[कच-देवयानी का एक प्रकरण : जिसमें कच के देवयानी के प्रति मनोभाव]
तुम एक अगर होती तो मैं
तुमसे ही कर लेता परिणय.
खुद में नारी के रूप सभी
कर लिये आपने पर संचय.
तुझमें देखूँ मैं कौन रूप
मैं असमंजस में बना स्तूप.
तुमको छाया मानूँ अथवा
मैं मानूँ तुमको कड़ी धूप.
मैं दो नदियों के बीच मौन
संगम जैसी पावन धारा.
तुम मलयगिरी की हो सुगंध
मैं हूँ व्योम गंधित तारा.
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
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