मंगलवार, 31 मई 2011

'गप-गप-गप'

मेरी उर क्यारी में उगते
तरह-तरह के नव पादप.
जिसे देखकर हर्षित रहता
प्रेम निरंतर 'टप-टप-टप'.

कोई प्रतिदिन पुष्प दिखाता
कोई महीनों करता तप.*
गुणग्राहक समभाव हमारा
स्मृतियों में सामूहिक जप.

कोई चुल्लू भर ही पीता

कोई दिनभर गप-गप-गप.
बिना पुष्प वाले पादप को
करता हूँ ना 'हप-हप-हप'.*

कोई सदाबहारी पादप
कोई साधक बना विटप.*
सबके अपने-अपने गुण हैं
नयनों में सब जाते छप.

_________________________
* उपर्युक्त 'विषम मात्रिक' छंद में (पहली तारांकित पंक्ति में) एक मात्रा अधिक है लेकिन वह ''मात्रिक-विधान'
[कोई मासिक करता तप] से अधिक उपयुक्त लग रहा है. क्यों?
* हप-हप-हप — अपने से छोटे या प्रिय को प्रेमपूर्वक फटकार लगाने का भावयुक्त शब्द.
* विटप — पौधे का बड़ा रूप 'पेड़', जो छाँव देने योग्य हो जाये. साधकों से साक्षात कोई मीठा फ़ल बेशक न मिलता हो किन्तु उनकी अनुभवपरक छाँव में हमारे तमाम तनाव विलीन हो जाते हैं. कई दुर्लभ ऐसे भी होते हैं जो फ़ल भी देते हैं और छाँव भी... सभी का महत्व है... कम-ज्यादा आँक कर उनकी क्षमताओं में हीन-भावना नहीं डालनी चाहिए.
छंद विषयक़ चर्चा का कहीं अंत नहीं. फिर भी किसी पाठ को देने से पहले एक तैयारी होनी चाहिए. उस तैयारी के लिये मनःस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण शंका-समाधान और विमर्श के लिये स्वयं को अविलम्ब झोंकना  होता है..उसके लिए अभी परिस्थितियाँ  उपयुक्त नहीं मिल पा रही हैं. छंद की पुस्तकीय सामग्री को जब तक अपने भावों का आवरण न पहना दूँ - कैसे कहूँ?  

गुरुवार, 26 मई 2011

विषैला आलिंगन

श्वासों का हो गया समन्वय 
हृदय अनल के घेरे में 
हो ढूँढ रहा था शीतलता-आलंबन।  

अनिल दौड़ता होकर निर्भय
गरम-गरम श्वासों का चलना 
जला रहा था हृदय का नंदन-वन। 

शीत्कार की ध्वनि, संकुचित 
भविष्य-द्वार, होता पर-शोषित 
कसी जा रही थी बाहों की जकड़न।  

संयम था आश्चर्य चकित 
निज पाक अनल में डाल दिया 
किसने चोरी से विषैला आलिंगन। 

कंदर्प-रति षड़यंत्र सफल 
कर, मुस्काते जाते ध्वनि करते 
निज हाथों से करतल, अन्तस्तल। 

संयम ने फिर जाल बिछाया 
काम रती* को दंड दिलाकर 
जोड़ दिया दुर्बल मर्यादा बंधन, ... क्रन्दन!!  
__________
*रती = सही शब्द रति

प्रश्न : उपयुक्त कविता किस कोटि की रचना कही जानी चाहिए ?
— शुद्ध शृङ्गार
— शृङ्गार रसाभास 
— शान्त रस 
— शान्त रसाभास 

रविवार, 22 मई 2011

'हाँ' 'नहीं' मगर...

ओ प्रकृति प्रेमि, प्रियतमे अंक! 
मुझको सबसे प्रिय लगे पंक.
खिलता उसमें से ही सरोज
रमणीक वारि भी हुआ रंक. 

ओ ग़ज़ल प्रिये, गज गमन चली! 
मुझको कविता ही लगे भली. 
चलती निज कविता तुरग चाल 
भूलोगी चलना ग़ज़ल-गली. 

चन्दन सुगंध लेने वाली ! 
मेरी पसंद लिपटी व्याली. 
व्याली पसंद आनंद गंध 
आनंद गंध सबसे आली. 

संयाव आपका मधुर भोज 
पायस भोजों में महा भोज. 
घृत मूल मिला इसमें रहता 
पय देख याद आता पयोज. 

"किसका स्पर्श सबसे सुन्दर?" 
ये प्रश्न आपको विचलित कर 
क्यूँ गया, मुझे संकोच हुआ 
"क्या है समीर?".. 'हाँ' नहीं' मगर.
________
शब्दार्थ : 
वारि - जल
व्याली - नागिन
पायस - खीर 
संयाव - हलवा

मंगलवार, 17 मई 2011

छंद चर्चा .............. पाठ ४ ........ प्रत्यय विचार

अब तक आपने 'प्रत्यय' का अर्थ suffix के रूप में ही जाना होगा और मैंने भी व्याकरण अध्ययन के समय उपसर्ग के साथ  इससे पहचान की थी. किन्तु जब छंद-ज्ञान करने को पुस्तकों के बीच घूमा तो इसके एकाधिक अर्थ-रूपों से परिचय हुआ. प्रत्यय अर्थात ज्ञान, बुद्धि, विश्वास, शपथ, प्रमाण, रूप-निश्चय. किन्तु छंदों के भेद और उनकी संख्याएँ जानने की रीति भी प्रत्यय कहलाती है. 

प्रत्यय के अन्य अर्थ हैं : सम्मति, निर्णय, चिह्न, आवश्यकता, व्याख्या, विचार, आचार, प्रसिद्धि, कारण, हेतु, छिद्र, सहायक, स्वाद. 

एक शब्द के इतने सारे अर्थ जानने के बाद मन में प्रश्न उठता है कि एक शब्द के विविध अर्थ कैसे संभव हैं? या, एक शब्द में से अनेक अर्थ कैसे निकल पड़ते हैं? 

प्रत्यय का लक्षण – प्रत्यय का अर्थ है ज्ञान. ज्ञान के साधन को भी प्रत्यय कह सकते हैं. इस दृष्टि से छंद-शास्त्र में प्रत्यय उस  विधा को कहेंगे जो छंद-भेद संख्या आदि का विस्तृत ज्ञान कराये. 

"जिन साधनों से छंदों के भेद, उनकी संख्या तथा उनके पृथक्-पृथक् रूप आदि का बोध हो, उन्हें प्रत्यय कहते हैं." 

छंद-विधा का विशद ज्ञान कराने वाले साधन अर्थात प्रत्यय नौ हैं : 

१] प्रस्तार, २] सूची, ३] नष्ट, ४] उद्दिष्ट, ५] पाताल, ६] मेरु, ७] खंड-मेरु, ८] पताका, और ९] मर्कटी. 

प्रस्तार — शब्दार्थ द्वारा ही प्रस्तार का अभिप्राय स्पष्ट होता है. [विस्तार अथवा फैलाव]

"जिस साधन से यह ज्ञात हो कि किसी जाति के किस छंद का कितनी संख्या तक और किन-किन रूपों में फैलाव हो सकता है, उसे 'प्रस्तार' कहते हैं." 

प्रस्तार का आधार अंकगणित की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मूल और निर्दिष्ट संख्याओं के आकलन के द्वारा उनके संभाव्य समाहारों का ज्ञान होता है. छंदों का मूल आधार 'वर्ण' एवं 'मात्रा' है, तदनुसार प्रस्तार के दो भेद हैं – 
[१] वर्ण प्रस्तार और [२] मात्रा प्रस्तार 

[१] वर्ण प्रस्तार : 
जिस साधन के द्वारा वार्णिक छंदों की किसी जाति के भेदों का स्वरुप ज्ञात किया जाये, वह वर्ण-प्रस्तार कहलाता है.
उदाहरण : 
(क़) दो वर्णों की (अत्युक्ता) जाति का प्रस्तार — 
संख्या ......................... रूप 
.. 1 .............................. S S
.. 2 .............................. I S
.. 3 .............................. S I
.. 4 .............................. I I                                        
इस प्रकार दो वर्णों की जाति में कुल चार छंद बन सकते हैं. 

पहला छंद : 
[ S S ]
आओ 
बैठो 
खाओ 
लेटो 
सोना 
चाहो 
सो लो 
सेठो! 

दूसरा छंद : 
[ I S ] 
जु ड़ा
हुआ 
गवाँ
दिया.... ..............मतलब  पूँजी 
जु ड़ा 
हुआ 
विदा 
किया. ................ मतलब सम्बन्ध.
जु ड़ा 
हुआ
तु ड़ा 
लिया. .................. मतलब बँटवारा पैत्रिक संपत्ति का. 

जु ड़ा
हुआ.
जु ड़ा 
दिखा. ................ मतलब जो भी एक बार टूट कर जुड़ता है तो उसमें गाँठ पड़ी दिखायी देती ही है. 

तीसरा छंद : 
[ S I ]
राम 
नाम 
सत्य 
होत. 
सत्य  
नाम 
गत्य 
होत. 

राम 
नाम 
बीज 
बोत.
राम 
नाम 
खेत 
जोत.

या फिर 
दोस्त 
दोस्त 
ना र 
हा पि 
यार
प्यार 
ना र 
हा.......... ये पंक्ति भी अतियुक्ता जाति के छंद की ध्वनि लिए है.  

चौथा छंद : 
[ I I ]
तन
मन 
धन 
सब 
ऋण 
कर. 

तिल 
भर 
सुख 
दुःख  
तृण
कर. 

... इस अजीबोगरीब कविताई से मैंने केवल यह बताना चाहा है कि छंद केवल कुछ शब्दों का समुच्चय मात्र नहीं है वह किसी इकलौते शब्द में भी निहित हो सकता है. बस उस शब्द में यदि कहने वाला आनंद प्रविष्ट कर दे तो वह छंद हो जाता है. एक सरल उदाहरण से कहता हूँ : 
कभी-कभी कवि या गीतकार कोई रचना करता है... पढ़ने में बिलकुल नीरस होती है.. किन्तु संगीत की समझ वाला गायक उसे गाता है तो वह गेय हो  जाता है. लता जी ने ऎसी कई रचनाओं को गाकर गीत की श्रेणी में ला दिया जो पढ़ने पर नीरसता लिये थे. 

कुछ रचनाओं का द्रुतम पाठ उन्हें गेयता दे देता है तो कुछ रचनाओं का विलंबित/ अति विलंबित पाठ उन्हें मधुरम गीत की श्रेणी में ला देता है. और कुछ का पाठ वाकयंत्र के विविध आयामी प्रयोग से उत्कृष्ट हो जाता है. 
मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि छंद की सभी जातियों का परिचय अति साधारण तरीके से करा सकूँ. इस बार प्रत्यय के केवल वर्ण-प्रस्तार में अत्युक्ति जाति के छंद को बताने की कोशिश की है.


शनिवार, 14 मई 2011

सुख की बेटी

दसन-वसन फैला करके 
शयन कर रही थी लेटी. 
शरमा बैठी जब वसन हटे
तन-दंत दिखे कटि की पेटी. 

कर घेर छिपाने को आईं 
दिहली पर खड़ी हुईं चेटी. 
नवसू कहलायेगी जल्दी
होरिल जनकर सुख की बेटी. 

रतनार कपोल भये उसके 
हेरम्ब-कथन निकला कपटी. 
हैं दीप-नयन जलते उसके
रीझेगा फिर से आस बँधी. 
________________
दसन-वसन — दाँतों के कपड़े 
तन-दंत — शरीर रूपी दाँत 
कटि की पेटी — दाँतों की कमर की पेटी अर्थात मसूडे. 
दिहली —  दहलीज
दिहली पर खड़ी हुईं चेटी से तात्पर्य ... मुख पर खड़ी हुई दासियाँ अर्थात मुस्कुराने से कपोलों पर पड़ी रेखाएँ.
नवसू — नवप्रसूता, 'हँसने वाली' से तात्पर्य  
होरिल — नवजात शिशु, 'हँसी' से तात्पर्य 
सुख की बेटी — मुस्कान
हेरम्ब-कथन — धीरोद्धत नायक की भाँति धोखेबाजी, चपलता और लम्पटता गुणों से युक्त कथन [जो मुस्कान को गर्भवती कर छिपकर भाग गया]

शनिवार, 7 मई 2011

छंद-चर्चा ................... पाठ-३


पिछले पाठों में हम छंद-विषयक कुछ महत्वपूर्ण बातें छोड़ कर आगे बढ़ आये थे और पहले उन बातों को पूरा कर लेते हैं... छंद में लय-युक्त प्रवाह का होना बेहद आवश्यक है. इसी 'गीति-प्रवाह' को गति कहते हैं. 

एक कविता कहता हूँ, उसका गीति-प्रवाह देखिएगा... मैं यदि कविवरश्रेष्ठ राजेन्द्र स्वर्णकार जी की तरह ऑडियो पोस्ट से जोड़ने का ज्ञान रखता तो अवश्य गाकर इसे आपको उपलब्ध कराता.. क्योंकि मेरी अधिकांश कवितायें गेय हैं. मुक्त-छंद में लिखी कविताओं का पाठ भी एक विशेष प्रकार की गीति की अपेक्षा रखता है. उसमें प्रायः विचारों की अभिव्यक्ति स्वर के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती है. 

कविता का शीर्षक है : 'मरण-विचार'

विनय अर्चन या..चना व्यर्थ। 
कलम सर्जन* सो..चना व्यर्थ। 
नुपुर नर्तन शो..भना व्यर्थ।  
नहीं इनका अब कोई अर्थ।  

कथन पिय का घू..मना व्यर्थ।  
मिलन उन का झू..लना व्यर्थ।  
सुमन चुनना चू..मना व्यर्थ।  
नहीं इनका अब कोई अर्थ।  

नयन पलकें झप..कना व्यर्थ।
रुदन आँसू टप..कना व्यर्थ।
भवन उनके पहुँ..चना व्यर्थ।
नहीं इनका अब कोई अर्थ।

दिया उनको जो उन..के अर्थ। 
लिखा उस पर जो, क्या था अर्थ?
अभी तक है मुझको वो याद। 
हमारे बीच रही जो शर्त। 

शिखर पर तुम हो मैं हूँ गर्त।  
विनय करता पर मिला अनर्थ। 
याद कर कर तेरी हो गया।    
विरह में मैं आधे से अर्ध।  

मिलन कुछ पल का विरह अपार। 
यही मुझको देता है मार।  
बिना उनके निज नयन अनाथ।  
बची दो ही आँखें हों चार।  

कपट करना उनका व्यापार।  
लिपट जाना उनका उदगार।  
मरण तो अब जीवन के लिये 
जरूरी-सा बन गया विचार। 
मरण तो अब जीवन के लिये 
जरूरी-सा बन गया विचार। 
___________
* सर्जन = सही शब्द सृजन 


दग्धाक्षर : गणों की ही तरह कुछ वर्ण भी अशुभ माने गये हैं, जिन्हें 'दग्धाक्षर' कहा जाता है.
कुल उन्नीस दग्धाक्षर हैं — ट, ठ, ढ, ण, प, फ़, ब, भ, म, ङ्, ञ,  त, थ, झ, र, ल, व, ष,  ह। 
— इन उन्नीस वर्णों का पद्य के आरम्भ में प्रयोग वर्जित है. इनमें से भी झ, ह, र, भ, ष — ये पाँच वर्ण विशेष रूप से त्याज्य माने गये हैं. 
छंदशास्त्री इन दग्धाक्षरों की काट का उपाय [परिहार] भी बताते हैं. 
परिहार : कई विशेष स्थितियों में अशुभ गणों अथवा दग्धाक्षरों का प्रयोग त्याज्य नहीं रहता. यदि मंगल-सूचक अथवा देवतावाचक शब्द से किसी पद्य का आरम्भ हो तो दोष-परिहार हो जाता है.

उदाहरण : 
गणेश जी का ध्यान कर, अर्चन कर लो आज़.
निष्कंटक सब मिलेगा, मूल साथ में ब्याज. 
इस दोहे के आरम्भ में ज-गणात्मक शब्द [121] है जो अशुभ माना गया है किन्तु देव-वंदना के कारण इसकी अशुभता का परिहार हो गया है. 

प्रश्न : क्या छंदशास्त्रीयों के अनुसार 'मरण-विचार' नामक कविता अशुभ वर्ण आरंभी है? 
प्रश्न : 'दग्धाक्षर' का अन्य कल्पित अर्थ बतायें, क्या हो सकता है? क्यों छंद-शास्त्री दग्धाक्षर से इतना घबराया करते थे? 
प्रश्न : क्या स्वरों का हमारे स्वास्थ्य पर अच्छा-बुरा प्रभाव पड़ता है? 

पिछली कक्षा में 'भाषा-विज्ञान' विषय भी हमने शामिल कर लिया था. इस बार केवल एक कारण को खोलकर बता देते हैं कि कोई शब्द धीरे-धीरे क्योंकर अपना उच्चारण या रूप बदल लेता है. 
[१] वाक् यन्त्र की विभिन्नता : विश्व के प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक रचना जिस प्रकार भिन्न-भिन्न है, उसी प्रकार उनका वाक्-यन्त्र भी एक-दूसरे से थोड़ा-बहुत जरूर भिन्न मिलेगा. परिणामस्वरूप वाक्-यन्त्र से उच्चरित ध्वनियों में भी अंतर पड़ जाता है. एक ही ध्वनि का स्वरुप एक व्यक्ति के उच्चारण में जैसा होगा वैसा दूसरे के उच्चारण में नहीं मिलेगा. शुरू-शुरू का यह थोड़ा अंतर धीरे-धीरे बढ़कर पूर्णतया बदल जाता है. सभी भाषा वैज्ञानिक इस कारण को अभी अधिक तवज्जो नहीं देते...

प्रश्न : भाषा वैज्ञानिक किसे कहते हैं? 
ऑप्शन : 
— जो भाषा में तरह-तरह के देसी-विदेशी शब्दों को शामिल करने की कोशिश करे. 
— जो भाषा को एरोप्लेन में बैठाकर अंतरिक्ष की सैर कराकर लाये.
— जो भाषा के विकास पर तार्किक चिंतन दे. 
— जो भाषा का आदिम रूप खोजने में जुटा रहे. 

बुधवार, 4 मई 2011

कपोल-लली

खिलने में हो लावण्य भंग
दिखने में सबको लगे भली। 
पिय दर्शन से रतनार रंग
हो जाता कनक-कपोल-लली*

नत नयन मंद मुस्कानों की
अवगुंठन की कहलाति अली**
पुरुषों के भ्रमर-लोचनों को
लगती रसदार कपोल-कली । 

*कपोल-लली — लज्जा.
**अली — सखी.





मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

'रोङ्ग नम्बर'

'रोङ्ग नंबर' के साथ छंद चर्चा और ध्वनि परिवर्तन की दिशाएँ 
किसी विषय पर होने वाली बातचीत से निकलते प्रश्न और उनके उत्तर खोजने में किया जाने वाला स्वाध्याय एक विषय को दूसरे विषय से जोड़ देता है. तब महसूस होता है कि एक विषय अपने आप में परिपूर्ण नहीं वह भी अन्य विषयों की जानकारी की अपेक्षा रखता है. मैं चला तो था छंद पर बातचीत करने लेकिन भाषा में आये बदलाव को बतलाना भी जरूरी-सा लगता है. इसलिये अब से कविता के साथ-साथ छंद-चर्चा के पाठों को भी भाषा-विज्ञान की जानकारी के साथ लेकर चलेंगे. 

'रोङ्ग नम्बर'

हलक में सिकुड़ रही थी प्यास।  
पलक का विनत हुआ था व्यास। 
स्मृतियाँ करने आयीं रास। 
दर्शन का था पर उपवास। 

अचानक दौड़ा आया स्वर। 
घुसा कानों से मम अंतर।  
मैंने गोदी लेना चाहा । 
निकल भागा कह 'रोङ्ग नंबर'। 

छंद-चर्चा 

उपर्युक्त छंद में ऐच्छिक मात्रिक विधान किया जा सकता है. 'प्यास' 'व्यास' पर तो जैसा होना चाहिए वैसा ही होगा. लेकिन 'स्मृतियाँ' शब्द में 'इ' का आगम करके 'इस्मृतियाँ' शब्द पर ऐच्छिक मात्रिक विधान करना पड़ेगा अन्यथा छंद की तीसरी पंक्ति को एक मात्रा की कमी झेलनी होगी.  दूसरा पद सममात्रिक छंद का उदाहरण है. सममात्रिक छंद में पहले व दूसरे [१-२] में और तीसरे व चौथे [३-४] में बराबर मात्राएँ होती हैं. 

ध्वनि परिवर्तन की दिशाएँ 

संस्कृत वैयाकरणों ने ध्वनियों के विकास की चार अवस्थाओं का उल्लेख किया है : [१] वर्णागम, [२] वर्णलोप, [३] वर्ण-विपर्यय, तथा [४] वर्ण विकार. वैसे तो आधुनिक भाषा वैज्ञानिकों ने ध्वनि-विकास की कई प्रमुख वजह तलाश ली हैं, जिनमें १) आगम, २) लोप, ३) विपर्यय, ४) समीकरण, ५) विषमीकरण, ६) मात्रा-भेद, ७) घोषीकरण, ८) अघोषीकरण, ९) महाप्राणीकरण, १०) अल्पप्राणीकरण, ११) ऊष्मीकरण, १२) अनुनासिकीकरण, १३) संधि, १४) भ्रामक व्युत्पत्ति, तथा १५) विशेष परिवर्तन. 

......... ये समस्त परिवर्तन मूलतः परिणाम हैं पर इनके मूल में कुछ कारण भी होते हैं. यहाँ पर उन्हीं कारणों का उल्लेख करता हूँ : 

ध्वनि-परिवर्तन के कारण 

(क) प्रमुख आभ्यंतर कारण :
— वाक् यन्त्र की विभिन्नता 
— श्रवणेन्द्रिय की विभिन्नता 
— अनुकरण की अपूर्णता 
— अज्ञान 
— प्रयत्न लाघव या मुख-सुख
— बोलने में शीघ्रता
(ख) गौण आभ्यंतर कारण :
— भावातिरेक 
— आत्म-प्रदर्शन 
— विभाषा का प्रभाव 
— मात्रा, सुर या बलाघात 
— सादृश्य 
— लिपि की अपूर्णता या लिपि दोष.
(ग) बाह्य कारण :
— भौगोलिक कारण 
— ऐतिहासिक परिस्थितियाँ या काल प्रभाव. 

.... उपर्युक्त कारणों का आगामी पाठों के साथ विस्तार किया जाएगा. अभी केवल इतना कहकर बात समाप्त करता हूँ कि वैदिक ध्वनियाँ ही संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश से होती हुई हिन्दी में आयी हैं. यह परम्परागत ध्वनि समूह विदेशियों के संपर्क से भी प्रभावित हुआ है. जैसे - द्रविड़ के संपर्क से मूर्धन्य [ट, ठ, ड, ढ] तथा मुगलों के संपर्क से क़, ख़, ग़, ज़, फ़ (पाँचों नुक्ते वाले व्यंजन) ध्वनियाँ हिन्दी में शामिल हो चुकी हैं. इस प्रकार ध्वनियाँ ऐतिहासिक तथा काल के प्रभाव से परिवर्तित होती हैं. 


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

पिछले पाठों पर एक नज़र ....

अब तक के पाठों और सवाल-जवाबों में मेरी त्रुटियों को पकड़ने की काफी कोशिश हुई. यह एक अच्छी परम्परा है कि त्रुटियों को इंगित किया जाये. लेकिन बहुतों के द्वारा गलतियों का पुरजोर विरोध न करने का कारण यही लगा कि या तो विषय के पंडित शालीनतावश नवोदित शिक्षक को सार्वजनिक रूप से बौद्धिक संवाद में चित नहीं करना चाहते, या फिर वे स्वयं को अल्पज्ञ मानकर (चुपचाप) पीछे हट जाते हैं... यह एक ग़लत परम्परा है जो स्वस्थ संवाद करने से रोकती है. 

पिछले पाठों की दोहरावट में मुझे अपनी कई त्रुटियाँ पकड़ में आयीं. अब तक मैंने मात्रिक-विधान और गण-विधान को समझाने के लिये कुछ उपाय किये. फिर भी कई शब्द ऐसे हैं जिनका मात्रिक विधान करते समय हम उलझ जाते हैं. ये किस प्रकार के शब्द हैं? और ये कैसी उलझन होती है? आज हम इन्हें ही जानेंगे. 

प्रायः हम संयुक्त व्यंजनों में उलझते हैं. हम जानते हैं कि संयुक्त व्यंजन में जो व्यंजन अर्ध रूप से आगे रहता है वह अपने से पूर्व व्यंजन को गुरु कर देता है. यथा 'अस्त' शब्द में 'अ' वर्ण गुरु हो जाएगा क्योंकि उसके बाद वाले वर्ण 'त' में 'स्' अर्ध रूप में जुड़ा हुआ है. 

कुछ शब्दों में अर्ध वर्ण स्पष्ट समझ में आते हैं जो खड़ी पाई वाले होते हैं. मतलब जिनकी बनावट में पाई [ | ] का प्रयोग होता है. ऐसे वर्ण अर्ध होते समय अपनी पाई [ | ] गँवा बैठते हैं अथवा आधे होकर साफ़-साफ़ नज़र आते हैं. यथा : क और फ वर्ण. लेकिन समस्या वहाँ आती हैं जहाँ वर्ण की बनावट संयुक्त होते समय पूरे वर्ण को ही बदलकर रख देती है. 
यथा : 'ब्राह्मण' 'क्षत्रिय' 'वैश्य और 'शूद्र'  ऐसे शब्द हैं जिनमें यदि हम गुरु और लघु वर्णों को तार्किक रूप से पहचान पायें तो काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा. 

पहले लेते हैं 'ब्राह्मण' 
इस शब्द को एक बार पूरा खोल देते हैं : [ नोट :  ^ चिह्न को हलंत मानकर ही चलें ]
 ब् + र् + अ + अ + ह् + म् + अ + ण ् + अ
इसके बाद इसे संक्षेप करते हैं जिससे गुरु और लघु वर्ण पहचान में आयें :
 ब् + र् + आ + ह् + म् + अ + ण ् + अ
इसके बाद कुछ और संक्षेप करते हैं जिससे गण-विधान करना सहज होता दिखायी दे : 
ब् + रा + ह् + म + ण
वास्तविक शब्द है : ब् + रा + ह् + म + ण= ब्राह्मण
लेकिन जो शब्द मात्रिक और गण विधान करने के लिये लेंगे,  वह है : 
रा + ह् + म + ण = राह्मण 
अब 'ब्राह्मण' शब्द में ब् और ह् वर्ण हैं जो अपने से पूर्व व्यंजन को गुरु करते हैं. लेकिन ब् से पूर्व कोई व्यंजन न होने से वह किसी को गुरु नहीं करेगा. अतः इस समय उसका होना व्यर्थ है. 
'रा' वर्ण पहले से गुरु है लेकिन 'ह' वर्ण का प्रभाव से भी वह गुरु हो सकता था. अब ऐसे में जो पहले से गुरु है वह गुरु ही रहेगा महागुरु नहीं हो जाएगा मतलब उसकी २ मात्राएँ ही गिनी जायेंगी.

अब 'क्षत्रिय' आदि शब्द को भी खोल देते हैं : 
क्षत्रिय = क् + श् + अ + त् + र + इ + य् + अ  =  क्ष् + अ + त्र् + इ + य् + अ
वैश्य = व् + अ + इ + इ + श् + य् + अ  =  व् + अ + ई + श् + य = व् + ऐ + श् + य
शूद्र = श् + उ + उ + द् + र् + अ  =  श् + ऊ + द् + र =  श् + ऊ + द्र* 
अब 'शूद्र' शब्द में 'द्र' वर्ण में 'द' अर्ध है जो अपने से पहले वर्ण को गुरु करना चाहिए. लेकिन वह पहले से गुरु है. इस कारण यह व्यर्थ हो जाता है. लेकिन एक विशेष अंदाज-ए-बयाँ पर यह स्वयम् गुरु हो जाता है जब हम अंग्रेजी प्रभाव में आकर 'शूद्र' को 'शूद्रा' कहने लगते हैं. जैसे 'योग' को 'योगा' और 'राम' को 'रामा' कहने लग जाएँ. फिर भी अनुचित तो अनुचित ही रहेगा. 

पिछले पाठों में मुझे संगीता स्वरूप जी ने कई शब्दों में इंगित किया. जिस कारण मुझे सभी पाठ खुद पढ़ने पढ़े. अच्छा है मुझे अपने ही पाठों से सीखने को मिलेगा. हरकीरत जी ने भी राजेन्द्र जी नाम पुनः उल्लेख करके कुछ कहना चाहा था, मुझे ऐसा भ्रम है. 

पिछले पाठों में प्रयुक्त शब्दों का एक बार फिर निराकरण : 
— 'स्वप्निल' शब्द में हम केवल 'वप्निल' शब्द का मात्रिक विधान करके गण पहचानेंगे. [स^ वर्ण की अर्ध मौजूदगी इस समय बेअसर है]
— 'राजेन्द्र' शब्द वास्तव में म-गण का सदस्य नहीं अपितु त-गण का सदस्य है. किन्तु राजेन्द्र' शब्द यदि अपने बाद वाले शब्द 'स्वर्णकार' के साथ लिखा जाएगा तो वह म-गण में आ बैठेगा. 'राजेन्द्र' शब्द अकेला रहेगा तो वह 'ताराज' है और यदि 'स्वर्णकार' के साथ बोला जाएगा तो वह 'मातारा' है.
— 'प्रतुल' शब्द पर वैसे तो 'स्वप्निल' शब्द पर लगा सूत्र ही लगाया जाएगा. [मतलब 'प्' वर्ण की अर्ध मौजूदगी इस समय बेअसर होगी, और रतुल शब्द का मात्रिक विधान करके गण पहचानेंगे] अर्थात यह शब्द न-गण वर्ग का है न कि भ-गण वर्ग का जैसा कि पूर्व में कहा गया था.  

कविता लेखन में मात्रिक विधान के समय में कुछ उलझाव भरे शब्द : 
'स्क' 'स्व' 'स्त' या फिर 'रेफ' वाले वर्णों में ऐच्छिक मात्रिक विधान किया जा सकता है. 
उदाहरण : 
— 'स्तर' शब्द का 'लघु लघु' मात्रिक विधान के अलावा 'इस्तर' उच्चारण करके 'गुरु लघु लघु' [भानस] का आभास भी मिलता है.
— 'स्वर' शब्द का 'लघु लघु' मात्रिक विधान के अलावा 'सुवर' उच्चारण करके 'लघु लघु लघु' [नसल] का आभास भी मिलता है. 
— 'स्कूल' 
स्कूल [21] शब्द का उच्चारण जैसे इस्कूल (या इसकूल) किया जाता है. ऐच्छिक मात्रिक विधान होगा : 221 = गुरु गुरु लघु 
स्त्री [2] शब्द का उच्चारण जैसे इस्त्री किया जाता है. ऐच्छिक मात्रिक विधान होगा : 22 = गुरु गुरु  

क्र ग्र ज्र ट्र ड्र द्र त्र प्र फ्र ब्र भ्र म्र ल्र श्र स्र ह्र आदि वर्णों का प्रारम्भिक उच्चारण कविता लेखन में यदा-कदा ऐच्छिक मात्रिक विधान की चाहना करता है. 
क्रम, ग्रह, ट्रक, ड्रम, द्रुम, प्रभु, श्रम आदि वर्ण लघु-लघु वर्ण वाले शब्द हैं किन्तु छंद की माँग पर यह विधान मुख के विशेष उच्चारण पर बदल भी सकता है. 
यथा : क्रम का किरम, ग्रह का गिरह, ट्रक का टिरक, ड्रम का डिरम, द्रुम का दिरुम, प्रभु का पिरभु, श्रम का शिरम उच्चारण करना कविता पाठ (सुनाने) में तो छूट दे देता है लेकिन उसके लिखित रूप में क्षम्य नहीं कहा जाता. अतः इन उलझावों से बचने के लिये ही ऐच्छिक मात्रिक विधान की आवश्यकता पड़ती है. छंद के लिखे जाने और उसके सुनाये जाने में अक्सर कवि छूट लेता रहा है. इसे हम बीच का रास्ता कह सकते हैं. 

........ ये समस्त उलझन मुख उच्चारण के कारण पैदा हुई है. अतः इसमें छंदविदों के मार्गदर्शन की आवश्यकता मुझे आज भी महसूस होती है. पिछले पाठों में की गयी त्रुटियों से मेरा गुरु अहंकार धरातल छूने लगा है.  





मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

फिर वही मधुर शब्दों का स्वर गुजरा कानों की सड़कों पर

छंद का तीसरा पाठ शुरू करूँ, उससे पहले अपनी एक विशेष अनुभूति को व्यक्त कर दूँ .....

फिर वही मधुर शब्दों का स्वर 
गुजरा कानों की सड़कों पर 
फिर वही रूप जो निराकार 
तिरता नयनों की पलकों पर 
फिर वही हास मीठा-मीठा 
दौड़ा है किसके अधरों पर 
फिर वही वास धीरे-धीरे 
बैठी है मेरे नथुनों पर 
पिक आम बाग़ में 'पिया पिया' 
कर, आया है रसिया होकर 
ओ सुधाश्रवा! विष घोलो ना 
'भैया' कह दो बहना होकर. 

रविवार, 17 अप्रैल 2011

छंद निष्ठुर नहीं होता

आवरण - १ 


अग्र से नील, पृष्ठ से पीत 
हरित आभा देते बन मीत.
श्याम रंजित लघु लघु लघु छींट.
लगी हो लू को जैसे शीत. 

इंदु-मुख पर शश-तिल का अंक 
नयन लेटे पल के पर्यंक. 
कमर केहरि जैसी कृश, काल 
ग्रसित लगते इंदु चख लंक. 

पहले छंद का मात्रिक विधान कुछ ऐसे किया जाएगा : 
राजभा गाल, राजभा गाल* = 8 + 8 = 16
नसल मातारा भानस गाल = 16
राजभा नसल नसल सलगाल = 16
यमाता मातारा ताराज = 16

[*ध्यान दें : कभी-कभी किसी पंक्ति का मात्रिक विधान तो बिल्कुल सही होता है लेकिन फिर भी उस पंक्ति की छंद कविता की गेयता ख़त्म हो जाती है. ऐसे में गण-विधान अपनी मुख-सुविधा के अनुसार किया जाना ठीक रहता है. जैसे हमने कविता की पहली पंक्ति का मात्रिक-विधान तो कर लिया लेकिन उसका गण-विधान "राजभा राजभा यमाता ल" न करके उसे दो खण्डों में बाँट कर किया "राजभा गाल, राजभा गाल" मतलब "अग्र से नील, पृष्ठ से पीत" पंक्ति के मध्य आये 'अर्धविराम' के अनुसार उसका गण-विधान भी किया. इस बात से मेरा तात्पर्य यह है कि हमें छंद में 'गीति तत्व' को अहमियत देनी होती है. दूसरी बात, मात्रिक विधान के चक्कर में मन का आनंद नष्ट नहीं करना चाहिए. 'छंद' मन के उन्मुक्त भावों को बाँधने का उपक्रम अवश्य करता है किन्तु वह इतना निष्ठुर भी नहीं कि कोमलतम भावों को अपनी वैधानिक-रज्जु से कुचलकर रख दे.] 

वरिष्ठों के लिये : 
प्रश्न : दूसरे छंद का मात्रिक विधान कैसे किया जाएगा? 

कनिष्ठों के लिये :
प्रश्न : 'पर्यंक' कितनी मात्राओं का शब्द है? 

[नोट : विद्यार्थी अपनी इच्छा से दोनों प्रश्न का उत्तर भी दे सकते हैं. 



गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

अशुभ गणों की शुभ्रता

मात्रिक छंदों के अंतर्गत जिन्हें 'अशुभ' गण जानकर नवल आभ्यासिक कवि/कवयित्री बचते हैं उन गणों की अशुभता वार्णिक छंदों के समीप आते ही विलुप्त हो जाती है. 
वार्णिक छंदों की 26 जातियाँ हैं और उनके प्रसार-भेद की संख्या ६७१०८८६४ [छह करोड़ इकहत्तर लाख आठ हहार आठ सौ चौंसठ] है. 
फिलहाल, अशुभ गणों के प्रति नकारात्मकता समाप्त करने के लिये मुझे छंद की विधिवत चर्चा के बीच इस उप-अध्याय को कहना पड़ रहा है. 
त ज र स वाले घरों की कथित अशुभता का उज्ज्वल पक्ष दिखाने के लिये ये अध्याय आपके सामने लाया हूँ. 

'त' गण से आरम्भ होने वाले कुछ छंद : 
1] इंद्रवज्रा
2] इंद्रवंशा
3] वसंततिलका

'ज' गण से आरम्भ होने वाले कुछ छंद :
1] उपेन्द्रवज्रा
2] प्रमाणिका
3] पञ्चचामर


'र' गण से आरम्भ होने वाले कुछ छंद :
1] स्रग्विणी
2] स्वागता
3] रथोद्धता
4] चामर
5] चंचला
6] चंचरी 

'स' गण से आरम्भ होने वाले कुछ छंद :
1] तोटक 
2] सुन्दरी (सवैया) 
3] कुन्दलता (सवैया) 

सुंदरी (सवैया) छंद : 
यह २५ वर्णों का आकृति जाति के अंतर्गत आने वाला छंद है. 
"सगणा जब आठ मिलें गुरु से तब सुन्दरि छंद बने अति नीका." 
जिस छंद के प्रत्येक चरण में आठ स-गण एवं एक गुरु के क्रमानुसार २५ वर्ण हों, उसे 'सुन्दरी' (सवैया) छंद कहते हैं. 
उदाहरण : 
सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा गा.
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
हरकीरत हीर करैं बिनती अब फ़ौरन शंस्वर मालि बुलाओ. 
कर ट्यूशन धाक जमा हम लें, सब छंद रचें, वह पाठ पढ़ाओ. 
अविनाश*-कली खिल जाय, भली कविता कर लें, वह बीन बजाओ. 
हर ऊसर में उग जाय शमी*, मन का जलवायु उपाय बताओ. 
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
*अविनाश — कविराज अविनाश चन्द्र से तात्पर्य 
*शमी — ऐसा वृक्ष जो अकाल में भी हरा-भरा रहता है. बंजर में भी सहजता से उग सकता है. 

चंचला छंद : 
"चंचला सदा सुहात राज राज रा ल से."
जिस छंद का प्रत्येक चरण, क्रमशः रगण, जगण, रगण, जगण, रगण और लघु युक्त १६ वर्णों पर आधारित हो, वह 'चंचला' छंद कहलाता है. 
उदाहरण : 
राजभा जभान राजभा जभान राजभा ल 
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
हंसराज सुज्ञ डाकिया बने जहान घूम. 
ढूँढ लात लोग सात दृष्टि की महान ज़ूम.
खान पान शुद्ध, आन बान शान देख झूम.
एक-एक बाँटते सभी अपार्टमेन्ट रूम. 
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

'चंचला' छंद का एक अन्य उदाहरण : 
पक्षिराज यक्षराज प्रेतराज यातुधान. 
देवता अदेवता नृदेवता जिते जहान. 
पर्वतारि अर्व खर्व सर्वथा बखानि. 
कोटि कोटि सूरचंद्र रामचंद्र दास जानि. [यह किस कवि की रचना है, जानकारी नहीं]

एक प्रश्न : 
'चंद्र' शब्द में कौन-कौन से वर्ण आधे हैं और कौन-कौन से पूरे हैं ? 
संकेत : इस शब्द में चार वर्ण हैं : च, न, द, र


शेष चर्चा आगामी पाठ में ....

रविवार, 10 अप्रैल 2011

खेल का नाम है "कौन-सा नाम कौन से घर में"

स्वर के तीन भेद हैं : 
१] हृस्व : अ इ उ ऋ — चिह्नित करते हैं I से 
२] दीर्घ : आ ई ऊ ए ऐ ओ औ — चिह्नित करते हैं S से  
३] प्लुत : ओ३म — चिह्नित करते हैं ३ से 

व्यंजन :
१] क  वर्ग = क ख ग घ (गं)
२] च वर्ग = च छ ज झ (यं)
३] ट वर्ग = ट ठ ड ढ (ण) 
४] त वर्ग = त ठ द ध (न) 
५] प वर्ग = प फ ब भ (म)
इनके अलावा ..... य र ल व् श ष स ह 
...... उपर्युक्त व्यंजन हृस्व माने जाते हैं.
कुछ व्यंजन : शृ हृ म्ह आदि लघु माने जाते हैं. 
तो कुछ व्यंजन दीर्घ माने जाते हैं यथा : ह्म म्ह 
'म्ह' कभी लघु माना जाता है तो कभी गुरु. यह अपवाद है.
सभी संयुक्त व्यंजन गुरु चिह्न से अभिहित किये जायेंगे. 
संयुक्त व्यंजन : क्ष त्र ज्ञ श्र 
ध्यान रखें : संयुक्त व्यंजन के पूर्व वाला व्यंजन गुरु हो जाता है. 
जिसका आरम्भ ही संयुक्त से हो तो वह गुरु ही रहता है. यथा : प्र से प्रकाश – SSI 
[लेकिन होता यह आभासी गुरु है.]
गुरु = S = 2 मात्रा 
लघु = I = 1 मात्रा 
जैसे : बुद्धि = बुद+ धि = S + I = 3 मात्राएँ 

अब छंद ज्ञान अपनी जटिलता समाप्त करके रहेगा. 
इसलिये पाठशाला में एक खेल शुरू कर रहा हूँ :
खेल का नाम है "कौन-सा नाम कौन से घर में"

आठ घर {गण} हैं. चार शुभ घर हैं चार अशुभ घर हैं 
आपको ब्लॉग जगत के ब्लोगरों के नाम पकड़-पकड़ कर घरों में बैठाने हैं. 

म गण = मातारा = SSS =  [दिव्या श्रीवास्तव / संगीता स्वरूप ..... ] 
न गण = नसल = III =  [अमित/ अजित/ सुमन/ ....... ]
भ गण = भानस = SII =  [प्रतुल/ सञ्जय/ पंकज/ दीपक .... ]
य गण = यमाता = ISS =  [?] कोई दो नाम सुझाइए : 
स गण = सलगा = IIS =  [अविनाश/ हरदीप .....]
त गण = ताराज = SSI =  [?] कोई दो नाम सुझाइए : 
र गण = राजभा = SIS =  [हंसराज/ .....]
ज गण = जभान = ISI =  [समीर/ सतीश .....]

यदि आपके जान-पहचान के नाम किसी घर में रहने के इच्छुक हों तो अवश्य उन्हें घर दिलवाइये.




बुधवार, 6 अप्रैल 2011

छंदों का वर्गीकरण ........... पाठ 2

छंद — 
१] वैदिक छंद 
२] लौकिक छंद — मात्रिक छंद , वार्णिक छंद 
मात्रिक छंद — 
१] सम मात्रिक छंद
२] अर्ध मात्रिक छंद 
३] विषम मात्रिक छंद 
वार्णिक छंद — 
१] सम वार्णिक छंद 
२] अर्ध वार्णिक छंद 
३] विषम वार्णिक छंद 

अन्य छंद भेद : 
मात्रिक एवं वार्णिक छंदों के दो-दो अन्य भेद हैं — 
१] साधारण मात्रिक छंद – ३२ मात्राओं तक सीमित 
२] दंडक मात्रिक छंद – ३२ से अधिक होने पर दंडक मात्रिक छंद कहलाते हैं. 
३] साधारण वार्णिक छंद – २६ वर्णों तक सीमित
४] दंडक वार्णिक छंद – २६ से अधिक होने पर दंडक वार्णिक छंद होता है. 

मात्रिक और वार्णिक छंदों का विस्तार आगे के पाठों में किया जाएगा. फिलहाल मैं पाठ की जटिलता को देखते हुए सरलतम और रोचक जानकारी पहले दिये दे रहा हूँ. जिससे पाठ में कुछ तो रोचकता आये. अभी छंद-विषयक कुछ महत्वपूर्ण जानकारी देना जरूरी समझा है इसलिये नवल विद्यार्थी अपना धैर्य नहीं गँवायें तो आगामी पाठों को सहजता से समझ पायेंगे. 

शुभाशुभ गण, दग्धाक्षर एवं उनका परिहार :
शुभ गण — मगण, नगण, भगण, यगण
अशुभ गण — जगण, रगण, सगण, तगण
शुभाशुभ विचार का तात्पर्य यह है कि शुभ गणों से ही किसी पद्य का आरम्भ करना चाहिए. छंदारम्भ में अशुभ गण का प्रयोग दोष माना गया है. 
['दग्धाक्षर एवं उनका परिहार' पर आगे चर्चा की जायेगी]

प्रश्न : एक कविता दी जा रही है, जिसमें शास्त्र की दृष्टि से दोष बताइये :

बुद्धि से लो काम 
हृदय को हावी मत होने दो. 
दबा हुआ जो भाव 
हृदय में, ज़ाहिर मत होने दो. 

वही प्रीति का बीज 
बाद में फलदायी तरु होगा. 
जिसको सबकी आँख 
बचाकर, रोंपा सींचा होगा.