शनिवार, 8 मई 2010

पलक-द्वार

मीन-लोचने! खींच रहा
तुमको संगीत हमारा.
बोलों की है डोर और
भावों का कंटक-चारा.

बीन बजाकर खर्च किया
धन लय तानों का सारा.
खोलो अब ये पलक-द्वार
फँसने दो मीन हमारा.

शुक्रवार, 7 मई 2010

किसलिये?

किसलिये फूल के यौवन में
कलिका का आता है पड़ाव?
किसलिये धूल के मारग में
चलती है मारुत पाँव-पाँव?

किसलिये सूर्य ने छोड़ दिया
क्रोधित होकर कर-पिय का कर?
किसलिये गरम होती वसुधा
निज पुत्रों पर, जो रहे विचर?

किसलिये कपासी मेघों का
नभ ने पहना है श्वेत-वसन?
ढँकना भूला है अंगों को
किसलिये अंगना का यौवन?

क्यों देह दहन करता उर का
जो पहले से ही शोक-मगन?
क्यों यादों के अब द्वार खोल
आई चुपके हिम-मंद-पवन?

क्यों साँझ समय कवि गेह निकल
देखा करता छवि का यौवन?
क्यों निशा और क्यों चंद-किरण
धरती पर करते हैं नर्तन?

किसलिये दिवा में छिप जाते
जन, छाया की गोदी में सब?
बस उसी तरह सब व्योम तले 
टक-टकी लगाए बैठे अब.

क्यों नाच देख ढँकना भूले
पलकों को निज निर्लज्ज नयन?
मैं आया था सोने लेकिन
क्यों भूल गए निज नयन शयन?

मंगलवार, 4 मई 2010

श्रोतानुराग

कब बीता कविता का वितान
ना तृप्त हुए मन और कान.
था कैसा कविता का विमौन
मैं देख रहा चुपचाप कौन
आया उर में श्रोतानुराग
जो छीन रहा मेरा विराग
करपाश बाँध रंजित विशाल
भावों का करता है शृंगार
तुर चीर अमा का अन्धकार
लाया उर में जो प्रेमधार...
[अमित जी के प्रति पनपा श्रोतानुराग]

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

विपरीत से तुम सीध में आओ







विपरीत से तुम सीध में आओ.
अरी! पीठ न तुम मुझको दिखाओ.
मैं तुम्हें बिन देखकर पहचान लेता हूँ.
कल्पना से मैं नयन का काम लेता हूँ.
एक बार फिर कवि से आँख मिलाओ.
अयि! मुझे तुम नेह का फिर गीत सुनाओ.
कल्पना-विमान फिर से भेज देता हूँ.
"कंठ में आना" — तुम्हें सन्देश देता हूँ.
कल्पना-विमान पर तुम बैठ आ जाओ.
अयि! प्रिय कविते! कवि ह्रदय में बस जाओ.
जिह्व का आसन तुम्हें उपहार देता हूँ.
बस प्रिये! मैं आपसे रस-प्यार लेता हूँ.

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

परिवर्तन है या पतन-परा?

मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा
मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा.
निर्लज लज्जा लुटने को थी
मैं देख रहा था खड़ा-खड़ा.


आँखों में आँसू नहीं कहीं
था उनमें इक आश्चर्य भरा.
आ रही स्वयं लज्जा लुटने
परिवर्तन है या पतन-परा?



आँखें मरने को हैं तत्पर
इक शील-भंग की घटना पर.
जो रहीं अभी तक मर्यादित
इक भूल हुई धोखा खाकर.


इक सुन्दर पुरुष देख मैंने
दूरी पर खड़े हुए सोचा.
क्या सुन्दरता पायी इसने
क्या वक्षस्थल पाया चौड़ा.


आया समीप दर्शन करने
'छाती खोलो, देखूँ' कहने.
था भेष पुरुष, नारी उसमें
हा! बड़ अपराध किया मैंने.



वो हँसी देख मेरी हालत
बोली — 'परिवर्तन जीवन है,
तुम अभी तलक अनजान रहे
बेकार तुम्हारा यौवन है."


सचमुच पाया मैंने खुद को
अपराधी मूरख बहुत बड़ा.
दण्डित आँखों को करूँ फोड़,
या करूँ ह्रदय को और कड़ा.


लज्जा परिभाषा बदल गयी
बदली नारी की परिभाषा
अब समझ नहीं आती मुझको
लज्जा की मौनमयी भाषा.


जब परिवर्तन ही जीवन है
तो बदले क्यूँ ना परिभाषा.
मंडूक-कूप मन यथारूप
की लगा रहा अब भी आशा.


[इसमें एक नूतन अलंकार "श्येन भ्रम अलंकार" है, व्याखा और परिभाषा वर्ष-दो वर्ष बाद एक नए ब्लॉग "काव्य-प्रतुल" में दिए जायेंगे. तब तक नवीन अलंकारों का रसास्वादन करने के लिए आपको थोड़े दिवसों के अंतराल पर नवीन रचनाओं को दिया जाएगा. आप टिप्पणी देखर मेरा प्रोत्साहन बढ़ा सकते हैं. मुझे तो यह भी पता नहीं कि इस ब्लॉग को कोई पढता है या नहीं.]

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

उडाओ ना समीर में रेत

अरी! तू सुन्दरता में छिपी, छ्लेगी कब तक ऐसे ही.
कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.
करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग.
छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग.
केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा.
जिसे सहलाया करता पवन, उसे तुम समझे रहा 'पटा'.
दिया जिसने तुमको निज नेह, उसी पर करती हो संदेह.
पवन तो रहता सबके साथ, नहीं तन है उसका ना गेह.
नहीं तुमने जाना कुछ भेद, पवन-प्राणों में किया अभेद.
प्राण हर कर पावोगी पवन, आपकी भूल, मुझे है खेद.
श्याम मन से ऊपर से श्वेत, अरी ओ घटा आज तो चेत.
करो ना मर्यादा को भंग, उडाओ ना समीर में रेत.

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

कुम्भ का मेला

सभी स्वच्छ पथ उर के मेरे
अब चलो आप निर्भय होकर
सब तरफ आज घेरेंगी, पिय
कष्टों की टोली 'हो'...'हो' कर.

छिप गयीं आप क्यूँ घबराकर
मेला है ये तो कुम्भ, मकर
राशि में मिलने अब गुरु से
आना चाहे है बस दिनकर.

चख-बाण छोड़ दो तुम धनु से
मन के तापों का हरण करो
सब कष्ट निवारण हो जाएँ
कन्या! कवि को वरण करो.

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

स्वीकार

मुझसे तुम घृणा करो चाहे

चाहे अपशब्द कहो जितने
मैं मौन रहूँ, स्वीकार करूँ.
तुम दो जो तुमसे सके बने.

मुझपर तो श्रद्धा बची शेष.
बदले में करता वही पेश.
छोडो अथवा स्वीकार करो.
चाहे अपनत्व का करो लेश.

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

मान्यताओं को बदलने का साहस मुझमें नहीं!

निद्रा — मेरा असमय आना द्वारपाल के लिए बुरा है. मेरा अधिक आना विद्यार्थी के लिए दोष है, ब्रह्मचर्य का नाशक है. मेरा कम आना रोगी के लिए दुःखदायक है. किन्तु, मेरा शैशव के प्रति स्नेह सभी को भाता है. क्यों? क्या मैं मात्र शिशुओं के प्रेम की अधिकारिणी हूँ? क्या मैं मैं किसी पवित्र ह्रदय वाले स्वस्थ पुरुष से प्रेमिकावत प्रेम ना पा सकूंगी?
नेपथ्य से आवाज — अवश्य पा सकोगी देवि!
निद्रा — तुम कौन?
नेपथ से आवाज — मैं स्वप्न. तुम्हारी इस अकस्मात् चिंता का कारण, देवि! क्या मेरा प्रेम आपको पर्याप्त नहीं या मेरे प्रेम पर तुम्हें संदेह है?
निद्रा — निःसंदेह तुम मुझसे प्रेम करते हो. किन्तु...
स्वप्न — 'किन्तु' क्या? निद्रे!
निद्रा — हे स्वप्न! तुम अमैथुनीय सृष्टि का एक सुन्दर उदाहरण हो. पर लोगों की मान्यता को बदलने कि मुझमें सामर्थ्य नहीं. लोग आज भी तुम्हें मेरे द्वारा उत्पन्न मानते हैं.

(किसी की भी मान्यताओं को बदलना सहज नहीं.)

रविवार, 4 अप्रैल 2010

विचित्र बात

हे अज्ञातयौवना !
मैं बन गया महात्मा.
पर छूटते ही जा रहे, किस ओर से ये बाण हैं.
कितनी विचित्र बात है, कितनी विचित्र बात है.

इधर तुणीर रिक्त है.
उस ओर का भी रिक्त है.
पर क्या चला, किसको लगा
और कब चला, किस पर चला?

— यह पूछने की बात है.
इसमें किसी का हाथ है.
या फिर,
यूँ ही बात है!!

बुधवार, 31 मार्च 2010

नियोग

वर पञ्च शरों सह वनिता के
उर अनल-अयन में घुसकर के
निज के प्राणों का दाँव लगा
तज पञ्चतत्व को सौंप गया.

विधवा होकर कर सौंप जिसे
दे, ऐसा कोई और मिले
दे-वर विधवा होने पर भी
उत्तम-कुल का वर-बरात मिले.

वह अग्रज हो वा अनुज भई
या उत्तम कुल का इतर सही.
उसको ही देवर कहते, जो
आपात काले सहयोग करे.

जो भोग न हो संयोग न हो
जो चिर कालीन वियोग न हो.
सुत पाने की इच्छा भर हो
उसे पाप नहीं नियोग कहो.

(नियोग — एक वैदिक विधान, परिस्थिति विशेष में)

शनिवार, 27 मार्च 2010

भ्रमर अध्ययन

कोकनद के अन्दर अलि नाद
कर रहा था, लेटा उपराग
मृदुल शैया पर, संभवतया
कोक विद्या पढ़ता था जाग.

कामिनी कलियाँ किस-किस काल
काम के वश में हो शृंगार
किया करती, कलियों के पास
हमारा कब होता अभिसार.

मधुप क्योंकर हो जाते बंद
कमल अन्तःपुर में हर रात
सोचते  हैं कैसे किस तरह
मिलन हो नूतन कलियों साथ.

कौन-सी कलियाँ हैं सुकुमार
कौन खिलती हैं बारम्बार
कौन से सब करते व्यभिचार
कौन करती रहती शृंगार.

कौन-सी कलियाँ जिनकी गंध
पुष्प बनकर हो जाती मंद
कौन कलियाँ मुकुलन के बाद
सुगंधी देती हैं स्वच्छंद.

कौन कलियाँ देती सस्नेह
रात भर आलिंगन उर-गेह
कौन कलियों की कोमल देह
मुरझा जाती स्पर्श संदेह.

कौन कलियाँ नीरस निर्गम्य
कौन कलियाँ रमणी सी रम्य
कर रहा था मधुकर अनजान
कामिनी कलियों से पहचान.

(एक भौंरा देखा जो तमाम ब्लोग्स पर बैठ कर उनका मूल्यांकन कर रहा था कि कौन कितना रसदार? - तभी मुझे अपनी इस कविता कि स्मृति हो आयी.)

बुधवार, 17 मार्च 2010

अर्चना!

अर्चन करती आँखें तेरी
सृजन करती कविता मेरी
होवेगी नूतन उत्पत्ति
मेरे ही हाथों से तेरी.

नर्तन करती बाहें तेरी
सुर देती आवाजें मेरी
तुम ही हो मेरी संपत्ति
तुम ही हो मेरी कमजोरी.

तुझमे मुझमे कितनी दूरी
फिर भी मिलती श्वासें पूरी
तुम बिन मिलकर मिल जाती हो
तुम हो किस किसकी मजबूरी.

(एक पुरानी स्मृति को काव्य आहुति)

रविवार, 14 मार्च 2010

सौंदर्य उपासना

उठ गयी आज जल्दी सजनी
सब केश खुले से खुले बिखरे
सो रही उसी पर थी रजनी.

कर ग्रंथि केश मुख धोन चली
मद नयन भरे से भरे दिखते
धो रही शीत चख कुंद कली.

(जब मैंने प्रातः उठने पर सौंदर्य को मुख धोते देखा)

शनिवार, 13 मार्च 2010

आगमन

संयम की प्रतिमा बन जाओ
जितनी चाहे जड़ता खाओ
आगमन हुवेगा जब उसका
भूलोगे अ. आ. इ. ई. ओ.

दृग फेर चाहे मुख पलटाओ
या निर्लज हो सम्मुख आओ
पहचान हुवेगी जब उसकी
सूझेगा केवल वो ही वो.

मन की बातें न झलकाओ
पीड़ा को मन में ही गाओ
उदघाटित हो जाएगा जब
हंसेगे सब हा. हा. हो. हो.

(आदरणीया संयम मराठा जी को समर्पित)

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

खोखली धारणा

जिसके अर्चन में दिवस रात
रहती थीं निज आँखें सनाथ
जिसके आँचल में बैठ मुझे
मिलता था ईहित प्यार-मात।

जिसके दर्शन से नयन धन्य
समझा करता खोले कपाट
जिसके चलने पर ऊंच-नीच
पथ को करता था मैं सपाट।

जिसके नर्तन पर कभी-कभी
कवि उर में आ जाता भुचाल*
कविता बेचारी इधर-उधर
मारी फिरती जिह्वा संभाल।

खोखली धारणा थी मेरी
कुछ ही पल का था प्रिय मिलाप
जब से मिलकर वे दूर हुए
आँखें करती रहतीं विलाप।
* भूचाल

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

ज्ञानोपनयन-3

आया बसंत पट हटा अरी
चख चहक रहे "अब करो बरी"
तुमने इनको कब कैद किया
– है पूछ रही ऋतुराज-परी.

क्यों दी इनको आजन्म कैद
पिंजर खोलो, उल्लास भरो.
त्राटक कर इनको रूप पुरा
देना, नूतन उपचार करो.

(स्वसा नूतन श्री को सादर समर्पित)

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

ज्ञानोपनयन-2

"ज्ञानोपनयन देना मुझको "
बोली – क्यों-क्यों-क्यों-क्यों-क्यों-क्यों.
"कुछ वस्तु  पुरातन देखन को "
बोला मैंने उससे जब यों.

वो मंद-मंद मुस्का बोली –
"मैं समझ गयी तेरी बोली
तुम गोल-मोल बातें करके
सूरत दिखलाते हो भोली".

"तुम नहीं समझ पाए मुझको
क्यों मांग रहा ज्ञानोपनयन
मैं संबंधों के बीच नव्य
करना चाहूँ सम्बन्ध चयन".

(प्रेरणा: स्वसा नूतन जी)

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

ज्ञानोपनयन-१

आर-पार दिखने वाले
पर्दों को मुझसे हटा अरी.
नयन-दीप जलते हैं पीछे
जल जावेंगे करो घरी.

मुझ नयनों के लिए एक
ज्ञानोपनयन* ला करके दो.
जिसे पहन हर वास्तु पुरातन
नूतन-सी दिखती बस हो.

(*ज्ञानोपनयन — चश्मा - ज्ञान का)
प्रेरणा — ऋतुराज परी

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

3.33"

तीन दशमलव तीन-तीन
इंचों की है मुस्कान छली।
छले गए चख दोनों मेरे
विनय-कथन हो गया बली।

बली हो गए शब्द सभी
अवरुद्ध हो गयी वाक् गली।
जिह्वा पर जल रहीं चिताएँ
शब्दों की, अब ख़ाक भली।

उर तक जाती अनल चिता की
स्मृतियों की जब पवन चली।
तीन तीन तैंतीस संचारी
भावों में मुस्कान खली।

शब्द ख़ाक में मिलकर भी
थे रिझा रहे निज सु'मन-कली।
खलबली मची जृम्भा आयी
सब ख़ाक वाक् से भाग चली॥

(बड़ी मुस्कान वालों को समर्पित)