मिला पहले दिन ही आभास
आपके आने में उल्लास.
छिपा देता मुझको संकेत
बसाना है अब प्रेम-निकेत.
बहानों का हो पर्दाफ़ाश
पता चल जाएगा क्यों वास.
किया क्या करने को उत्पात
बोलते हो क्यों मीठी बात.
हर्षता का पीड़ा से मेल
खेलते क्यों पेचीदा खेल
छलावा देकर मुझको आप
बंद हो जाओगे उर-जेल.
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
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मंगलवार, 21 सितंबर 2010
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