ग्लानिवश छिपता फिरे अथवा कहीं।
देह का व्रण औषधि से मिट गया
किन्तु हृत का व्रण कभी न शुष्क हो। "

शनिवार, 30 अगस्त 2014

'अरे नहीं, ऐसा ना बोलो'

प्रेषित की मुस्कान उन्हें तो वे भी थोड़ा मुस्काये।
मिलने को दो नयन-युगल धीरे-धीरे सम्मुख आये।
 
एक युगल आँखें निराश थीं और दूसरी झुकी हुईं।
आर-पार दिखने वाले परदों के पीछे छिपी हुईं।
 
प्रथम दो नयन हँसकर बोले सफल नहीं हम हो पाये।
गौरव किस पर करें किसलिए अब तुमसे मिलने आयें।
 
'अरे नहीं, ऐसा ना बोलो' मन ने था चुपचाप कहा -
'तुम हो सफल दृष्टि में मेरी, सफल हमारा नेह रहा।'
 
नयन दूसरे चुपके-चुपके देख रहे थे सकुचाये।
सोच रहे वे कौन करुण गाथा कवि के सम्मुख गायें।
 
मन भाये वे नयन, कल्पना ने मुझसे हो मौन कहा -
'इनको भी दो नेह इन्होंने शुष्क शिशिर का पौन सहा। '

बुधवार, 25 जून 2014

आखेट कुशलता

तुम चले, चला धीरे-धीरे
मन मेरा चुपके से पीछे। 
तुम रुके, नहीं रुक सका हाय
संयम मेरे मन को खींचे।
क्यूँ रुके, नहीं तब था जाना
अब जान गया चख हैं तीखे।
रुक जाता तो मन मर जाता
आखेट-कुशलता बिन सीखे।

मंगलवार, 24 जून 2014

निःशब्द क्षमा


 
 
 
 
 
 
 



क्षमा किसे मैं करूँ स्वयं से बड़ अपराध किया किसने
माँग रहे तुम क्षमा भूल पर मुझको दंड दिया जिसने
कोमलता के भाव ह्रदय से बन-बनकर तेरे निकले
फिर भी मैं था मौन देख बढ़ गया भाव तेरे पिचले
तुम पर मुझको क्रोध नहीं क्यों शब्द तुम्हारे हैं पिघले
मैं तो खुद को कोस रहा चुपचुप कुछ वर्षों से पिछले
अमा रही जब तक निज मन में तब तक ही मैं था भटके
जब से दरस किया तव का सुषमा मेरे मुख पर मटके।

सोमवार, 16 जून 2014

उठो अंशुमान !

प्रकाश औ' प्रकाशिका 
कर्तव्य साथ छोड़कर 
दे रहे थे देह को 
विराम प्राचि-गेह में। 

प्रकाश ताप व्याज से 
घटा-विधान ओढ़कर 
ले रहा था सुबकियाँ 
अश्रुओं को छोड़कर। 

मलिनता मिटाने को 
खींचती घटा-विधान 
धीरे से खाँसती, पिय 
आई, उठो अंशुमान !

सोमवार, 26 मई 2014

ग्रहण करूँगा शपथ


मुझे देख तुम आते-जाते 
अधर-ओष्ठ दो बार मिलाते 
स्वर 'माँ' से कमतर न लगता 
'प' व्यंजन की झड़ी लगाते। 

माँ के इर्द-गिर्द है 'शाला' 
शयन समय है छुट्टी वाला 
भाषा शब्द और भावों का 
सीख रही व्याकरण निराला।

डाँट प्यार ममता से लथपथ 
हाँका करते गृहस्थी का रथ 
करूँ सुरक्षित जीवन भव्या 
ग्रहण करूँगा मैं भी शपथ। 

शनिवार, 17 मई 2014

गुजराती पट्ठा


उपयोगी थी भूमि
लगाने — ईंटों का भट्टा।


भीड़ लगी रहती थी
लेने — चट्टे पे चट्टा। 

इंतज़ार में जाने किसके 
रहता मन खट्टा। 

तिल-तिल चाट रहा दिन-घण्टे 
काला* तिलचट्टा। 

समय बड़ा बलवान
दरकती — भावशून्य सत्ता। 

उसी भूमि से बाहर आया 
पत्ते पे पत्ता। 

विषतरु मूल जड़ों में ठेले 
अमूल दूध मट्ठा। 

दशकों बाद मिला देश को 
गुजराती पट्ठा। 


*काला = समय का (समय रूपी)


रविवार, 23 मार्च 2014

आगंतुक काम

पृष्ठ कोरा
देखना मैं चाहता हूँ
एक धुंधला चित्र जिसमें
रख कलम उस पर उकेरूँ
सहजता से चित्र प्रेरक।
एक बिंदु -
आरम्भ होकर
अंत बिंदु तक मिले जा
मध्य की रेखाएँ
इतनी उभर जाएँ कि लजाएँ
सिमटने का भाव उसमें
दृष्टि पड़ते संचरित हो।
पाद का अंगुष्ठ
भूमि पर बनाता चाप
एड़ी टिकी रहती
बनाते गर्त छोटे आप।
यौवन भार
कर रहा लोचित
-- मध्य के उभार
उरु पर स्वतः ही
पड़ रहा समग्र वपु भार।
संध्या समय
के सूर्य का प्रकाश
तरु-पल्लवों के बीच से
पहनाये छाया-पाश।
सुमन-क्यारी
से गुजर कर वायु
घ्राण रंध्रों को बताये
अंग-सौष्ठव आयु।
कर बद्ध दिखते
प्रेम, श्रद्धा भाव
आगंतुक की भाँति होता
'काम' का ठहराव।

शनिवार, 22 मार्च 2014

श्वास का स्यंदन

दुर्दान्तता है प्रेम की
उद्दाम उच्छल आग में
चल रहा है श्वास का
स्यंदन बिना रुके हुए.
धँस रहे हैं चक्र दोनों
स्नेह-शुभ्र-पंक में
हाँकता हूँ मदन-अश्व
हृदय की लगाम से.
म्लान मुख हो गया
उर मदन-अश्व हाँकते
किन्तु स्नेह-पंक से
स्यंदन ज़रा हिला नहीं.
श्लथ हुई हैं इन्द्रियाँ
संस्रस्त पूर्ण तन-वदन
पर स्मृति स्नेह की
स्यंदन को बढ़ा रही.

गुरुवार, 6 मार्च 2014

स्नेह ऋण - २

पिछले का शेष ... 

उर - सर स्वर यूँ 
निकला जैसे फूट पड़ी हो धारा 
शीतल जल की 
जिसमें छिपा हुआ था 
नेह - ऋण प्यारा 
"क्यों होते हो व्याकुल 
क्या रूठा है भाग्य तुम्हारा 
या फिर तुम भी यही चाहते 
हो निज पानी खारा 
एक बार तो आकर देखो 
मेरे अंतस में तुम 
सम्भवतः 
मिल जाए आपको 
हुआ आपसे जो गुम।"

मैंने सोचा - 
बड़ा बुरा है ऋण को लेकर जीना
कड़क शीत में डर के मारे 
कैसे आये पसीना 
नयन बंद कर डुबकी मारी 
थर - थर काँप गया मैं
उर - सर के हर कौने जाकर 
देख - देख हाँफा मैं 
बाहर आकर सर से बोला -
"तुमने मिथ्या बोला 
नहीं मिला मुझको  पिय का ऋण 
उर में धधके शोला। "
सरवर बोला -
"नहीं - नहीं मेरे वचनों में मिषता 
मुझमें ही आ छिपी हुई थी 
पिय - ऋण की अस्थिरता 
देखो! अपनी देह 
दीखती है धुंध - परी निकलती 
जाती है वापस 
पिया के पास हवा - सी उड़ती 
यही आपके पिय का ऋण है 
स्वयं जा रहा पिय के 
पास, जहाँ देनी है उसको 
पावनता पहचान। "

मैंने पूछा -
सरवर से 
"क्यूँ रहते शीतल हरदम 
रजनी आकर पास फहराती 
शीतलता का परचम
काँप - काँप जाता हूँ 
जब - जब देती पिया उधार 
कभी वक्ष से लगकर 
और कभी अधरों से प्यार 
पर उस कम्पन में मुझको 
शीतलता नहीं सताती 
पर सर में डुबकी लेने की 
सोच भी भय दिखलाती। "
 
सरवर बोला -
फँस जाओगे यदि लिया उधार 
और अंत में देना होगा 
सूद सहित ऋण - प्यार 
इससे तो मैं ही अच्छा हूँ 
मेरी शीतलता से 
आप बनोगे पाक 
बचोगे घोर वपु - निंदा से 
और यदि मिल जाता मुझमें
दूषित उर का प्यार 
उसका भी कर देता उर - सर 
प्यार सहित उद्धार 
और यदि ऐसे ही पिय से  
लेते रहे उधार 
ऋण भी पा जाएगा उस दिन 
बहुत अधिक विस्तार  
दब जाओगे बोझ तले तब 
प्राण रोएगा फबक - फबक कर 
दूषित हो मैं उबल पड़ूँगा 
कर बैठूँगा 
खर्च आपकी गुप्त निधि का 
हो जाओगे रंक आप 
अपने से ही जब 
मुझसे मिलकर पश्चाताप 
करोगे तब। 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

स्नेह-ऋण

शरद निशा में
काँप रहा तन
थर-थर-थर-थर
मैं बिस्तर में सिमट गया
तन फिर भी शीतल
तभी कहीं से आया लघु
एक स्वप्न प्यारा
पिय ने मेरी दशा देखकर
मारी स्नेह धारा
उस गरमी से दहक उठा
मेरा शीतल तन
चलि*
उर में जो ठहर गई थी
मेरी धड़कन
पौं फटने में रहे
मात्र अब थोड़े ही पल
और अधिक बन गया भुवन
शीकर में शीतल
भोर भई
भानु भी भय से
भाग रहे भीरु बन
कड़क शीत में
कर-पिया से
माँग रहे स्नेह तन
भानु
पिया के आँचल में
छिप गया सिमटकर
हुआ कपिल रंग
था अब तक जो
भगवा दिनकर
स्नेह ताप से गर्म किया
दिनकर ने निज तन
उर में छाई धुंध
छँटी और बढ़ा सपन
ह्रदय धुंध हटते ही पिय का
स्नेह हटा निज उर से 
सम्भवतः छिप गया
ओट पाकर के
निज उर-सर से
व्याकुल हो पूछा तब मैंने
"उर-सर! कहाँ छिपा है
'पिय का ऋण'
जिससे ठंडा निज
तन-मन बहुत तपा है
आप बता दें तो मिल जाए
ढाँढस मेरे हिय को।
आज नहीं तो
कल उधार
लौटाना है पिय को।"
 आगे का स्वप्न कहीं लापता हो गया है। मिलते ही आपसे मिलवाने लाऊँगा।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

उर-सर ....... एक कथा-काव्य

पिय खोद रही सर निज उर में 
स्नेह-नीर पिया का भरने को। 
स्नेह-धार फूट पड़ी सर में 
स्नेह-नीर लबालब भर आया। 

तब हंस युगल अपनी तुंड में 
सर में उतरे सरोज लिये। 
भेंट करी कमल की उर-सर को 
जल-केलि करें अब वे उसमें। 

दो थे सरोज वे फ़ैल गए 
जड़ उर-सर में मुख बाहर को। 
आभा तब पिय की फ़ैल गई 
जब उर-सर के वे ओज बने। 

पर फिर भी उसकी चाहत  थी 
स्नेह-नीर पिया का पाने की। 
जिससे उसकी उर-उत्कंठा 
पूरी हो ओज बढ़ाने की। 

जो चाहत थी पूरी कर ली 
स्नेह-नीर पिया ने दे डाला। 
पर बिखर गया वह उर-सर से 
बह गया नाली में दूषित हो। 

हंस युगल ने जब देखा यह 
स्नेह-नीर बह गया उर-सर से। 
जल-केलि छोड़ वे पहले ही 
उड़ गये आरोप लगाने से।  

कमलज ने छिन्न हुए नीर को 
उर-सर समीप ही ठहराया। 
व दंड दिया भार ढोने का 
जिससे वह उर-सर हीन हुआ। 

वह उर-सर से संधि विच्छेद कर 
गया निज अस्तित्व बनाने को। 
रहा समीप उर-सर के फिर भी 
वह पड़ा रहा एकांत लिए। 

पिय दण्डित हो अब उठा रही 
लघु भार उसी का महीनों से। 
सब खर्चा भी वह उठा रही 
निज बढ़ी भूख को शांत किये। 

चाहती जिससे पिण्ड छुड़ाना 
अब याद उसी की हो आयी। 
कैसे स्नेह-नीर उर-सर से 
छिन्न हुआ था वह सकुचाई। 

जो रूठ चला था उर-सर से 
वह उसे बुलाना चाहती थी। 
उसको अपने क्रोड़ वास में 
अब वह ठहराना चाहती थी। 

वह दिन भी पास आ गया तब 
पिय मुक्त हुई औ' भार हीन। 
जो नीर बहा था उर-सर से 
वह आज हुआ उसका अंगज। 

वह आया क्रोड़ आसरे में 
निर्जन निवास तब अपना छोड़। 
पुनः उर-सर से संधि कर लीं 
जब टूट गया खर्चे का जोड़। 

उर-सर की ममता जाग उठी 
स्नेह-नीर हुआ पय ममता मिल। 
उर-सर सरोज भी उस पय में 
नव पयोज नाम से थिरक उठे। 

उस थिरकन में पय छलक पड़ा 
औ' पयोज-नाल से धार चली 
जल्दी से डेरा डाल दिया 
उस धार-द्वार पर पयोमुख ने। 

बह चली धार फिर उर-सर से 
अब खड़ा पयोमुख ओक किये। 
दे रहे निमंत्रण पीने का 
दोनों पयोज बारी -बारी। 

उर-सर से सारा नीर निकल 
बह गया पयोमुख के मुख में। 
उर-सर-तल में रह गई मात्र 
ममता-मक्खन की एक परत। 

उर-सर का सारा ओज क्षीण 
तब हुआ कमल भी सूख गए।  
उस पयोधरा ने निज शिशु के 
पालन ही पर सब खर्च किया।  

चल पड़ा शिशु एक बार पुनः 
पय-पान हेतु उर-सर समीप। 
पर मिला उसे पय-द्वार बंद 
अब पय-प्रासाद भी खंडहर था। 

उर-सर को तब वातायन से 
चोरी से शिशु ने देख लिया। 
उर-सर-तल में जो जमा हुआ 
उसको माँ कह संकेत किया। 

पिय हुई उन्मादित शिशु मुख ने 
जब माँ कह कर संकेत किया। 
तब अपने दोनों हाथों से 
शिशु को छाती से लगा लिया। 

माँ नाद किया था जो शिशु ने 
वह क्रोध-क्षुधा की पावक थी। 
उस पावक की लपटों से ही 
ममता-मक्खन सब भस्म हुआ। 

अग्नि क्रोध-क्षुधा की शांत हुई 
ममता-मक्खन जब हुआ ख़तम। 
और फ़ैल गई अक्षय सुगंध 
मदमत्त हो गया शिशु एकदम। 



सोमवार, 11 नवंबर 2013

ये कैसा प्रयोग किया ?

प्रियंवदे! तुम गए मुझ पर वियोग किया।
माँ पिता बहिन भाई सबसे संयोग किया।
हम रहे काम में व्यस्त पाप से योग किया।
क्षुद्र-विकारों से मानस का भोग किया।
दिन-रात तनावों ने श्वासों का रोग दिया।
दूर हमीं से जाकर -- ये कैसा प्रयोग किया ?

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

सलूनो है पूनो के संग

उतर धरती पर चला अनंग
सुंदरी रति भी उसके संग।
बहिन भैया का था त्योहार
'सलूनो' देख हो गए दंग।
 
चलो देखें चलकर कुछ गेह
हमारे लिए कौन सी देह
पड़ी है रिक्त आज परिवाद
सोचते करें तनिक संदेह।
 
कौन किसको कितना कैसे
कर रहा है अंतर से नेह।
मधुरता सच्ची है या मृषा
प्रयत कितना है कितना हेय।  
 
जोहती देखी भैया बाट
बहिन बैठी थी खोल कपाट
प्रतीक्षा कर परियात हुई
बाँध राखी कर तिलक ललाट।
 
प्रकृति तरु के कर में नवपात
लहरियाँ सर वर में जलजात।
दृगों को पलकों की प्यारी
दृष्टि राखी बाँधे अवदात।
 
पाणि-पल्लव बहिना के आज
कलाची को भैया की साज
पा रहे हैं प्यारे उपहार
सुमन राखी वाला ऋतुराज।
 
दिवस भर घूमे रती अनंग
लालि संध्या का श्यामल अंग
हुआ, बोला वसुधा से चंद
– "सलूनो है पूनो के संग।"

रविवार, 21 जुलाई 2013

भव्या वृष्टि

 
उपधानों की चारदिवारी
पयदानी कोपीन कियारी
अस्त-व्यस्त शैया पर सिंचित 
नयनों की तारक फुलवारी।
 
 
अंक पर्यंक लगे समदृष्टि 
परम आत्मा की नव सृष्टि 
मन आँगन की दशक शुष्कता
मेटन को हुई भव्या वृष्टि।
 
 
वत्सलता का शिलान्यास सी 
मध्य बिंदु माँ पिता व्यास सी 
कारा जीवन  में राका बन 
तृषित ह्रदय चातकी प्यास सी।
 
 
 
पयदानी = पैदानी,
चारदिवारी = चाहरदीवारी
कियारी = क्यारी 
 
 

गुरुवार, 6 जून 2013

भव्य अनुभूति

 
शब्द नहीं हैं सुख वर्णन के
नित्य ह्रदय में उत्सव महके
मुख-द्वार पर सभी स्वरों के
बारी-बारी अक्षर चहके।
सपना नहीं सत्य समझते
लाल हुई हैं आँखें मलते
प्रेम विटप की बाँहों पर अब
गोदी वाले पुष्प निकलते।
जान गया मन रहस्य पिता का
संतानों से अपनेपन का
अर्थ ढूँढ लेता हूँ अब तो
हर किलकारी हर रोदन का।
 
 
 

मंगलवार, 5 मार्च 2013

शापित सुनार

हर ह्रदय विदारित तार-तार
संवेदन सरिता स्फुटित थार
बह चली कूल दोनों नकार
दामिनि दामन सुन चीत्कार।
 
सभ्यता हो चली शर्मसार
आवरण गया देह को डकार
उबला अबला जबरन विकार
तामस में कुचली ज्योति नार।
 
'हा-हा-हा-हा' कानों के द्वार
कोमल कातर स्वर की कतार
आती टकराती बार-बार
आखेटक मन करता शिकार।
 
हर ओर न्याय को हो गुहार
अनुत्तरित प्रश्न दहलीज पार
कंधों पर किसके न्याय भार
हावी लुहार शापित सुनार!!!
 
 
[व्यापक जन-जागृति की उत्प्रेरक बनी 'बहिन ज्योति पाण्डेय' को भावाञ्ज्ली]
 

शनिवार, 2 मार्च 2013

चिंतन की रस यात्रा

"एक बार काव्य-साधना के समय सहसा मेरा चिंतन साहित्यिक रसों के पथ पर निकल पड़ा। समस्त रसों को 'काम' की तीव्रता के आधार पर विभाजित करके समझने लगा। पहले पहल अतिकाम, मध्यकाम, और शून्यकाम करके सभी रसों को इन श्रेणियों में रखा। फिर श्रेणियों के नाम बदलकर उसे फिर से विभाजित किया। .... अद्भुत आनंद मिला।"
 
जब कोई काव्य-साधक नया चिंतन करता है तो वह मन में उपजे स्थायी-अस्थायी भावों को कुछ कक्षाओं में अनुशासित करने का खेल खेलता है। आने वाले समय में यदि काव्य-अभ्यासियों और काव्य-रसिकों को वह रुचता है तो वे उसके ज्ञात-अज्ञात रूप से प्रचारक हो जाते हैं।

'काव्यशास्त्र की शिक्षा वर्तमान समय में अपनी महत्ता कैसे स्थापित करे?' – इस चिंता से कई विद्वान् और विदूषियाँ अपने-अपने प्रयास ज़ारी रखे हुए हैं। कुछ काव्यशास्त्र पर अच्छी कक्षाएँ दे रहे हैं तो कुछ उत्कृष्ट काव्य-लेखन कर रहे हैं। सभी के प्रयासों से काव्य की समृद्ध परम्परा चलायमान है।
एक सुबह जिस चिंतन ने 'कलम' खिलौना लेकर खेल आरम्भ किया उस 'चिंतन-क्रीड़ा' में आप भी सम्मिलित हो सकते हैं :
पहले पहल कलम ने पाला खींचा :
अति काम — जिसमें शृंगार, हास्य, अद्भुत नाम के फुर्तीले खिलाड़ी खड़े किये।
मध्य काम — जिसमें वीर, करुण, वात्सल्य नाम के शारीरिक सौष्ठव वाले खिलाड़ी खड़े किये।
शून्य काम — जिसमें शांत, वीभत्स, रौद्र, भयानक नाम के खिलाड़ी रह गए जो हार-जीत की चिंता से मुक्त दिख रहे थे।
पाला खींचने के बाद संतोष नहीं हुआ। चिंतन ने खींचे हुए पाले को नए नाम दिए :
द्रुत काम — जिसमें खिलाड़ी वही थे -- शृंगार, हास्य, अद्भुत
श्लथ काम — जिसमें खिलाड़ी वही थे -- वीर, करुण, वात्सल्य
अकाम — जिसके दो उपभाग किये -- निष्काम / दुष्काम
  • निष्काम में – शांत को खड़ा किया
  • दुष्काम में – वीभत्स, रौद्र, भयानक (दूसरे उपभाग में) खड़े हो गए।
शृंगार — अति, मध्य, मंद 
अति शृंगार : संयोग (निःशब्द रति-व्यापार) / वियोग (प्रसुप्त विरह-ज्वार)
मध्य शृंगार : संयोग (आकर्षण, परस्पर वार्तालाप, सानिध्य) / वियोग (सुखद स्मृतियाँ, दुखदायी परदेशगमन, मान, पूर्वराग)
मंद शृंगार : संयोग (साक्षात शब्द संवाद, चाहना) / वियोग (कथन मात्र, कविताई)
हास्य — प्रौढ़, युवा, बाल
प्रौढ़ : अट्टहास, अपहसित, अतिहसित
युवा : हसित (खिलखिलाहट), विहसित (परिहासात्मक हँसी)
बाल : सुस्मित (मुस्कान)
करुण — आभ्यंतर, बाह्य
आभ्यंतर : मानसिक वेदना से उपजा कातर स्वर
बाह्य : शारीरिक वेदना से उपजी कराह
अद्भुत* — विश्वसनीय, अविश्वसनीय, कपटपूर्ण ... [इस पर कभी और क्रीड़ा रचेंगे]
वीर* — उदात्त, ललित, प्रशांत, उद्धत या, युद्धवीर, कर्मवीर, धर्मवीर, दानवीर  [शास्त्रोक्त]  
वात्सल्य — प्रौढ़, युवा, बाल
प्रौढ़ : माता-पिता (अभिभावक) का अपने बच्चों से
युवा : प्रत्येक बड़े का प्रत्येक छोटे से, प्रत्येक सबल का प्रत्येक निर्बल से, प्रत्येक सक्षम का प्रत्येक असहाय से
बाल : जीवों से वस्तुओं से और स्थान से।
शांत
लक्ष्य साध्य (अर्थ मौन) : विपरीत स्थिति में प्रतिक्रिया भाव, ज्ञानपरक तप, वैराग्य भाव युक्त ऋषि-मुनियों की साधना
अलक्ष्य साध्य (व्यर्थ मौन) : प्रतिक्रियाहीनता, उदासीनता, तटस्थता
वीभत्स
क्षोभज (शुद्ध) : पापी (अपराधी) से घृणा, रुधिर आदि से उत्पन्न घृणा, सुन्दरी के उरु-उरोजों के प्रति वैराग्य
उद्वेगी (अशुद्ध) : पाप (अपराध) से घृणा, कृमि विष्ठा, शव आदि से उत्पन्न घृणा।
रौद्र —
अत्यंत क्रोध : विनाश भाव (अनिष्ट), पूर्णतया समाप्त कर देने की इच्छा
क्षीण क्रोध : क्षत-विक्षत करने का भाव, चोट या घात करने की इच्छा
भयानक —
जड़ भय : स्तब्ध रह जाना, स्थिर रह जाना, अवाक रह जाना, कंठावरुद्ध होना
चेतन भय : कम्पन होना, भागना-दौड़ना, सुरक्षा के लिए चीख-पुकार करना, हकलाना, छिपते फिरना, सामने न आना, नज़रें नीची कर लेना, विपरीत कार्य करने लगना।
इस चर्चा का उद्देश्य है –
विद्वान् साथियों और गुरुओं को विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करना, गुरुओं का मार्गदर्शन लेना।

मेरा यह अनुभव है अपरिपक्व चिंतन तभी पुष्ट होता है –
जब उसमें सुधार के अवसर खुले हों।
आलोचना के लिए सम्मान भाव हो।
विरोधियों का भी स्वागत हो।

[*तारांकित रसों पर मन-मुताबिक़ क्रीड़ा की फिर कभी छूट लूँगा।]