'राहत'
कैसे पाऊँ दुःख में
आँसू सूखे खेवक रूठे
नयनों की नैया डूब रही
पलकों के बीच भँवर में.
'आहत'
तस्वीरें रेंग रहीं
तन्वंगी आशाएँ बनकर
तम, छाया है या निशामयी
जीवन ठहरा है मन पर?
'चाहत'
की चमड़ी ह्रदय से
उतरी है तेरी यादों की
मन पर मांसज-सी चिपकन है
चमड़ी चढ़ती उन्मादों की.
[प्रेम में असफल हुए एक पागल-प्रेमी की मनोदशा का चित्र]
इसमें कुछ पंक्तियों में अनुप्रास का छठा भेद 'अन्त्यारम्भ अनुप्रास' है.
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
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शनिवार, 4 सितंबर 2010
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