गुरुवार, 28 जनवरी 2010

3.33"

तीन दशमलव तीन-तीन
इंचों की है मुस्कान छली.
छले गए चख दोनों मेरे
विनय-कथन हो गया बली.

बली हो गए शब्द सभी
अवरुद्ध हो गयी वाक् गली.
जिव्हा पर जल रहीं चिताएं
शब्दों की, अब ख़ाक भली.

उर तक जाती अनल चिता की
स्मृतियों की जब पवन चली.
तीन तीन तैंतीस संचारी
भावों में मुस्कान खली.

शब्द ख़ाक में मिलकर भी
थे रिझा रहे निज सुमन-कली.
खलबली मची ज्रिह्म्भा आयी
सब ख़ाक वाक् से भाग चली.

(लम्बी मुस्कान के धनी लोगों को समर्पित)

बुधवार, 27 जनवरी 2010

संभव नहीं

घन मेघ हों गर्जन न हो संभव नहीं.
सौंदर्य हो यौवन न हो संभव नहीं.
हृत पुष्प हो नवयौवना का जब खिला
अलि नाद हो मर्दन न हो संभव नहीं.

चिर प्रेम हो प्रियतम न हो संभव नहीं.
सुर ताल हो सरगम न हो संभव नहीं.
जब हों बंधे नृत्यांगना पद में नूपुर
संगीत हो नर्तन न हो संभव नहीं.

आपान हो गणिका न हो संभव नहीं.
अपमान हो चिंता न हो संभव नहीं.
फँसता निराशामय हृदय मझधार में
भगवान् हो तिनका न हो संभव नहीं.

दिनमान हो दिविता न हो संभव नहीं.
कवि पास हो कविता न हो संभव नहीं.
जब भी चलोगे कंटकों कि राह पर
प्रिय आप हों ओ' हम न हों संभव नहीं.

(समर्पित: स्वसा गीतिका को)

सोमवार, 18 जनवरी 2010

आँखें

काट लिए हैं दिवस और न जाने ही कितनी रातें.
नयन तुम्हारे देखन को उत्सुक हैं मेरी दो आँखें.
कभी आप नयनों को अवनत कर लेते हो शरमाते.
और कभी मेरी मर्यादा खोल नहीं पातीं आँखें.
एक बार ही मिलीं हमारे नयनों से तेरी आँखें.
पहले स्वागत नहीं किया अब करने को उत्सुक आँखें.
हाय! सुरक्षित हैं क्या तेरी वो प्यारी-प्यारी आँखें.
किवा ग्रस्त घावों से हैं वे बाण छोड़ने से आँखें.

(प्रेरणा: मंदाक्ष)
समर्पित: सभी विस्फारित नयनों वालों को

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

दृग नहीं पीठ पीछे मेरे

दृग नहीं पीठ पीछे मेरे
पढ़ सकूँ भाव मुख के तेरे
चाहूँ देखूं तुमको लेकिन
बैठा हूँ मैं मुख को फेरे.

अनुमान हाव-भावों का मैं
मुख फेर लगाता हूँ तेरे.
सौन्दर्य आपका है अनुपम
संयम को घेर रहा मेरे.

लेता है मेरा ध्यान खींच
बसबस लज्जा-लूतिका जाल.
लगता है चूस रहा तेरा
रक्तपा-रूप निज रक्त खाल.

(कच-देवयानी प्रबंधकाव्य से)

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

चरमर कर चलती है गाड़ी

भरी... परन्तु भरी जा रही
ला लाकर के और सवारी.
नहीं खिंच रही खींच रहा है
जान लगाकर वृषभ अगाड़ी.
चली कदम दो कदम, रुकी फिर
चली पुनः रुक-रूककर गाड़ी.
'अरे! चलावो तेज़ ज़रा' --
आती पीछे आवाज़ करारी.
वृषभ देह पर दीख रही है.
खिली अस्थियों की फुलवारी.
भ्रमर-कशा गुंजन-सटाक ध्वनि
करता गूम रहा व्यभिचारी.
क्षुधा-वृषभ पिय नित्य बैठने
आया करती है फुलवारी.
मिलन-कुशा कि बातें करके
मिल जाती निज देह पसारी.
फिर आयी है क्षुधा मिलन को
आस लिए अब चौथी बारी.
'लौट चली जावो' कहता है
'क्षुधे अरी ओ मेरी प्यारी!'
'पित ने मेरा लालचवश कर
दिया मृत्यु से अब रिश्ता री!
तुम निर्धन हो निम्न वर्ण की
वो यम कि संपन्न सुता री!'

बड़बड़ करती रही सवारी.
चरमर कर चलती है गाड़ी.

(आधुनिकतम लो-फ्लोर बसों को समर्पित)

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

मंगली कन्या

तुम अशुभ मान बैठे जो-जो
मुझको तो लगे वाही शुभ है.
हे त्रयोदशी मंगली कन्या !
तुम फुल्ल रहो शुभ ही शुभ है.

चतुर्थ, अष्ट, द्वादश घर में
कुण्डली मार बैठा मंगल.
चंचल स्वभाव भयभीत हुआ
अहि मान उसे होता ओझल.

(सभी मांगलिक कन्याओं को समर्पित)

बुधवार, 6 जनवरी 2010

संन्यासी का छोरा

तुमको लगी प्यास पास में आये कुछ-कुछ शरमाये.
"कंठ हमारा सूख गया" तुम बोले मुझसे हकलाये.
"प्य..प्य..प्य...प्य आस लगी पा..पा..पा..पानी दे दो भी.
क्यों बैठे चुपचाप छिपा पानी, मुझको लगते लोभी".
"आपानक था ह्रदय प्रेम का, पानी था उसमें थोडा.
पहले से ही मांग रहा संयम संन्यासी का छोरा."

(प्रेरणा : ऋतुराज परी )

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कविता की छोरी

तेरे जैसी सुन्दर प्यारी
मुझको लगती तेरी छोरी.
तुम हो कविता उल्लासमयी
वो है ममता-मूरत लोरी.

सोने को बार-बार आँखें
पलकों को ओड़ रहीं मोरी.
पर नींद नहीं आती मुझको
बिन देखे कविता की छोरी.

थक जातीं कर-कर इंतज़ार
रोने लगतीं आँखें मोरी.
माँ हाथ फेर करती दुलार
कहती कविता से 'भेजो री'.

तब निकल चली माँ मुख से ही
आई सम्मुख चोरी-चोरी.
उसके जाते ही नयन मुंदे
जादूगरनी कविता-छोरी.


कविता की छोरी - लोरी
(अर्पिता जी को समर्पित)

तीन पागल

पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल

एक वो
जो सुनता न किसी की
बस कहता,
हँसता
कर बात
बिना हँसी की.

दूजा वो
जो न सुनता न कहता
बस रहता
खोया खोया
लगा खोजने में खुद को.

तीसरा वो
जो बडबडाता
बिना सोच
कर देता
सोच प्रधान बातें
तब तर्कहीन बातें भी 
तर्क की कसौटी पर
कसने को
व्याकुल हो
uthtaa  है, वह पागल

पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल.