रविवार, 4 अप्रैल 2010

विचित्र बात

हे अज्ञातयौवना !
मैं बन गया महात्मा.
पर छूटते ही जा रहे, किस ओर से ये बाण हैं.
कितनी विचित्र बात है, कितनी विचित्र बात है.

इधर तुणीर रिक्त है.
उस ओर का भी रिक्त है.
पर क्या चला, किसको लगा
और कब चला, किस पर चला?

— यह पूछने की बात है.
इसमें किसी का हाथ है.
या फिर,
यूँ ही बात है!!

बुधवार, 31 मार्च 2010

नियोग

वर पञ्च शरों सह वनिता के
उर अनल-अयन में घुसकर के
निज के प्राणों का दाँव लगा
तज पञ्चतत्व को सौंप गया.

विधवा होकर कर सौंप जिसे
दे, ऐसा कोई और मिले
दे-वर विधवा होने पर भी
उत्तम-कुल का वर-बरात मिले.

वह अग्रज हो वा अनुज भई
या उत्तम कुल का इतर सही.
उसको ही देवर कहते, जो
आपात काले सहयोग करे.

जो भोग न हो संयोग न हो
जो चिर कालीन वियोग न हो.
सुत पाने की इच्छा भर हो
उसे पाप नहीं नियोग कहो.

(नियोग — एक वैदिक विधान, परिस्थिति विशेष में)

शनिवार, 27 मार्च 2010

भ्रमर अध्ययन

कोकनद के अन्दर अलि नाद
कर रहा था, लेटा उपराग
मृदुल शैया पर, संभवतया
कोक विद्या पढ़ता था जाग.

कामिनी कलियाँ किस-किस काल
काम के वश में हो शृंगार
किया करती, कलियों के पास
हमारा कब होता अभिसार.

मधुप क्योंकर हो जाते बंद
कमल अन्तःपुर में हर रात
सोचते  हैं कैसे किस तरह
मिलन हो नूतन कलियों साथ.

कौन-सी कलियाँ हैं सुकुमार
कौन खिलती हैं बारम्बार
कौन से सब करते व्यभिचार
कौन करती रहती शृंगार.

कौन-सी कलियाँ जिनकी गंध
पुष्प बनकर हो जाती मंद
कौन कलियाँ मुकुलन के बाद
सुगंधी देती हैं स्वच्छंद.

कौन कलियाँ देती सस्नेह
रात भर आलिंगन उर-गेह
कौन कलियों की कोमल देह
मुरझा जाती स्पर्श संदेह.

कौन कलियाँ नीरस निर्गम्य
कौन कलियाँ रमणी सी रम्य
कर रहा था मधुकर अनजान
कामिनी कलियों से पहचान.

(एक भौंरा देखा जो तमाम ब्लोग्स पर बैठ कर उनका मूल्यांकन कर रहा था कि कौन कितना रसदार? - तभी मुझे अपनी इस कविता कि स्मृति हो आयी.)

बुधवार, 17 मार्च 2010

अर्चना!

अर्चन करती आँखें तेरी
सृजन करती कविता मेरी
होवेगी नूतन उत्पत्ति
मेरे ही हाथों से तेरी.

नर्तन करती बाहें तेरी
सुर देती आवाजें मेरी
तुम ही हो मेरी संपत्ति
तुम ही हो मेरी कमजोरी.

तुझमे मुझमे कितनी दूरी
फिर भी मिलती श्वासें पूरी
तुम बिन मिलकर मिल जाती हो
तुम हो किस किसकी मजबूरी.

(एक पुरानी स्मृति को काव्य आहुति)

रविवार, 14 मार्च 2010

सौंदर्य उपासना

उठ गयी आज जल्दी सजनी
सब केश खुले से खुले बिखरे
सो रही उसी पर थी रजनी.

कर ग्रंथि केश मुख धोन चली
मद नयन भरे से भरे दिखते
धो रही शीत चख कुंद कली.

(जब मैंने प्रातः उठने पर सौंदर्य को मुख धोते देखा)

शनिवार, 13 मार्च 2010

आगमन

संयम की प्रतिमा बन जाओ
जितनी चाहे जड़ता खाओ
आगमन हुवेगा जब उसका
भूलोगे अ. आ. इ. ई. ओ.

दृग फेर चाहे मुख पलटाओ
या निर्लज हो सम्मुख आओ
पहचान हुवेगी जब उसकी
सूझेगा केवल वो ही वो.

मन की बातें न झलकाओ
पीड़ा को मन में ही गाओ
उदघाटित हो जाएगा जब
हंसेगे सब हा. हा. हो. हो.

(आदरणीया संयम मराठा जी को समर्पित)

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

खोखली धारणा

जिसके अर्चन में दिवस रात
रहती थीं निज आँखें सनाथ
जिसके आँचल में बैठ मुझे
मिलता था ईहित प्यार-मात।

जिसके दर्शन से नयन धन्य
समझा करता खोले कपाट
जिसके चलने पर ऊंच-नीच
पथ को करता था मैं सपाट।

जिसके नर्तन पर कभी-कभी
कवि उर में आ जाता भुचाल*
कविता बेचारी इधर-उधर
मारी फिरती जिह्वा संभाल।

खोखली धारणा थी मेरी
कुछ ही पल का था प्रिय मिलाप
जब से मिलकर वे दूर हुए
आँखें करती रहतीं विलाप।
* भूचाल

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

ज्ञानोपनयन-3

आया बसंत पट हटा अरी
चख चहक रहे "अब करो बरी"
तुमने इनको कब कैद किया
– है पूछ रही ऋतुराज-परी.

क्यों दी इनको आजन्म कैद
पिंजर खोलो, उल्लास भरो.
त्राटक कर इनको रूप पुरा
देना, नूतन उपचार करो.

(स्वसा नूतन श्री को सादर समर्पित)

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

ज्ञानोपनयन-2

"ज्ञानोपनयन देना मुझको "
बोली – क्यों-क्यों-क्यों-क्यों-क्यों-क्यों.
"कुछ वस्तु  पुरातन देखन को "
बोला मैंने उससे जब यों.

वो मंद-मंद मुस्का बोली –
"मैं समझ गयी तेरी बोली
तुम गोल-मोल बातें करके
सूरत दिखलाते हो भोली".

"तुम नहीं समझ पाए मुझको
क्यों मांग रहा ज्ञानोपनयन
मैं संबंधों के बीच नव्य
करना चाहूँ सम्बन्ध चयन".

(प्रेरणा: स्वसा नूतन जी)

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

ज्ञानोपनयन-१

आर-पार दिखने वाले
पर्दों को मुझसे हटा अरी.
नयन-दीप जलते हैं पीछे
जल जावेंगे करो घरी.

मुझ नयनों के लिए एक
ज्ञानोपनयन* ला करके दो.
जिसे पहन हर वास्तु पुरातन
नूतन-सी दिखती बस हो.

(*ज्ञानोपनयन — चश्मा - ज्ञान का)
प्रेरणा — ऋतुराज परी

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

3.33"

तीन दशमलव तीन-तीन
इंचों की है मुस्कान छली।
छले गए चख दोनों मेरे
विनय-कथन हो गया बली।

बली हो गए शब्द सभी
अवरुद्ध हो गयी वाक् गली।
जिह्वा पर जल रहीं चिताएँ
शब्दों की, अब ख़ाक भली।

उर तक जाती अनल चिता की
स्मृतियों की जब पवन चली।
तीन तीन तैंतीस संचारी
भावों में मुस्कान खली।

शब्द ख़ाक में मिलकर भी
थे रिझा रहे निज सु'मन-कली।
खलबली मची जृम्भा आयी
सब ख़ाक वाक् से भाग चली॥

(बड़ी मुस्कान वालों को समर्पित)

बुधवार, 27 जनवरी 2010

संभव नहीं

घन मेघ हों गर्जन न हो संभव नहीं.
सौंदर्य हो यौवन न हो संभव नहीं.
हृत पुष्प हो नवयौवना का जब खिला
अलि नाद हो मर्दन न हो संभव नहीं.

चिर प्रेम हो प्रियतम न हो संभव नहीं.
सुर ताल हो सरगम न हो संभव नहीं.
जब हों बंधे नृत्यांगना पद में नूपुर
संगीत हो नर्तन न हो संभव नहीं.

आपान हो गणिका न हो संभव नहीं.
अपमान हो चिंता न हो संभव नहीं.
फँसता निराशामय हृदय मझधार में
भगवान् हो तिनका न हो संभव नहीं.

दिनमान हो दिविता न हो संभव नहीं.
कवि पास हो कविता न हो संभव नहीं.
जब भी चलोगे कंटकों कि राह पर
प्रिय आप हों ओ' हम न हों संभव नहीं.

(समर्पित: स्वसा गीतिका को)

सोमवार, 18 जनवरी 2010

आँखें

काट लिए हैं दिवस और न जाने ही कितनी रातें.
नयन तुम्हारे देखन को उत्सुक हैं मेरी दो आँखें.
कभी आप नयनों को अवनत कर लेते हो शरमाते.
और कभी मेरी मर्यादा खोल नहीं पातीं आँखें.
एक बार ही मिलीं हमारे नयनों से तेरी आँखें.
पहले स्वागत नहीं किया अब करने को उत्सुक आँखें.
हाय! सुरक्षित हैं क्या तेरी वो प्यारी-प्यारी आँखें.
किवा ग्रस्त घावों से हैं वे बाण छोड़ने से आँखें.

(प्रेरणा: मंदाक्ष)
समर्पित: सभी विस्फारित नयनों वालों को

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

दृग नहीं पीठ पीछे मेरे

दृग नहीं पीठ पीछे मेरे
पढ़ सकूँ भाव मुख के तेरे
चाहूँ देखूं तुमको लेकिन
बैठा हूँ मैं मुख को फेरे.

अनुमान हाव-भावों का मैं
मुख फेर लगाता हूँ तेरे.
सौन्दर्य आपका है अनुपम
संयम को घेर रहा मेरे.

लेता है मेरा ध्यान खींच
बसबस लज्जा-लूतिका जाल.
लगता है चूस रहा तेरा
रक्तपा-रूप निज रक्त खाल.

(कच-देवयानी प्रबंधकाव्य से)

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

चरमर कर चलती है गाड़ी

भरी... परन्तु भरी जा रही
ला लाकर के और सवारी.
नहीं खिंच रही खींच रहा है
जान लगाकर वृषभ अगाड़ी.
चली कदम दो कदम, रुकी फिर
चली पुनः रुक-रूककर गाड़ी.
'अरे! चलावो तेज़ ज़रा' --
आती पीछे आवाज़ करारी.
वृषभ देह पर दीख रही है.
खिली अस्थियों की फुलवारी.
भ्रमर-कशा गुंजन-सटाक ध्वनि
करता गूम रहा व्यभिचारी.
क्षुधा-वृषभ पिय नित्य बैठने
आया करती है फुलवारी.
मिलन-कुशा कि बातें करके
मिल जाती निज देह पसारी.
फिर आयी है क्षुधा मिलन को
आस लिए अब चौथी बारी.
'लौट चली जावो' कहता है
'क्षुधे अरी ओ मेरी प्यारी!'
'पित ने मेरा लालचवश कर
दिया मृत्यु से अब रिश्ता री!
तुम निर्धन हो निम्न वर्ण की
वो यम कि संपन्न सुता री!'

बड़बड़ करती रही सवारी.
चरमर कर चलती है गाड़ी.

(आधुनिकतम लो-फ्लोर बसों को समर्पित)

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

मंगली कन्या

तुम अशुभ मान बैठे जो-जो
मुझको तो लगे वही शुभ है!
हे त्रयोदशी मंगली कन्या !
तुम फुल्ल रहो शुभ ही शुभ है!

चतुर्थ, अष्ट, द्वादश घर में
कुण्डली मार बैठा मंगल!
चंचल स्वभाव भयभीत हुआ
अहि मान उसे होता ओझल!

(सभी मांगलिक कन्याओं को समर्पित)

बुधवार, 6 जनवरी 2010

संन्यासी का छोरा

तुमको लगी प्यास पास में आये कुछ-कुछ शरमाये.
"कंठ हमारा सूख गया" तुम बोले मुझसे हकलाये.
"प्य..प्य..प्य...प्य आस लगी पा..पा..पा..पानी दे दो भी.
क्यों बैठे चुपचाप छिपा पानी, मुझको लगते लोभी".
"आपानक था ह्रदय प्रेम का, पानी था उसमें थोडा.
पहले से ही मांग रहा संयम संन्यासी का छोरा."

(प्रेरणा : ऋतुराज परी )

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कविता की छोरी

तेरे जैसी सुन्दर प्यारी
मुझको लगती तेरी छोरी.
तुम हो कविता उल्लासमयी
वो है ममता-मूरत लोरी.

सोने को बार-बार आँखें
पलकों को ओड़ रहीं मोरी.
पर नींद नहीं आती मुझको
बिन देखे कविता की छोरी.

थक जातीं कर-कर इंतज़ार
रोने लगतीं आँखें मोरी.
माँ हाथ फेर करती दुलार
कहती कविता से 'भेजो री'.

तब निकल चली माँ मुख से ही
आई सम्मुख चोरी-चोरी.
उसके जाते ही नयन मुंदे
जादूगरनी कविता-छोरी.


कविता की छोरी - लोरी
(अर्पिता जी को समर्पित)

तीन पागल

पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल

एक वो
जो सुनता न किसी की
बस कहता,
हँसता
कर बात
बिना हँसी की.

दूजा वो
जो न सुनता न कहता
बस रहता
खोया खोया
लगा खोजने में खुद को.

तीसरा वो
जो बडबडाता
बिना सोच
कर देता
सोच प्रधान बातें
तब तर्कहीन बातें भी 
तर्क की कसौटी पर
कसने को
व्याकुल हो
uthtaa  है, वह पागल

पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल.

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

kisi ka saal ye nootan

किसी का साल ये नूतन
पिचकता पेट
"भूखा"
बन गया आदर्श मेरा अब.

मरूंगा
"भूख से" ?
या, "चिलचिलाती धुप (dhoop) से" ?
- मैं कब?
मरें हैं अनगिनित निर्धन
वसन से हीन भिक्षुक बन
कटोरा हाथ में ले मांगते
फिरते रहे जो धन.

विवश हो देखती माता
वसन से हीन कन्याएं
मरा परिवार में कोई
वसन-शव खींच ले आये.

उसी से ढांकते हैं तन
उसी से ढांकते यौवन
उसी से कर रहे देखो
सुरक्षित स्वयं का जीवन.

दिखायेगी अभी वर्षा
निराले ढंग आकर के
सुनाएंगी अभी उनको
छतें मल्हार गाकर के.

हा! कैसे कटेगी रात
कटेगा किस तरह जीवन
जलेगा किस तरह चूल्हा
कहाँ पर, फिर बिना ईंधन.

कड़कती ठण्ड में जाने
मरा!* इस बार होगा क्या
मरा पिछले बरस बूढ़ा
मरेगी इस बरस बुढ़िया.

बना फिर जूट के कपडे
बचायेंगे, छिपा बचपन
कटेगा इस तरह फिर से
किसी का साल ये नूतन.