रविवार, 21 जुलाई 2013

भव्या वृष्टि

 
उपधानों की चारदिवारी
पयदानी कोपीन कियारी
अस्त-व्यस्त शैया पर सिंचित 
नयनों की तारक फुलवारी।
 
 
अंक पर्यंक लगे समदृष्टि 
परम आत्मा की नव सृष्टि 
मन आँगन की दशक शुष्कता
मेटन को हुई भव्या वृष्टि।
 
 
वत्सलता का शिलान्यास सी 
मध्य बिंदु माँ पिता व्यास सी 
कारा जीवन  में राका बन 
तृषित ह्रदय चातकी प्यास सी।
 
 
 
पयदानी = पैदानी,
चारदिवारी = चाहरदीवारी
कियारी = क्यारी 
 
 

21 टिप्‍पणियां:

संजय अनेजा ने कहा…

दुविधा में डाल दिया आपने प्रतुल भाई, बच्ची और कविता में ज्यादा प्यारी कौन?

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत ही सुंदर..... कविता भी और बिटिया भी

Pallavi saxena ने कहा…

वत्सलता का शिलान्यास सी
मध्य बिंदु माँ पिता व्यास सी ...बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ अनुपम भाव संयोजन।

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस शानदार प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार २३/७ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है सस्नेह ।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

ऐसी प्यारी बिटिया रानी -
इन पर तो कविता खुद ही न्योछावर हो जाय!

Majaal ने कहा…

हमारी संजय जी सी दुविधा नहीं है, बच्ची ज्यादा प्यारी है :)

लिखते रहिये ...

कालीपद प्रसाद ने कहा…

खुबसूरत रचना !
latest दिल के टुकड़े
latest post क्या अर्पण करूँ !

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

bahut hi sundar kavita , vaakai bitiya aur kavita donon hi pyari lagi.

Ramakant Singh ने कहा…

BAHUT HI SNDAR NAHIN ADBHUT AUR GAHAN ABHIWYAKTI

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

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@ दुविधा में डाल दिया आपने प्रतुल भाई, बच्ची और कविता में ज्यादा प्यारी कौन?.....sachhi baat

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pranam.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ संजय भाईसाहब , प्यारी तो बच्ची ही है कविता तो बच्ची के कारण से ही प्यारी लग रही होगी!

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. मोनिका जी, आपने जाना कार्य और कारण के अंतर्संबंध को. सच है … जिसने जाना उसे दोनों सुन्दर लगने लगे.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ पल्लवी जी, कविता के केंद्र की पहचान करना कवि मन में प्रवेश ले लेना है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ कुमारी राजेश जी, आभारी हूँ मन के कोमलतम भावों को मंच देने के लिए.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ प्रतिभा जी,
सच है … वात्सल्य की शिला पर कविता स्वयं को न्योछावर करने में धन्य मानती है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…


@ मजाल जी,
मेरी क्या मज़ाल जो कहूँ कविता प्यारी है.
ममता के आगे तो सारी समता हारी है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय कालीपद प्रसाद जी,
रचना पर पद+धारने के लिए आभार।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रेखा जी, 'आपका बिटिया और कविता दोनों को एक दृष्टि देखना' न्याय तुला के दोनों पाटों का कुशल हाथों से संतुलन बैठाना है. :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रमाकांत जी, जानता हूँ कविता के साथ यदि कोमलतम भावों की तस्वीर दी गयी हो तो अच्छे आलोचक भी अपना गुण त्याग देते हैं. :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…


@ प्रिय संजय जी,

प्रश्नों पर मुग्ध होना और उत्तर पर गदगद होना कोई आपसे सीखे।


Avinash Chandra ने कहा…

बहुत ही सुन्दर!
सच कहा है प्रतिभा जी ने - इतनी सुन्दर बिटिया पर कविता क्यों न न्योछावर हो!