मैं रहूँ मौन
तो कहे कौन
'मन की बातें कुछ सकुचायी'.
तुम सुन्दर हो
दर्पण देखो
'लज्जा अंतर की मुस्कायी'.
करना विचार
है यही सार.
हो 'पेय' आप मैं हूँ 'पायी'.
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।