शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

मन के छिपे भाव पहचानो

छात्र हमारे बड़े हो गये 
साथ-साथ रह सकुचाते.
मिलने को गुरु की शाला में
एक साथ अब ना आते.

पूर्व दिशा में बिजली चमके
पश्चिम में बादल छाते.
वर्षा होती ठीक मध्य में 
प्यासे दोनों रह जाते. 

पूर्व दिशा की शुष्क शिला ने 
भेदभाव पहचान लिया. 
पश्चिम दिक् के सैकत-झरने 
ने मरीचिका गान किया. 

स्नेह कौन से स्वर में उनसे   
ऋण-चुकता संवाद करे. 
इतना बोझ लदा है मन पर 
चुपके-चुपके आह भरे.

गुरुवार, 30 जून 2011

अनचाहा अपराध

शिष्ट शब्दों से दिखा दी
आपने मुझको ज़मी*.
संतुलन अद्भुत झलकता
बात में रहती नमी.

इस नमी* से ही पराजित
पुरुष क्या सब देव हैं.
पुरुष की हठधर्मिता भी
सूखती स्वमेव है.

आपके गृह-त्याग ने मन पर
रखा हमारे 'जुआ'.
बैल-बुद्धी* हूँ तभी तो
अनचाहा अपराध हुआ.
_________________________________

ज़मी = जमीन, शर्मिन्दा करने से अर्थ
बुद्धी = सही शब्द 'बुद्धि'
बैल-बुद्धि = मूर्ख
जुआ = बोझ, हल का अग्रिम सिरा
नमी = विनम्रता, गीलापन (संवेदनशीलता)
_________________________________

रविवार, 26 जून 2011

दर्शन-प्राशन परीक्षा

मित्रो, ब्लॉगजगत में ऐसे कई नाम हैं जिनसे ब्लॉग-साहित्य की अपनी एक पहचान बन गयी है. उनमें ही कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने 'पाठशाला' को चलाने की लगातार प्रेरणा दी. प्रोत्साहन पाकर कुछ समय बाद ही मैं इस शिक्षण के नाट्य को करने में रस लेने लगा. मन में आया कि एक परीक्षा भी ले ही लूँ, फिर अवसर मिले न मिले. आज की परीक्षा छोटी-सी है. मन में तो तमाम प्रश्न थे किन्तु, कहीं परीक्षा देखकर कोई पास तक न आये इसका भय भी बना रहा. इसलिए अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर ही आगामी प्रश्न-पत्रों का सुख-वितरण करूँगा. अपने सुभीते से जितना चाहे समय लीजिये. इस बहाने आपका फिर से पिछली पोस्टों पर टहलना भी हो जाएगा.
प्रश्न 1 : किसी भी दो काव्यांशों के कवि को पहचान कर उनके रचना के भावार्थ को स्पष्ट करें. [5×2=10]
(क़)
हकीकत का तो बिच्छू भी छुआ जाता नहीं तुमसे.
ख़यालों के बड़े सौ साँप, दस अजगर तो मत मारो .
(ख़)
रात गला काटती है
कई ज़ज्बात मरते हैं
इक ज़हरीली सी कड़वाहट
उतर जाती है हलक में
(ग)
भृकुटियों पर उग आए,
उस संतोष के आगे,
थर्रा जाता है.
एक क्षण को,
दबंग जेठ भी. 
(घ)
क्यों कि
जो कहती हूँ
वो करती नहीं
जो सोचती हूँ
वो होता नहीं
जो होता है
वो चाहती नहीं .
इसी ऊहापोह में
जीती चली जाती हूँ
क्षण - प्रतिक्षण
परिस्थितियों में
ढलती चली जाती हूँ.

प्रश्न 2:  ब्लॉग जगत में कौन सबसे आगे ? कोई पाँच बताइये. ...........[5]
१. जटिल शब्दावली में ...........२. विषय विविधता में ............
३. गीतिमयता में ............
४. हाजिर जवाबी में ...........
५. अत्यधिक भाव प्रवणता में .........

६. मुग्ध लेखन में ..........

प्रश्न 3 : स्वर का तापमान पहचानिए :   ........... [5]
छूट गया मिलना-जुलना सब
पुनः मिलेंगे शायद न अब
जितना तुमसे दूर चलूँ
आ जाता लौट वहीँ
कहो कुछ बेशक आप नहीं .
http://darshanprashan-pratul.blogspot.com/2010/11/blog-post_21.html

प्रश्न 4 : सभी प्रश्नों के उत्तर दें :     ................ [5×2=10]
१. पाठशाला के संचालक का काव्यशास्त्र के किस आचार्य से मतभेद हुआ था?
२. किस कविता में अनुप्रास के छठे भेद को देखा गया है?
३. 'दर्शन प्राशन' की कौन-सी कविता चित्र अलंकार का अच्छा उदाहरण है?
४. एकमात्र कविता से अपने ब्लॉग की कायापलट कर देने वाले कवि-हृदय लेखक का क्या नाम है?
५. रंग और स्वर का संगम किस ब्लॉग की पहचान है?


प्रश्न 5 : रचनाओं को पहचानिए किस कवि की हैं? .................. [10×2=20]
१) तुम हो जैसे अथाह जलराशि,
और मैं हूँ
एक बिना पतवार की नौका।
पूरी तरह से,
तेरी मौजों के सहारे।
२) सुनो अब्बा!
मिले किसी मस्जिद,
तुम्हारा अमुक खुदा.
तो कहना फ़क्र से,
तुम बेहतर खुदा हो.
३) है बिना निमंत्रण के आना.
आना फिर आते ही जाना.
ओ स्वेद! बने तुम हठधर्मी 
आमंत्रण पर अच्छा आना. 
४) बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।
५) अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
६) अधिकार के सारे शब्द तुम्हारे हाथों में
और मेरे हाथों में सारे कर्तव्य?
७) मंदिरों में बंद ताला, हर हृदय है कुटिल-काला 
चाटते दीमक-घुटाला, झूठ का ही बोलबाला
जापते हैं पवित्र माला, बस पराया माल आये--
व्यर्थ हमने सिर कटाए,  बहुत ही अफ़सोस, हाय !
८) खालिक हो तुम कायनात के मालिक तुम हो 
क्या है रीता तुमसे जो बता इन खाफकानो को 
९) तेरी भक्ति की ज़रा स्याही पिला मेरी कलम को...
ऋण चुकाने की धरा का शक्ति दे मेरी कलम को...
जब लिखूं मैं सत्य मेरी लेखनी न लड़खड़ाए...
तू अभय का ग्रास कोई अब खिला मेरी कलम को
१०) अटूट रिश्ता है चोटों से
जख्मों को सहलाना क्या
गहरे घाव ह्रदय में लेकर
खिल खिल कर हँस पाना क्या
मैं क्या जानू जख्मीं होकर घाव भरे भी जाते हैं
छेड़ छाड़ मीठी झिड़की, आलिंगन का सुख होता क्या.

बुधवार, 15 जून 2011

अमित स्मृति

अमित स्मृति-1

तुम कहते थे - "करो प्रतीक्षा, मैं आने वाला हूँ"
"मीठा बतरस घोल रखो, बस पीने ही वाला हूँ"
ना तुम आये, न ही आयी, कोई सूचना प्यारी.
पाठ हमारे भारी-भरकम, घुटनों की बीमारी.
वज़न अगर कम हो पाये तो चलना सहज हुवेगा.
जिन नयनों के सम्मुख गुजरे, उठकर चरण छुवेगा.
इसीलिए उपवास कर रहे 'पाठ' छंद वाले अब.
वज़न घटेगा, होगा दर्शन अमित, खुलेगा व्रत तब.


अमित स्मृति-2

मुझे बताओ प्रियवर मेरे, कब तक मन का उलट करूँ?
'आना' कहकर मुकर गये, कैसे फिर से आमंत्रण दूँ?
'घर आओ, घर आओ मेरे' हृत-स्वर को मैं बुलत डरूँ.
'अब आये, अब आये प्रियवर' - 'नयन-पलक'-गन बुलट भरूँ.*
मुझ पर सब संपर्क सुरक्षित फिर भी प्रतिदिन मौन धरूँ.
ब्लॉग-जगत में बतियाने के सुख से कैसे पीठ करूँ?
_____________________

शब्दार्थ :
'नयन-पलक'-गन बुलट भरूँ = गन (पिस्तोल) में जैसे बुलट (गोलियाँ) भरी जाती हैं उसी प्रकार मैं अपने नयन के पलकों को खोलकर 'अब आये, अब आये' दर्शन लालसा को भर रहा हूँ.
बुलत = बोलते हुए

शनिवार, 4 जून 2011

छंद-चर्चा ...... [पाठ ५] ......... वर्णिक जातियाँ

पिछले पाठ 'प्रत्यय विचार' में हमने वर्णों की जातियों के प्रस्तार के बारे में जाना था वह भी केवल अत्युक्ता जाति के चार छंदों को उदाहरणों के माध्यम से उसी क्रम में तीन वर्णों वाली मध्या जाति के आठ छंद होते हैं और चार वर्णों वाली प्रतिष्ठा जाति के सौलह छंद होते हैं,.... जिसे हम एक सूची के माध्यम से आगे समझेंगे फिलहाल तो वर्णिक छंद को एक बार फिर से समझते हैं यह वर्णिक छंद क्या है? एक उदाहरण से समझते हैं :
प्रायः पाठशालाओं और विद्यालयों में विद्यार्थियों को पंक्तिबद्ध आने-जाने का अनुशासन होता है। कुछ बड़े विद्यालयों [कोलिजों] में जिसकी छूट होती है। वहाँ मनमाने ढंग से आना और जाना है। वहाँ पंक्ति की आवश्यकता नहीं रहती।

किसी भी भाषा को सीखने वाला चाहता है कि वह उस भाषा का पंडित बने। इसलिये वह अधिक से अधिक शब्दों से अपनी प्रायोगिक भाषा को समृद्ध कर लेना चाहता है। वह भाँति-भाँति के प्रयोगों के माध्यम से अपना शब्द-भण्डार विकसित करता है। भाषा का पंडित होकर वह भाषा को प्रभावपूर्ण व आकर्षक बनाना चाहता है। यह सब कैसे हो? क्या सोचने से ही हम भाषा पर नियंत्रण कर लेते हैं? नहीं ना... उसके लिये हम छोटे-छोटे अभ्यास करते हैं। जिसमें शब्दकोश हमारी सहायता करता है। क्योंकि गुरु सशरीर सर्वविद्यमान नहीं इसलिये हम परस्पर संवाद करके, विमर्श करके, प्रतिस्पर्धा करके स्वयं का क्रमतर विकास करते चलते हैं।

प्रारम्भ में एक छोटा बाल-विद्यार्थी पाठशाला में आकर दौड़ लगाने से बहुत पहले हाथ-पाँव हिलाता है, पीटी करता है।  वाक्य बनाने से बहुत पहले वर्ण को पहचानना, लिखना और सही उच्चारण करना सीखता है। उसी प्रकार हम छंद में निष्णात होने से बहुत पहले शब्द-अनुशासन करना सीखते हैं। उन्हें पंक्तिबद्ध करना सीखते हैं। अंत्यानुप्रास वाले शब्दों की सूचियाँ बनाते हैं अर्थात एक तुक वाले शब्दों के चार्ट बनाकर उनके अर्थों से परिचित होते हैं। यथा : कल, चल, छल, जल, तल, दल, नल, पल, फ़ल, बल, मल, हल। कुछ और भी मिलते-जुलते शब्दों के अर्थ जानकार इसी सूची में जोड़ देते हैं - खल, गल, ढल,  थल

इसी तरह का एक और अभ्यास करते हैं : प्यार, सियार, तैयार........ समझे यार
मतलब ये कि ऐसे छोटे-छोटे प्रयास विद्यार्थी जीवन में ही कर लेने चाहिए। इस अभ्यास के बाद ही वर्णिक और मात्रिक विधानों के अनुसार छंद से खेलना चाहिए।

जिन छंदों के प्रति-पाद [प्रत्येक पंक्ति] में वर्ण-क्रम एवं संख्या की नियत योजना रहती है उन्हें वर्णिक छंद कहते हैं। ये वर्णिक छंद भी सम, अर्धसम एवं विषम तीन प्रकार के होते हैं

वर्णिक छंद के 'साधारण' तथा 'दंडक' — भेदों का उल्लेख करते हुए छंद-शास्त्रियों ने बताया है कि वर्ण-वृत्तों में सामान्यतः 26 वर्ण प्रति-पाद की सीमा है. 26 से अधिक वर्णों वाले छंद दंडक वार्णिक छंद कहलाते हैं। जिज्ञासु और छंद के अभ्यासी विद्यार्थियों की सुविधा के लिये आचार्यों ने साधारण-वृत्तों को वर्ण-संख्यानुसार 26 जातियों में विभाजित किया है।

वर्णिक जातियों के नाम एवं प्रस्तार-विधि द्वारा उनके संभव भेदों की संख्या का विवरण कुछ इस प्रकार है :
वर्ण संख्या           जाति-नाम              प्रस्तार-भेद 
..... 1 .......             उक्ता ..........................2
..... 2 .......             अत्युक्ता .....................4
..... 3 .......             मध्या ........................8 
..... 4 .......             प्रतिष्ठा .......................16
..... 5 .......             सुप्रतिष्ठा ....................32
..... 6 .......             गायत्री .......................64
..... 7 .......             उष्णिक .....................128 
..... 8 .......             अनुष्टुप ......................256 
..... 9 .......             बृहती ........................512
..... 10 .......           पंक्ति .........................1024
..... 11 .......           त्रिष्टुप ........................2048
..... 12 .......           जगती ......................4096
.... 13 .......            अति जगती ..............8192 
.... 14 .......            शक्वरी .....................16384
.... 15 .......            अतिशक्वरी ..............32768
.... 16 .......            अष्टि .........................65536
.... 17 .......            अत्यष्टि ....................131072
.... 18 .......            घृति .........................262144
.... 19 .......            अतिघृति ..................524288
.... 20 .......            कृति .........................1048576 
.... 21 .......            प्रकृति ......................2097152
.... 22 .......            आकृति ....................4194304
.... 23 .......            विकृति ....................838808
.... 24 .......            संस्कृति ...................1677216
.... 25 .......            अतिकृति .................33554432
.... 26 .......            उत्कृति ....................67108864


हिन्दी साहित्य में प्रचलित छंद तो बहुत से हैं जिनके लक्षण और उदाहरण आगामी पाठों के साथ देने का सोचा है। फिलहाल जो अप्रचलित हैं उन वर्णिक छंदों का अभ्यास किया है। उन्हें आपके समक्ष रखता हूँ : 
छह वर्ण वाले गायत्री छंद के कुल चौंसठ भेद हैं। सात वर्ण वाले उष्णिक् जाति के १२८ भेद हैं और आठ वर्ण वाले अनुष्टुप् जाति के २५६ भेद हैं. यहाँ कुछ उदाहरण संस्कृत सूत्रों के साथ दे रहा हूँ।  मुझे कुछ छंद-भेद जाति नाम सहित प्राप्त हुए उतने ही उदाहरण रच दिये :


जाति = गायत्री ..... वर्ण = 6 ......कुल भेद = 64.....  
जाति = उष्णिक् ..... वर्ण = 7 ......कुल भेद = 128..... 
जाति = अनुष्टुप्  ..... वर्ण = 8 ......कुल भेद = 256..... 
[१] तनुमध्या — ताया तनुमध्या [ताराज यमाता — SSI  I SS]
[२] शशि वदना — शशिवदनान्यौ  [नसल यमाता —I I I  I SS ]
[३] विद्युल्लेखा — मा मा विद्युल्लेखा [मातारा मातारा — SSS SSS ]
[४] वसुमती — ता सा वसुमती [ताराज सलगा — SS I  I I S ]
[५] मदलेखा — मा सा गा मदलेखा [मातारा सलगा गा — SSS  I I S S ]
[६] कुमार ललिता — कुमार ललिता। ज साग सयुता है। [जभान सलगा गा — I S I  I I S S ]
[७] हंसमाला —  सरगा हंसमाला [सलगा राजभा गा — I I S  S I S S ]
[८] चित्रपदा — चित्रपदा भ भ गा गा [भानस भानस गा गा — S I I  S I I S S ]


१] तनुमध्या — ताया तनुमध्या
तू यौतुक है री! 
ओ वासकसज्जा! 
आलिंगन में आ 
छोड़ो अब लज्जा.

तेरे मुख जैसी 
लाली मय संध्या 
ताराधिप जैसी 
तन्वी तनुमध्या.
__________
यौतुक =  दहेज़,
वासकसज्जा = एक प्रकार की नायिका जो प्रियतम से मिलने के लिए शृंगार करके प्रतीक्षा करती है.
ताराधिप = तारापति/चन्द्रमा
तन्वी = कृशांगी
तनुमध्या = मध्य से कृश अर्थात कमर से पतली


[२] शशि वदना — शशिवदनान्यौ 
नयन चलाती 
पलक गिराती 
रति बन नारी 
मदन रिझाती.

मधुरम नारी
प्रियतम प्यारी
हँसि मत जा री
शशिवदना री!

[३] विद्युल्लेखा — मा मा विद्युल्लेखा
मामूली चिंगारी
हो जाती है शोला. 
गौरी आई जैसे 
कामी हूवे भोला.

विश्वामित्रांगो को 
था मैना ने देखा. 
जागे प्यासे नैना 
जैसे विद्युल्लेखा.
______
हूवे = हो गए

[४] वसुमती — ता सा वसुमती
"तू सुन्दर परी 
संध्या सहचरी
लाली पिय अरी! 
तू क्यूँकर मरी?" 

"आती छल निशा 
होती दुर् दशा 
हो लें अब सती"
भोली वसुमती! 
________
वसुमती = पृथ्वी

[५] मदलेखा — मा सा गा मदलेखा
माँ! संग्राम करूँगा 
तेरा नाम करूँगा 
तेरी ओर उठी जो 
आँखें वाम करूँगा. 

बाजी है रणभेरी 
मस्ती में गज देखा 
जीतेंगे अब पक्का 
जागी है मदलेखा.

[६] कुमार ललिता — कुमार ललिता। ज साग सयुता है। 
जिसे ग़लत जाना 
उसे फिर मिटाना 
निशा तम हटाके 
कलाधर कहाना. 

हटाकर बहाना 
निशा-यवनिका का 
सभी कुछ दिखाना 
कुमार ललिता का. 

[७] हंसमाला —  सरगा हंसमाला 
सुर गैया सुशृङ्गी! 
करुणा दृष्टि तेरी 
पड़ जाये यहाँ भी 
तुम आना पियारी. 

पयदेवी! पिलारी 
पय, मैं ब्रह्मचारी 
सुनना री, पुजारी 
बन आया यहाँ री. 

तुम ऎसी लगे हो 
दिखती कंठ माला 
तुम हंसी बनी हो 
फबती हंसमाला. 
____________
सुर गैया सुशृङ्गी = कामधेनु सुन्दर सींग वाली
पयदेवी = गाय, दुग्ध देवी.

[८] चित्रपदा — चित्रपदा भ भ गा गा
भारत भाग्य विधाता 
भूल गया इतराता.
गूँज रही रण भेरी 
गौरव गान गवाता. 

याद नहीं उसको है 
शायद भीषण होगा 
युद्ध, जहाँ रहने को 
जीवन भी मृत होगा. 

संभवतः बच जाये  
मानवता कुछ बाक़ी 
भावुकता तब बाँधे 
मानवता-कर राखी. 

ब्राह्मण वैश्य बचेंगे 
क्षत्रिय भारतवासी. 
चित्रपदा कहती है 
मानवता अविनाशी. 


प्रश्न : 
[१] उपर्युक्त आठ उदाहरणों में से कौन-से छंद गायत्री जाति के, कौन-से उष्णिक जाति के और कौन-से अनुष्टुप जाति  के हैं?
[२] दंडक छंद की सरल पहचान क्या है? 




मंगलवार, 31 मई 2011

'गप-गप-गप'

मेरी उर क्यारी में उगते
तरह-तरह के नव पादप.
जिसे देखकर हर्षित रहता
प्रेम निरंतर 'टप-टप-टप'.

कोई प्रतिदिन पुष्प दिखाता
कोई महीनों करता तप.*
गुणग्राहक समभाव हमारा
स्मृतियों में सामूहिक जप.

कोई चुल्लू भर ही पीता

कोई दिनभर गप-गप-गप.
बिना पुष्प वाले पादप को
करता हूँ ना 'हप-हप-हप'.*

कोई सदाबहारी पादप
कोई साधक बना विटप.*
सबके अपने-अपने गुण हैं
नयनों में सब जाते छप.

_________________________
* उपर्युक्त 'विषम मात्रिक' छंद में (पहली तारांकित पंक्ति में) एक मात्रा अधिक है लेकिन वह ''मात्रिक-विधान'
[कोई मासिक करता तप] से अधिक उपयुक्त लग रहा है. क्यों?
* हप-हप-हप — अपने से छोटे या प्रिय को प्रेमपूर्वक फटकार लगाने का भावयुक्त शब्द.
* विटप — पौधे का बड़ा रूप 'पेड़', जो छाँव देने योग्य हो जाये. साधकों से साक्षात कोई मीठा फ़ल बेशक न मिलता हो किन्तु उनकी अनुभवपरक छाँव में हमारे तमाम तनाव विलीन हो जाते हैं. कई दुर्लभ ऐसे भी होते हैं जो फ़ल भी देते हैं और छाँव भी... सभी का महत्व है... कम-ज्यादा आँक कर उनकी क्षमताओं में हीन-भावना नहीं डालनी चाहिए.
छंद विषयक़ चर्चा का कहीं अंत नहीं. फिर भी किसी पाठ को देने से पहले एक तैयारी होनी चाहिए. उस तैयारी के लिये मनःस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण शंका-समाधान और विमर्श के लिये स्वयं को अविलम्ब झोंकना  होता है..उसके लिए अभी परिस्थितियाँ  उपयुक्त नहीं मिल पा रही हैं. छंद की पुस्तकीय सामग्री को जब तक अपने भावों का आवरण न पहना दूँ - कैसे कहूँ?  

गुरुवार, 26 मई 2011

विषैला आलिंगन

श्वासों का हो गया समन्वय 
हृदय अनल के घेरे में 
हो ढूँढ रहा था शीतलता-आलंबन।  

अनिल दौड़ता होकर निर्भय
गरम-गरम श्वासों का चलना 
जला रहा था हृदय का नंदन-वन। 

शीत्कार की ध्वनि, संकुचित 
भविष्य-द्वार, होता पर-शोषित 
कसी जा रही थी बाहों की जकड़न।  

संयम था आश्चर्य चकित 
निज पाक अनल में डाल दिया 
किसने चोरी से विषैला आलिंगन। 

कंदर्प-रति षड़यंत्र सफल 
कर, मुस्काते जाते ध्वनि करते 
निज हाथों से करतल, अन्तस्तल। 

संयम ने फिर जाल बिछाया 
काम रती* को दंड दिलाकर 
जोड़ दिया दुर्बल मर्यादा बंधन, ... क्रन्दन!!  
__________
*रती = सही शब्द रति

प्रश्न : उपयुक्त कविता किस कोटि की रचना कही जानी चाहिए ?
— शुद्ध शृङ्गार
— शृङ्गार रसाभास 
— शान्त रस 
— शान्त रसाभास 

रविवार, 22 मई 2011

'हाँ' 'नहीं' मगर...

ओ प्रकृति प्रेमि, प्रियतमे अंक! 
मुझको सबसे प्रिय लगे पंक.
खिलता उसमें से ही सरोज
रमणीक वारि भी हुआ रंक. 

ओ ग़ज़ल प्रिये, गज गमन चली! 
मुझको कविता ही लगे भली. 
चलती निज कविता तुरग चाल 
भूलोगी चलना ग़ज़ल-गली. 

चन्दन सुगंध लेने वाली ! 
मेरी पसंद लिपटी व्याली. 
व्याली पसंद आनंद गंध 
आनंद गंध सबसे आली. 

संयाव आपका मधुर भोज 
पायस भोजों में महा भोज. 
घृत मूल मिला इसमें रहता 
पय देख याद आता पयोज. 

"किसका स्पर्श सबसे सुन्दर?" 
ये प्रश्न आपको विचलित कर 
क्यूँ गया, मुझे संकोच हुआ 
"क्या है समीर?".. 'हाँ' नहीं' मगर.
________
शब्दार्थ : 
वारि - जल
व्याली - नागिन
पायस - खीर 
संयाव - हलवा

मंगलवार, 17 मई 2011

छंद चर्चा .............. पाठ ४ ........ प्रत्यय विचार

अब तक आपने 'प्रत्यय' का अर्थ suffix के रूप में ही जाना होगा और मैंने भी व्याकरण अध्ययन के समय उपसर्ग के साथ  इससे पहचान की थी. किन्तु जब छंद-ज्ञान करने को पुस्तकों के बीच घूमा तो इसके एकाधिक अर्थ-रूपों से परिचय हुआ. प्रत्यय अर्थात ज्ञान, बुद्धि, विश्वास, शपथ, प्रमाण, रूप-निश्चय. किन्तु छंदों के भेद और उनकी संख्याएँ जानने की रीति भी प्रत्यय कहलाती है. 

प्रत्यय के अन्य अर्थ हैं : सम्मति, निर्णय, चिह्न, आवश्यकता, व्याख्या, विचार, आचार, प्रसिद्धि, कारण, हेतु, छिद्र, सहायक, स्वाद. 

एक शब्द के इतने सारे अर्थ जानने के बाद मन में प्रश्न उठता है कि एक शब्द के विविध अर्थ कैसे संभव हैं? या, एक शब्द में से अनेक अर्थ कैसे निकल पड़ते हैं? 

प्रत्यय का लक्षण – प्रत्यय का अर्थ है ज्ञान. ज्ञान के साधन को भी प्रत्यय कह सकते हैं. इस दृष्टि से छंद-शास्त्र में प्रत्यय उस  विधा को कहेंगे जो छंद-भेद संख्या आदि का विस्तृत ज्ञान कराये. 

"जिन साधनों से छंदों के भेद, उनकी संख्या तथा उनके पृथक्-पृथक् रूप आदि का बोध हो, उन्हें प्रत्यय कहते हैं." 

छंद-विधा का विशद ज्ञान कराने वाले साधन अर्थात प्रत्यय नौ हैं : 

१] प्रस्तार, २] सूची, ३] नष्ट, ४] उद्दिष्ट, ५] पाताल, ६] मेरु, ७] खंड-मेरु, ८] पताका, और ९] मर्कटी. 

प्रस्तार — शब्दार्थ द्वारा ही प्रस्तार का अभिप्राय स्पष्ट होता है. [विस्तार अथवा फैलाव]

"जिस साधन से यह ज्ञात हो कि किसी जाति के किस छंद का कितनी संख्या तक और किन-किन रूपों में फैलाव हो सकता है, उसे 'प्रस्तार' कहते हैं." 

प्रस्तार का आधार अंकगणित की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मूल और निर्दिष्ट संख्याओं के आकलन के द्वारा उनके संभाव्य समाहारों का ज्ञान होता है. छंदों का मूल आधार 'वर्ण' एवं 'मात्रा' है, तदनुसार प्रस्तार के दो भेद हैं – 
[१] वर्ण प्रस्तार और [२] मात्रा प्रस्तार 

[१] वर्ण प्रस्तार : 
जिस साधन के द्वारा वार्णिक छंदों की किसी जाति के भेदों का स्वरुप ज्ञात किया जाये, वह वर्ण-प्रस्तार कहलाता है.
उदाहरण : 
(क़) दो वर्णों की (अत्युक्ता) जाति का प्रस्तार — 
संख्या ......................... रूप 
.. 1 .............................. S S
.. 2 .............................. I S
.. 3 .............................. S I
.. 4 .............................. I I                                        
इस प्रकार दो वर्णों की जाति में कुल चार छंद बन सकते हैं. 

पहला छंद : 
[ S S ]
आओ 
बैठो 
खाओ 
लेटो 
सोना 
चाहो 
सो लो 
सेठो! 

दूसरा छंद : 
[ I S ] 
जु ड़ा
हुआ 
गवाँ
दिया.... ..............मतलब  पूँजी 
जु ड़ा 
हुआ 
विदा 
किया. ................ मतलब सम्बन्ध.
जु ड़ा 
हुआ
तु ड़ा 
लिया. .................. मतलब बँटवारा पैत्रिक संपत्ति का. 

जु ड़ा
हुआ.
जु ड़ा 
दिखा. ................ मतलब जो भी एक बार टूट कर जुड़ता है तो उसमें गाँठ पड़ी दिखायी देती ही है. 

तीसरा छंद : 
[ S I ]
राम 
नाम 
सत्य 
होत. 
सत्य  
नाम 
गत्य 
होत. 

राम 
नाम 
बीज 
बोत.
राम 
नाम 
खेत 
जोत.

या फिर 
दोस्त 
दोस्त 
ना र 
हा पि 
यार
प्यार 
ना र 
हा.......... ये पंक्ति भी अतियुक्ता जाति के छंद की ध्वनि लिए है.  

चौथा छंद : 
[ I I ]
तन
मन 
धन 
सब 
ऋण 
कर. 

तिल 
भर 
सुख 
दुःख  
तृण
कर. 

... इस अजीबोगरीब कविताई से मैंने केवल यह बताना चाहा है कि छंद केवल कुछ शब्दों का समुच्चय मात्र नहीं है वह किसी इकलौते शब्द में भी निहित हो सकता है. बस उस शब्द में यदि कहने वाला आनंद प्रविष्ट कर दे तो वह छंद हो जाता है. एक सरल उदाहरण से कहता हूँ : 
कभी-कभी कवि या गीतकार कोई रचना करता है... पढ़ने में बिलकुल नीरस होती है.. किन्तु संगीत की समझ वाला गायक उसे गाता है तो वह गेय हो  जाता है. लता जी ने ऎसी कई रचनाओं को गाकर गीत की श्रेणी में ला दिया जो पढ़ने पर नीरसता लिये थे. 

कुछ रचनाओं का द्रुतम पाठ उन्हें गेयता दे देता है तो कुछ रचनाओं का विलंबित/ अति विलंबित पाठ उन्हें मधुरम गीत की श्रेणी में ला देता है. और कुछ का पाठ वाकयंत्र के विविध आयामी प्रयोग से उत्कृष्ट हो जाता है. 
मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि छंद की सभी जातियों का परिचय अति साधारण तरीके से करा सकूँ. इस बार प्रत्यय के केवल वर्ण-प्रस्तार में अत्युक्ति जाति के छंद को बताने की कोशिश की है.