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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

आप अदालत हैं

अपना मानते हैं जिन्हें
वही नहीं देते अपनत्व।
पक्षपात करते हैं सदैव वे
पुत्री के आँसुओं का स्वर सुन।
नहीं जाना उन्होंने मेरी कटुता को
न ही मेरी दृष्टि में बने दायरों को
— संबंधों की मर्यादा के
— हास–परिहास के ।
तुरंत मूल्यांकन कर डाला
— ‘शक्की’ कहकर मेरा।

क्या मेरी दृष्टि को इतना अधिकार नहीं
कि वह सचेत रहे –
संभावित दुर्घटनाओं से पूर्व ही,
भेद कर सके दृष्टि-कुदृष्टि का।
क्या ऐसा करना अति आचार है?
क्या ऐसा करना ‘शक्की’ होना है?

प्रिय का हित सर्वोपरि हो जिसके लिए
उसी को ठहरा दिया जाए जब अपराधी
नहीं कर पाएगा तब वह कहीं ‘अपील’।

नहीं हैं तीन अदालतें
मेरे दायरे में
कि एक याचिका रद्द हो
कर सकूँ अपील दूसरी जगह।

आप ‘अदालत’ हैं –
एकमात्र
न्याय होगा तो
विश्वास पैदा होगा ‘अदालत’ में।
अन्यथा असामाजिक होना
पसंद करूँगा ‘मैं’।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

मत करो स्वयं को शुष्क शिला

मत करो स्वयं को शुष्क शिला 
मेरे नयनों से नयन मिला. 
फट पड़े धरा देखूँ जब मैं 
तुम हो क्या, तुमको दूँ पिघला. 


संयम मर्यादा शील बला 
तेरे नयनों में घुला मिला. 
फिर भी चुनौति मेरी तुमको 
मैं दूँगा तेरा ह्रदय हिला. 


मैं कलाकार तुम स्वयं कला 
तुम तोल वस्तु मैं स्वयं तुला. 
तोलूँगा तुमको पलकों पर 
चाहे छाती को रहो फुला. 


'मंजुल मुख' मेघों में चपला 
मैं आया तेरे पास चला. 
मंजुले! खुले भवनों में क्यों 
तुम भटक रहीं निज भवन भुला. 

रविवार, 16 मई 2010

नयन-मर्यादा

ओ दूर-दूर रहने वाले! हमसे भी दो बातें कर लो.
इतना दूर नहीं रहते जो मिलने में भी मुश्किल हो.
मौन बहुत रहते हो, दूरी पहले से, ये चुप छोड़ो.
कभी-कभी तो आते हैं, मिलते हैं. हमसे हँस बोलो.
जितना आते पास तिहारे उतना नयन झुकाते हो.
लज्जा है ये नहीं तुम्हारी, फिर भी तुम शरमाते हो.
बोल रही प्राची से नूतन, सब बातों से अवगत हो.
'मर्यादा में भी कहते हैं नयन किसी हद तक नत हों.'