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सोमवार, 8 सितंबर 2014

भाव-स्फोट

जब नदी उफान पर होती है, किनारे तोड़कर अपने आसपास के क्षेत्रों में तबाही लाती है तब केवल एक ही उपाय बचता है - उसके शांत होने की प्रतीक्षा।
वैसे ही , जो परस्पर आत्मीय होते हैं या लम्बे समय तक एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहे होते हैं अथवा रक्त सम्बन्धी होते हैं। 'भाव' के स्तर पर उनमें भी भयावह उठा-पटक हो जाती है, क्रोध मन-मस्तिष्क की समस्त विकृतियाँ उगल रहा होता है, सम्बन्ध बिगड़ते हैं, तब मात्र एक ही उपाय रह जाता है - स्थितियों के सामान्य होने की प्रतीक्षा।
'पुरानी डायरी' के पन्ने पलटते हुए आज मैंने 'समय विशेष' में बने भाव के दर्शन किये --- [यहाँ आपको संचारी भावों की मूसलाधार बारिश होती दिखेगी ३३ में से अधिकांश भावों का आना-जाना बहुत तीव्रता से हुआ है।]
 
 
स्वसा सम _______,
नमस्ते ! आपका स्मरण निरंतर करता हूँ। आपकी शिष्ट मधुरम क्षणिक किलक हृत में आई शुष्कता को दूर करती है, मस्तिष्क में बसे अहंकार पर चोट करती है।
अति व्यस्त समय में भी आप जटिल विचारों और तनावों के बीच कौंधकर 'चोट पर मरहम' सा आराम देते हो। आपको प्रतीक्षा रही इस पत्र की किन्तु इसे पत्र रूप देने में मेरी कार्य व्यस्तता ही व्यवधान बनी रही। अब इसे दूर करने की शीघ्रता पर विचारता हूँ।
हर 'माँ' माँ होती है। 'पिता' भी पिता होते हैं। दोनों आदरणीय हैं। दोनों का अपमान मेरी कल्पना में भी नहीं हो सकता किन्तु मेरा स्वभाव विश्वासों और मान्यताओं के अंधत्व पर व्यंग्योक्ति करने का रहा है। सो छोड़े नहीं छूटता। यदि मेरे स्वभाव से किसी को पीड़ा पहुँचती है तो मेरे सम्पूर्ण चरित्र और कार्यों पर दृष्टि डाल मूल्यांकन करें। अन्यथा मैं बार-बार बड़ों की कोपदृष्टि से ग्रस्तता रहूँगा।
यहाँ मेरे जन्मपिता और माता द्वारा माता तुल्य अन्य माँ के सम्मान को ठेस पहुँची। जीवन पर्यन्त क्षमा माँगू तो भी ग्लानि नहीं मिटेगी।
इसी अनुभूति के साथ …
आपका भ्रातसम
_______
 
जो प्रिय थे बालपन से अब तलक
काल्पनिक विलगाव जिनका असह्य था
गर्व होता था कि वे माता-पिता
हैं हमारे, मैं उन्हीं का पुत्र हूँ।

 
आज स्मृत होता सभी उनका किया
एक झटके में घृणा जिनसे हुई।
ईश ! उनकी बुद्धि में सबके प्रति
प्रेम, ममता, विनम्रता का भाव दो।
 
अब नहीं वो भाव मन में घूमता
ग्लानिवश छिपता फिरे अथवा कहीं।
देह का व्रण औषधि से मिट गया
किन्तु हृत का व्रण कभी न शुष्क हो। "

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

याचक के भाव

'प्रतीक्षा' का हूँ मैं अभ्यस्त
दिवस बीता, दिनकर भी अस्त
पलक-प्रहरी थककर हैं चूर
आगमन हुआ नहीं मदमस्त.

बैठता हूँ भूखों के संग
बनाता हूँ याचक के भाव
मिले किञ्चित दर्शन उच्छिष्ट
प्रेम में होता नहीं चुनाव.

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश
'जीव' की सुन लो आर्त पुकार
ठहर ना जाये उसका वंश.

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

दीप-सत्ता आयेगी

निश्चित निकलकर
कुछ समय के बाद मेरे कंठ से
निज चित्त की अतृप्तियों को
तृप्त कर पहनाएगी.
वातगामी वाणिनी,
स्वरों के भुजपाश को.
................... वाग्दत्ता आयेगी.

भविष्य की प्रतीक्षा में
स्नात होते वाक्-पथ.
नेह-पुष्प-वाटिका में
रुक गए हैं काम-रथ.
औ' लग गयी हैं पास-पास
स्वरों की सत-फट्टीयाँ.
दिक् दर्शिका के नाम से
दिखायेंगी आकाश को.
................... दीप-सत्ता आयेगी.

[*अमित जी! अर्थ नहीं बताउँगा, बताया तो अन-अर्थ हो जाएगा.
अनायास डॉ. अमर जी स्मृति भी हो आयी, मंगलवार जो है. उन्होंने मंगल का दिन चुना है काव्य-रस पान के लिये. ]