श्याम लोचन विस्फारित लोल
मधुर लगते तेरे सब बोल
गीत गाते जो तुम चुपचाप
सुना करता कानों को खोल.
याद है मुझको पहली बार
छींट से देकर मैंने चार
किये थे अपने दोनों नयन
आपसे खुलवा चख के द्वार.
घने नभ में छाये थे मेघ
टपाटप बूँदों को मैं देख
रहा था, तेरा मुख अम्लान
तुरत चमकी चपला-सी रेख.
[गगन में मेघ घिरते हैं, किसी की याद घिरती है... ...अज्ञेय]
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
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सोमवार, 2 अगस्त 2010
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