अब टिकते नहीं फिसलते हैं
मुख पर जाकर मेरे दो दृग.
पहले रहती थी नीड़ बना
लज्जा, अब रहते चंचल मृग.
चुपचाप चहकती थी लज्जा
बाहर होती थी चहल-पहल.
चख चख चख चख देखा करते
कोणों को करके अदल-बदल.
अब नहीं रही वैसी सज्जा
औ' रही न वैसी ही लाली.
बस उछल-उछल घूमा करते
मृग इधर-उधर खाली-खाली.
[जब से लज्जा के आवास में चपलता ने डेरा जमाया है लज्जा चहकना भूल गयी है और इस चपलता को नारी की जागृति समझा जा रहा है, बौद्धिकता माना जा रहा है, सहमती और समर्पण में अंतर कर उसे उसके दिव्य गुणों से पृथक करने का प्रयास हो रहा है. 'सहमती' में नारी की गरिमा को और उसके 'समर्पण' में पुरुष के वाक्-जाल को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है.]
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
गुरुवार, 27 मई 2010
बुधवार, 26 मई 2010
ये लज्जा तो केवल संयम
बोलूँ ना बोलूँ ......सोच रही.
बोलूँगी क्या फिर सोच रही.
मन में बातें ...करने की है
इच्छा, लज्जा पर रोक रही.
कुछ है मन में थोड़ा-सा भय.
संकोच शील में होता लय.
पलकों के भीतर छिपे नयन
मन में संबोधन का संशय.
"प्रिय, नहीं आप मेरे प्रियतम
मन में मेरे अब भी है भ्रम
प्रिय हो लेकिन तुम 'प्रिये' नहीं
ये लज्जा तो केवल संयम."
"क्या संयम पर विश्वास करूँ?
या व्यर्थ मान लूँ इसको मैं?
आनंद मिलेगा अंत समय?
क्या संयम देगा लम्बी वय?"
बोलूँगी क्या फिर सोच रही.
मन में बातें ...करने की है
इच्छा, लज्जा पर रोक रही.
कुछ है मन में थोड़ा-सा भय.
संकोच शील में होता लय.
पलकों के भीतर छिपे नयन
मन में संबोधन का संशय.
"प्रिय, नहीं आप मेरे प्रियतम
मन में मेरे अब भी है भ्रम
प्रिय हो लेकिन तुम 'प्रिये' नहीं
ये लज्जा तो केवल संयम."
"क्या संयम पर विश्वास करूँ?
या व्यर्थ मान लूँ इसको मैं?
आनंद मिलेगा अंत समय?
क्या संयम देगा लम्बी वय?"
मंगलवार, 25 मई 2010
नर की लज्जा बदरंग गाय
लज्जा नारी का नहीं कवच
लज्जा तो आभूषण कहाय.
लज्जा स्वाभाविक भाव नहीं
लज्जा तो पहनी ओढ़ी जाय.
लज्जा नारी का मूलतत्त्व
फिर भी गुण आभूषण कहाय.
मैंने लज्जा को कवच कहा
मेरी लज्जा अब मुँह छिपाय.
नारी की लज्जा आभूषण
नर की लज्जा बदरंग गाय.
जो दूध बहुत देती फिर भी
मारी पीटी दुत्कारी जाय.
[छंद ज्ञान के समर्थक "ओढ़ी" और "दुत्कारी शब्दों में एक-एक मात्रा घटाकर भी लिख-पढ़ सकते हैं]
लज्जा तो आभूषण कहाय.
लज्जा स्वाभाविक भाव नहीं
लज्जा तो पहनी ओढ़ी जाय.
लज्जा नारी का मूलतत्त्व
फिर भी गुण आभूषण कहाय.
मैंने लज्जा को कवच कहा
मेरी लज्जा अब मुँह छिपाय.
नारी की लज्जा आभूषण
नर की लज्जा बदरंग गाय.
जो दूध बहुत देती फिर भी
मारी पीटी दुत्कारी जाय.
[छंद ज्ञान के समर्थक "ओढ़ी" और "दुत्कारी शब्दों में एक-एक मात्रा घटाकर भी लिख-पढ़ सकते हैं]
शनिवार, 22 मई 2010
कवच [एक चित्र काव्य]
नयन चार करना नवीनता
यही क्षणिक पहला पागलपन
नहीं मिलन को आती तन्वी
रेतीला होता मेरा मन
मेरे आकर पास कल्पना
कर देती है मुझको कायर
सुरबाला को देखूँ अपलक
उत्कंठित रहता है अंतर
कोस रहा है कब से सच्चा
नख से शिख तक तुमको निज मन
लगी को आकर कौन बुझाय
मिलन को उत्सुक मेरे नयन.
शब्दार्थ :
तन्वी मतलब कृशकाय किशोरी, दुबली-पतली बाला.
पिछली बार 'ढाल' नामक कविता चित्र काव्य के रूप में दी थी लेकिन किसी ने उसमें चमत्कार ढूँढने में रुचि नहीं दिखायी, कहीं इस 'कवच' का भी वही हाल ना हो. इसलिये कुछ संकेत किये देता हूँ.
दो वाक्य कविता को चारों ओर से घेरे हुए है.
एक वाक्य 'नयन चार करना नवीनता' बायें से दायें है और वही नीचे से ऊपर भी बनता हुआ दिखाई देगा.
दूसरा वाक्य 'मिलन को उत्सुक मेरे नयन' न केवल अंत में आया है बल्कि वही वाक्य नीचे से ऊपर जाता हुआ [सभी वाक्यों के अंत में] प्रतीत होगा.
मैं इस बात से अवगत हूँ कि इन काव्य खेल-तमाशों के प्रति रुचि काफी घट चुकी है. फिर भी मुझे जो आता है मैं तो वही खेल दिखा सकता हूँ. ]
अगली कविता अकल्पित छवि 'दिव्या जी' पर
यही क्षणिक पहला पागलपन
नहीं मिलन को आती तन्वी
रेतीला होता मेरा मन
मेरे आकर पास कल्पना
कर देती है मुझको कायर
सुरबाला को देखूँ अपलक
उत्कंठित रहता है अंतर
कोस रहा है कब से सच्चा
नख से शिख तक तुमको निज मन
लगी को आकर कौन बुझाय
मिलन को उत्सुक मेरे नयन.
शब्दार्थ :
तन्वी मतलब कृशकाय किशोरी, दुबली-पतली बाला.
पिछली बार 'ढाल' नामक कविता चित्र काव्य के रूप में दी थी लेकिन किसी ने उसमें चमत्कार ढूँढने में रुचि नहीं दिखायी, कहीं इस 'कवच' का भी वही हाल ना हो. इसलिये कुछ संकेत किये देता हूँ.
दो वाक्य कविता को चारों ओर से घेरे हुए है.
एक वाक्य 'नयन चार करना नवीनता' बायें से दायें है और वही नीचे से ऊपर भी बनता हुआ दिखाई देगा.
दूसरा वाक्य 'मिलन को उत्सुक मेरे नयन' न केवल अंत में आया है बल्कि वही वाक्य नीचे से ऊपर जाता हुआ [सभी वाक्यों के अंत में] प्रतीत होगा.
मैं इस बात से अवगत हूँ कि इन काव्य खेल-तमाशों के प्रति रुचि काफी घट चुकी है. फिर भी मुझे जो आता है मैं तो वही खेल दिखा सकता हूँ. ]
अगली कविता अकल्पित छवि 'दिव्या जी' पर
शुक्रवार, 21 मई 2010
लज्जा : नारी का अभेद्य कवच
यदि लज्जा ही निर्लज्ज होकर
घूमेगी घर के आँगन में.
तो स्वयं नयन की मर्यादा
भागेगी छिपने कानन में.
यदि लज्जा ही मुख चूमन को
लिपटेगी अपनी काया से.
तो कैसे आकर्षित होंगे 'चख'
ह्री की श्रीयुत माया से.
यदि लज्जा ही अवगुंठन की
आलोचक बन जाए भारी.
तो कौन कवच ऐसा होगा
होगी जिसमें निर्भय नारी.
[श्री देव कुमार झा के लेख से प्रेरित]
घूमेगी घर के आँगन में.
तो स्वयं नयन की मर्यादा
भागेगी छिपने कानन में.
यदि लज्जा ही मुख चूमन को
लिपटेगी अपनी काया से.
तो कैसे आकर्षित होंगे 'चख'
ह्री की श्रीयुत माया से.
यदि लज्जा ही अवगुंठन की
आलोचक बन जाए भारी.
तो कौन कवच ऐसा होगा
होगी जिसमें निर्भय नारी.
[श्री देव कुमार झा के लेख से प्रेरित]
बुधवार, 19 मई 2010
विरह उदगार
मित्र विनय ने संपर्क कर ही लिया. २० मिनट बात हुयी. हम परस्पर वर्ष में एक या दो बार ही मिलने वाले मित्र थे. लेकिन जब सात वर्ष से अधिक हो गए तो रहा ना गया. सो स्वभाव के विपरीत धमकी देकर देखा. और वह कारगर हुआ. मतलब मित्रों को समय-समय पर धमकियाते रहना चाहिए. अब मैं उनपर लिखी दर्जनों कविताओं को उदघाटित नहीं करूँगा केवल एक को छोड़कर, नहीं तो सभी समझेंगे कि काव्य-पिटारा खाली था वैसे ही बहकाया. तो लीजिये मित्र विनय के "विरह उदगार"
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विनय, अर्चन, या..चना व्यर्थ
कलम, सृजन, सो..चना व्यर्थ
नुपुर, नर्तन, showभना व्यर्थ
नहीं इनका अब कोई अर्थ.
▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒
कथन पिय का, घू..मना व्यर्थ
मिलन उनका, झू..लना व्यर्थ
सुमन चुनना, चू..मना व्यर्थ
नहीं इनका अब कोई अर्थ.
▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒
नयन, पलकें झप..कना व्यर्थ
रुदन, आँसू टप..कना व्यर्थ
भवन उनके पहुँ..चना व्यर्थ
नहीं इनका अब कोई अर्थ.
▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒
दिया उनको जो उनके अर्थ
लिखा उसपर जो, क्या था अर्थ
अभी तक है मुझको वो याद,
हमारे बीच रही जो शर्त.
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शिखर पर तुम हो मैं हूँ गर्त
विनय करता पर मिला अनर्थ
याद कर-कर तेरी हो गया
विरह में मैं आधे से अर्ध.
▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒
मिलन कुछ पल का विरह अपार
यही मुझको देता है मार.
बिना उनके निज नयन अनाथ
बची दो ही आँखें हो चार.
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कपट करना उनका व्यापार
लिपट जाना उनका उदगार
मरण तो अब जीवन के लिये
जरूरी सा बन गया विचार.
▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒▒
[काव्य थेरपी से साभार]
प्रेम औषधि से उपचार करना वहाँ मना है इसलिये दर्शन प्राशन दवाखाने पर आया हूँ.
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विनय, अर्चन, या..चना व्यर्थ
कलम, सृजन, सो..चना व्यर्थ
नुपुर, नर्तन, showभना व्यर्थ
नहीं इनका अब कोई अर्थ.
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कथन पिय का, घू..मना व्यर्थ
मिलन उनका, झू..लना व्यर्थ
सुमन चुनना, चू..मना व्यर्थ
नहीं इनका अब कोई अर्थ.
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नयन, पलकें झप..कना व्यर्थ
रुदन, आँसू टप..कना व्यर्थ
भवन उनके पहुँ..चना व्यर्थ
नहीं इनका अब कोई अर्थ.
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दिया उनको जो उनके अर्थ
लिखा उसपर जो, क्या था अर्थ
अभी तक है मुझको वो याद,
हमारे बीच रही जो शर्त.
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शिखर पर तुम हो मैं हूँ गर्त
विनय करता पर मिला अनर्थ
याद कर-कर तेरी हो गया
विरह में मैं आधे से अर्ध.
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मिलन कुछ पल का विरह अपार
यही मुझको देता है मार.
बिना उनके निज नयन अनाथ
बची दो ही आँखें हो चार.
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कपट करना उनका व्यापार
लिपट जाना उनका उदगार
मरण तो अब जीवन के लिये
जरूरी सा बन गया विचार.
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[काव्य थेरपी से साभार]
प्रेम औषधि से उपचार करना वहाँ मना है इसलिये दर्शन प्राशन दवाखाने पर आया हूँ.
रविवार, 16 मई 2010
ढाल [चित्र काव्य]
पहले से ही दिखी भवन में
आती अमा अरे! चुपचाप.
होली खेल रहा था छिपकर
तेल जला तम से दिव-ताप.
नत थे दोनों नयन नुकीले
बतलाओ थे कौन कलाप.
रज्जू बिना छूटे आहत कर
काजलमय हृत, करे विलाप
ला वह चाप कौन-सी है, यदि
कलाकार बनते हो आप.
[यह कविता 'ढाल' नामक चित्र काव्य का उदाहरण है. खोजिये, कैसे?]
आती अमा अरे! चुपचाप.
होली खेल रहा था छिपकर
तेल जला तम से दिव-ताप.
नत थे दोनों नयन नुकीले
बतलाओ थे कौन कलाप.
रज्जू बिना छूटे आहत कर
काजलमय हृत, करे विलाप
ला वह चाप कौन-सी है, यदि
कलाकार बनते हो आप.
[यह कविता 'ढाल' नामक चित्र काव्य का उदाहरण है. खोजिये, कैसे?]
नयन-मर्यादा
ओ दूर-दूर रहने वाले! हमसे भी दो बातें कर लो.
इतना दूर नहीं रहते जो मिलने में भी मुश्किल हो.
मौन बहुत रहते हो, दूरी पहले से, ये चुप छोड़ो.
कभी-कभी तो आते हैं, मिलते हैं. हमसे हँस बोलो.
जितना आते पास तिहारे उतना नयन झुकाते हो.
लज्जा है ये नहीं तुम्हारी, फिर भी तुम शरमाते हो.
बोल रही प्राची से नूतन, सब बातों से अवगत हो.
'मर्यादा में भी कहते हैं नयन किसी हद तक नत हों.'
इतना दूर नहीं रहते जो मिलने में भी मुश्किल हो.
मौन बहुत रहते हो, दूरी पहले से, ये चुप छोड़ो.
कभी-कभी तो आते हैं, मिलते हैं. हमसे हँस बोलो.
जितना आते पास तिहारे उतना नयन झुकाते हो.
लज्जा है ये नहीं तुम्हारी, फिर भी तुम शरमाते हो.
बोल रही प्राची से नूतन, सब बातों से अवगत हो.
'मर्यादा में भी कहते हैं नयन किसी हद तक नत हों.'
शनिवार, 15 मई 2010
क्षमा करो
मुझ पर हैं दो नयन आपने तो पहले से चार किये.
सोचा मैं भी चार करूँ लेकर तुझसे दो नयन पिये.
चार नयन पाकर भी तुमने मेरे भी दो नयन लिये.
नयनहीन होकर मैं अब कैसे पाउँगा देख पिये!
दया करो मुझपर, मेरे दो नयन मुझे वापस कर दो.
प्यासे तो पहले से हैं वे मर जायेंगे मुक्त करो.
भूल हुई मुझसे जो मैंने माँगे तेरे लोचन दो.
देख नयन तेरे, ललचाया था मन मेरा, क्षमा करो.
[दो दिन खुला रहेगा दान पात्र]
सौदर्य दर्शन में कलुषता का आना और क्षमा भाव मन में ज्वार-भाटे की तरह से है.
शुक्रवार, 14 मई 2010
अभिनय
कर रहे चपल चख थिर अभिनय
हैं बोल रहे द्वय विंशति वय.
हो गयी हमारी, तुम बोलो —
"क्या पीया आपने पावन पय."
ना, नहीं अभी है संशयमय
मम दशा, हलाहल अथवा पय
मैं जान नहीं पाता सचमुच
हैं कौन वस्तु जिससे हो जय.
" 'बहुजन हिताय' विष अमृतमय
'है सुधा' वासनामयी सभय."
— यह कथन किया करता सतर्क
है दशा इसलिये संशयमय.
उपदेशों में कितनी हैं जृम्भ
है स्वाभिमान में कितक दंभ.
मम दृष्टि खोजती यही सूक्ष्म
द्रुतता में है कितना विलम्ब.
चख चपल हलाहल आपानक
अथवा घट स्वर्णिम सुधा भरा.
संतुलित अंक द्वय विंशति के
वा रौद्रमहा देता घबरा.
शब्दार्थ :
द्वय विंशति — २२;
चख — आँखें
जृम्भ — जम्हाई, लक्षित अर्थ 'सारहीनता';
दंभ — घमंड, अहंकार;
रौद्रमहा — शिव का नाम [महारौद्र] २२ अंक महारौद्र जाति का है.
आपानक — मदिरा पान करने का पात्र;
संदेह अलंकार का नया उदाहरण
[यह कविता २२ वर्षीय एक चंचल बाला पर लिखी गयी है]
हैं बोल रहे द्वय विंशति वय.
हो गयी हमारी, तुम बोलो —
"क्या पीया आपने पावन पय."
ना, नहीं अभी है संशयमय
मम दशा, हलाहल अथवा पय
मैं जान नहीं पाता सचमुच
हैं कौन वस्तु जिससे हो जय.
" 'बहुजन हिताय' विष अमृतमय
'है सुधा' वासनामयी सभय."
— यह कथन किया करता सतर्क
है दशा इसलिये संशयमय.
उपदेशों में कितनी हैं जृम्भ
है स्वाभिमान में कितक दंभ.
मम दृष्टि खोजती यही सूक्ष्म
द्रुतता में है कितना विलम्ब.
चख चपल हलाहल आपानक
अथवा घट स्वर्णिम सुधा भरा.
संतुलित अंक द्वय विंशति के
वा रौद्रमहा देता घबरा.
शब्दार्थ :
द्वय विंशति — २२;
चख — आँखें
जृम्भ — जम्हाई, लक्षित अर्थ 'सारहीनता';
दंभ — घमंड, अहंकार;
रौद्रमहा — शिव का नाम [महारौद्र] २२ अंक महारौद्र जाति का है.
आपानक — मदिरा पान करने का पात्र;
संदेह अलंकार का नया उदाहरण
[यह कविता २२ वर्षीय एक चंचल बाला पर लिखी गयी है]
बुधवार, 12 मई 2010
क्रोध
क्या हीन भाव आया मन में
जो अपने से ही हुए रुष्ट.
या नहीं मिला जो था मन में
ये चिंता तुमको लगे पुष्ट.
क्या क्रोध आपको है हम पर
ये रेखाएँ क्यूँ मस्तक पर.
क्यूँ भृकुटी को है तान रखा
क्या रक्त खोलता है हम पर.
क्यूँ हुआ ताप तेरे मन में
जो घृणित भाव हैं देखन में.
मुख नयन आपके लाल हुए
चपला चमके जैसे घन में.
जो अपने से ही हुए रुष्ट.
या नहीं मिला जो था मन में
ये चिंता तुमको लगे पुष्ट.
क्या क्रोध आपको है हम पर
ये रेखाएँ क्यूँ मस्तक पर.
क्यूँ भृकुटी को है तान रखा
क्या रक्त खोलता है हम पर.
क्यूँ हुआ ताप तेरे मन में
जो घृणित भाव हैं देखन में.
मुख नयन आपके लाल हुए
चपला चमके जैसे घन में.
स्वसा-निवेदन
"स्वसा बहिन भगिनी बहना"
भैया! मुझको कुछ तो कहना.
बँधवा हाथों में लो भैया
बहना का नेह निर्मित गहना.
जब भ्रातृहीन कन्या से की
जाती थी पापी की तुलना.
ना बनूँ कहीं वैसी उपमा
तुम छोडो ना मिलना-जुलना.
क्यों भ्रातृहीन कन्या पहले
समझी जाती थी भाग्यहीन.
भ्राता अभाव, पित की मृत्यु
पर खुद करती पति खोज-बीन.
पर मैं भैया तुमसे ऐसा
सम्बन्ध जोड़ने आई हूँ.
मैं उषा और तुम दिवा भ्रात
सूरज-सी राखी लाई हूँ.
[मेरा मन किया कि आज बहन के प्रेम को रूप दिया जाये. इसके लिए दो-महीने का इंतज़ार नहीं हुआ.]
[सूचना — अब से मैं अँधेरे में तीर चलाया करूँगा. टिप्पणी-बॉक्स हटा रहा हूँ. क्योंकि मेरा सारा ध्यान ना आने-वाली टिप्पणियों पर लगा रहता है इससे नव सृजन बाधित होता है.]
भैया! मुझको कुछ तो कहना.
बँधवा हाथों में लो भैया
बहना का नेह निर्मित गहना.
जब भ्रातृहीन कन्या से की
जाती थी पापी की तुलना.
ना बनूँ कहीं वैसी उपमा
तुम छोडो ना मिलना-जुलना.
क्यों भ्रातृहीन कन्या पहले
समझी जाती थी भाग्यहीन.
भ्राता अभाव, पित की मृत्यु
पर खुद करती पति खोज-बीन.
पर मैं भैया तुमसे ऐसा
सम्बन्ध जोड़ने आई हूँ.
मैं उषा और तुम दिवा भ्रात
सूरज-सी राखी लाई हूँ.
[मेरा मन किया कि आज बहन के प्रेम को रूप दिया जाये. इसके लिए दो-महीने का इंतज़ार नहीं हुआ.]
[सूचना — अब से मैं अँधेरे में तीर चलाया करूँगा. टिप्पणी-बॉक्स हटा रहा हूँ. क्योंकि मेरा सारा ध्यान ना आने-वाली टिप्पणियों पर लगा रहता है इससे नव सृजन बाधित होता है.]
मंगलवार, 11 मई 2010
वयसंधि [भेल]
यौवन शैशव का मिलन हुआ
ये मिलन द्वंद्व के लिए हुआ
यौवन घुसने को था तत्पर
तन में, शैशव से खेल जुआ.
शैशव तो शैशव था बच्चा
वो द्यूत क्रीड़ में था कच्चा
यौवन से सब कुछ हार रहा
ये खेल कहीं होता सच्चा?
यौवन ने शैशव के चंचल
भावों को पग से चुरा लिया
चुपचाप ह्रदय में धर उसको
शैशव को उसने हरा दिया.
शैशव निज छोड़ हुई तत्पर
यौवन अपनाने को बाला.
आकर्षक तो होता ही है
कुछ नया-नया आने वाला.
मेरा अधिकार हुआ तुम पर
यौवन कहता "ओ, सुन बाला!"
उत्कोच दे रहा है गुपचुप
बढ़ने वाला द्वय कुच माला.
हो रही अचंभित देख-देख
परिवर्तन को भोली बाला.
निश्चिन्त घूमने वाली अब
दर्पण लेकर बैठी शाला.
एकांत देख फैंका उतार
अपने तन से व्रीडा विचार.
मन ही मन में हँसती निहार
कुच लेते जाते जो उभार.
शब्दार्थ :
भेल — मिश्रण, मिलाप, भेंट, मिलना, कहीं-कहीं 'चंचल' और 'मूर्ख' अर्थ भी लिया जाता है.
उत्कोच — घूस, रिश्वत;
व्रीडा — लज्जा, हया;
द्यूत क्रीड़ — जुए का खेल.
ये मिलन द्वंद्व के लिए हुआ
यौवन घुसने को था तत्पर
तन में, शैशव से खेल जुआ.
शैशव तो शैशव था बच्चा
वो द्यूत क्रीड़ में था कच्चा
यौवन से सब कुछ हार रहा
ये खेल कहीं होता सच्चा?
यौवन ने शैशव के चंचल
भावों को पग से चुरा लिया
चुपचाप ह्रदय में धर उसको
शैशव को उसने हरा दिया.
शैशव निज छोड़ हुई तत्पर
यौवन अपनाने को बाला.
आकर्षक तो होता ही है
कुछ नया-नया आने वाला.
मेरा अधिकार हुआ तुम पर
यौवन कहता "ओ, सुन बाला!"
उत्कोच दे रहा है गुपचुप
बढ़ने वाला द्वय कुच माला.
हो रही अचंभित देख-देख
परिवर्तन को भोली बाला.
निश्चिन्त घूमने वाली अब
दर्पण लेकर बैठी शाला.
एकांत देख फैंका उतार
अपने तन से व्रीडा विचार.
मन ही मन में हँसती निहार
कुच लेते जाते जो उभार.
शब्दार्थ :
भेल — मिश्रण, मिलाप, भेंट, मिलना, कहीं-कहीं 'चंचल' और 'मूर्ख' अर्थ भी लिया जाता है.
उत्कोच — घूस, रिश्वत;
व्रीडा — लज्जा, हया;
द्यूत क्रीड़ — जुए का खेल.
रविवार, 9 मई 2010
आपका विश्वास
चलो लो आ ही गया पास.
आपको था इतना विश्वास—
"कभी तो दो नयनों की बात
समझ में आयेगी, बरसात
हुवेगी, बोलेगी कोयल
ह्रदय में फूटेगी कोंपल
कामनाओं की, जिसमें से
किरण झाँकेगी आशा की,
मौनमयी मेरी भाषा की
समझ आयेगी सारी बात
आपका ह्रदय सारी रात
करेगा मिलने की ही बात."
चलो लो आ ही गया पास.
आपको था इतना विश्वास.
आपको था इतना विश्वास—
"कभी तो दो नयनों की बात
समझ में आयेगी, बरसात
हुवेगी, बोलेगी कोयल
ह्रदय में फूटेगी कोंपल
कामनाओं की, जिसमें से
किरण झाँकेगी आशा की,
मौनमयी मेरी भाषा की
समझ आयेगी सारी बात
आपका ह्रदय सारी रात
करेगा मिलने की ही बात."
चलो लो आ ही गया पास.
आपको था इतना विश्वास.
शनिवार, 8 मई 2010
पलक-द्वार
तुमको संगीत हमारा.
बोलों की है डोर और भावों का कंटक-चारा.
बीन बजाकर खर्च किया
धन लय तानों का सारा.
खोलो अब ये पलक-द्वार
फँसने दो मीन हमारा.
शुक्रवार, 7 मई 2010
किसलिये?
किसलिये फूल के यौवन में
कलिका का आता है पड़ाव?
किसलिये धूल के मारग में
चलती है मारुत पाँव-पाँव?
किसलिये सूर्य ने छोड़ दिया
क्रोधित होकर कर-पिय का कर?
किसलिये गरम होती वसुधा
निज पुत्रों पर, जो रहे विचर?
किसलिये कपासी मेघों का
नभ ने पहना है श्वेत-वसन?
ढँकना भूला है अंगों को
किसलिये अंगना का यौवन?
क्यों देह दहन करता उर का
जो पहले से ही शोक-मगन?
क्यों यादों के अब द्वार खोल
आई चुपके हिम-मंद-पवन?
क्यों साँझ समय कवि गेह निकल
देखा करता छवि का यौवन?
क्यों निशा और क्यों चंद-किरण
धरती पर करते हैं नर्तन?
किसलिये दिवा में छिप जाते
जन, छाया की गोदी में सब?
बस उसी तरह सब व्योम तले
टक-टकी लगाए बैठे अब.
क्यों नाच देख ढँकना भूले
पलकों को निज निर्लज्ज नयन?
मैं आया था सोने लेकिन
क्यों भूल गए निज नयन शयन?
कलिका का आता है पड़ाव?
किसलिये धूल के मारग में
चलती है मारुत पाँव-पाँव?
किसलिये सूर्य ने छोड़ दिया
क्रोधित होकर कर-पिय का कर?
किसलिये गरम होती वसुधा
निज पुत्रों पर, जो रहे विचर?
किसलिये कपासी मेघों का
नभ ने पहना है श्वेत-वसन?
ढँकना भूला है अंगों को
किसलिये अंगना का यौवन?
क्यों देह दहन करता उर का
जो पहले से ही शोक-मगन?
क्यों यादों के अब द्वार खोल
आई चुपके हिम-मंद-पवन?
क्यों साँझ समय कवि गेह निकल
देखा करता छवि का यौवन?
क्यों निशा और क्यों चंद-किरण
धरती पर करते हैं नर्तन?
किसलिये दिवा में छिप जाते
जन, छाया की गोदी में सब?
बस उसी तरह सब व्योम तले
टक-टकी लगाए बैठे अब.
क्यों नाच देख ढँकना भूले
पलकों को निज निर्लज्ज नयन?
मैं आया था सोने लेकिन
क्यों भूल गए निज नयन शयन?
मंगलवार, 4 मई 2010
श्रोतानुराग
कब बीता कविता का वितान
ना तृप्त हुए मन और कान.
था कैसा कविता का विमौन
मैं देख रहा चुपचाप कौन
आया उर में श्रोतानुराग
जो छीन रहा मेरा विराग
करपाश बाँध रंजित विशाल
भावों का करता है शृंगार
तुर चीर अमा का अन्धकार
लाया उर में जो प्रेमधार...
[अमित जी के प्रति पनपा श्रोतानुराग]
ना तृप्त हुए मन और कान.
था कैसा कविता का विमौन
मैं देख रहा चुपचाप कौन
आया उर में श्रोतानुराग
जो छीन रहा मेरा विराग
करपाश बाँध रंजित विशाल
भावों का करता है शृंगार
तुर चीर अमा का अन्धकार
लाया उर में जो प्रेमधार...
[अमित जी के प्रति पनपा श्रोतानुराग]
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
विपरीत से तुम सीध में आओ
विपरीत से तुम सीध में आओ.
अरी! पीठ न तुम मुझको दिखाओ.
मैं तुम्हें बिन देखकर पहचान लेता हूँ.
कल्पना से मैं नयन का काम लेता हूँ.
एक बार फिर कवि से आँख मिलाओ.
अयि! मुझे तुम नेह का फिर गीत सुनाओ.
कल्पना-विमान फिर से भेज देता हूँ.
"कंठ में आना" — तुम्हें सन्देश देता हूँ.
कल्पना-विमान पर तुम बैठ आ जाओ.
अयि! प्रिय कविते! कवि ह्रदय में बस जाओ.
जिह्व का आसन तुम्हें उपहार देता हूँ.
बस प्रिये! मैं आपसे रस-प्यार लेता हूँ.
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
परिवर्तन है या पतन-परा?
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा.
निर्लज लज्जा लुटने को थी
मैं देख रहा था खड़ा-खड़ा.
आँखों में आँसू नहीं कहीं
था उनमें इक आश्चर्य भरा.
आ रही स्वयं लज्जा लुटने
परिवर्तन है या पतन-परा?
आँखें मरने को हैं तत्पर
इक शील-भंग की घटना पर.
जो रहीं अभी तक मर्यादित
इक भूल हुई धोखा खाकर.
इक सुन्दर पुरुष देख मैंने
दूरी पर खड़े हुए सोचा.
क्या सुन्दरता पायी इसने
क्या वक्षस्थल पाया चौड़ा.
आया समीप दर्शन करने
'छाती खोलो, देखूँ' कहने.
था भेष पुरुष, नारी उसमें
हा! बड़ अपराध किया मैंने.
वो हँसी देख मेरी हालत
बोली — 'परिवर्तन जीवन है,
तुम अभी तलक अनजान रहे
बेकार तुम्हारा यौवन है."
सचमुच पाया मैंने खुद को
अपराधी मूरख बहुत बड़ा.
दण्डित आँखों को करूँ फोड़,
या करूँ ह्रदय को और कड़ा.
लज्जा परिभाषा बदल गयी
बदली नारी की परिभाषा
अब समझ नहीं आती मुझको
लज्जा की मौनमयी भाषा.
जब परिवर्तन ही जीवन है
तो बदले क्यूँ ना परिभाषा.
मंडूक-कूप मन यथारूप
की लगा रहा अब भी आशा.
[इसमें एक नूतन अलंकार "श्येन भ्रम अलंकार" है, व्याखा और परिभाषा वर्ष-दो वर्ष बाद एक नए ब्लॉग "काव्य-प्रतुल" में दिए जायेंगे. तब तक नवीन अलंकारों का रसास्वादन करने के लिए आपको थोड़े दिवसों के अंतराल पर नवीन रचनाओं को दिया जाएगा. आप टिप्पणी देखर मेरा प्रोत्साहन बढ़ा सकते हैं. मुझे तो यह भी पता नहीं कि इस ब्लॉग को कोई पढता है या नहीं.]
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा.
निर्लज लज्जा लुटने को थी
मैं देख रहा था खड़ा-खड़ा.
आँखों में आँसू नहीं कहीं
था उनमें इक आश्चर्य भरा.
आ रही स्वयं लज्जा लुटने
परिवर्तन है या पतन-परा?
आँखें मरने को हैं तत्पर
इक शील-भंग की घटना पर.
जो रहीं अभी तक मर्यादित
इक भूल हुई धोखा खाकर.
इक सुन्दर पुरुष देख मैंने
दूरी पर खड़े हुए सोचा.
क्या सुन्दरता पायी इसने
क्या वक्षस्थल पाया चौड़ा.
आया समीप दर्शन करने
'छाती खोलो, देखूँ' कहने.
था भेष पुरुष, नारी उसमें
हा! बड़ अपराध किया मैंने.
वो हँसी देख मेरी हालत
बोली — 'परिवर्तन जीवन है,
तुम अभी तलक अनजान रहे
बेकार तुम्हारा यौवन है."
सचमुच पाया मैंने खुद को
अपराधी मूरख बहुत बड़ा.
दण्डित आँखों को करूँ फोड़,
या करूँ ह्रदय को और कड़ा.
लज्जा परिभाषा बदल गयी
बदली नारी की परिभाषा
अब समझ नहीं आती मुझको
लज्जा की मौनमयी भाषा.
जब परिवर्तन ही जीवन है
तो बदले क्यूँ ना परिभाषा.
मंडूक-कूप मन यथारूप
की लगा रहा अब भी आशा.
[इसमें एक नूतन अलंकार "श्येन भ्रम अलंकार" है, व्याखा और परिभाषा वर्ष-दो वर्ष बाद एक नए ब्लॉग "काव्य-प्रतुल" में दिए जायेंगे. तब तक नवीन अलंकारों का रसास्वादन करने के लिए आपको थोड़े दिवसों के अंतराल पर नवीन रचनाओं को दिया जाएगा. आप टिप्पणी देखर मेरा प्रोत्साहन बढ़ा सकते हैं. मुझे तो यह भी पता नहीं कि इस ब्लॉग को कोई पढता है या नहीं.]
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
उडाओ ना समीर में रेत
अरी! तू सुन्दरता में छिपी, छ्लेगी कब तक ऐसे ही.
कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.
करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग.
छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग.
केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा.
जिसे सहलाया करता पवन, उसे तुम समझे रहा 'पटा'.
दिया जिसने तुमको निज नेह, उसी पर करती हो संदेह.
पवन तो रहता सबके साथ, नहीं तन है उसका ना गेह.
नहीं तुमने जाना कुछ भेद, पवन-प्राणों में किया अभेद.
प्राण हर कर पावोगी पवन, आपकी भूल, मुझे है खेद.
श्याम मन से ऊपर से श्वेत, अरी ओ घटा आज तो चेत.
करो ना मर्यादा को भंग, उडाओ ना समीर में रेत.
कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.
करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग.
छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग.
केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा.
जिसे सहलाया करता पवन, उसे तुम समझे रहा 'पटा'.
दिया जिसने तुमको निज नेह, उसी पर करती हो संदेह.
पवन तो रहता सबके साथ, नहीं तन है उसका ना गेह.
नहीं तुमने जाना कुछ भेद, पवन-प्राणों में किया अभेद.
प्राण हर कर पावोगी पवन, आपकी भूल, मुझे है खेद.
श्याम मन से ऊपर से श्वेत, अरी ओ घटा आज तो चेत.
करो ना मर्यादा को भंग, उडाओ ना समीर में रेत.
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