सहसा आये थे ...... देह साज
मिलने को, जाने कौन व्याज.
अधिकार जमाने .... पुरा-नेह
मानो करते थे .... मौन राज.
फिर भी .. कर व्यक्त नहीं पाए
निज नेह,.. मौन के मौन रहे.
कब तलक रहे जीवित आशा
मेरी, .. इतनी चुप कौन सहे?
चुप सहने को .. मैं सहूँ सदा
पर कैसे छलमय मान सहूँ?
तुम करो बात जब दूजे से,
मैं जलूँ, 'जलन' किस भाँति कहूँ?
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
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बुधवार, 8 दिसंबर 2010
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