घन मेघ हों गर्जन न हो संभव नहीं.
सौंदर्य हो यौवन न हो संभव नहीं.
हृत पुष्प हो नवयौवना का जब खिला
अलि नाद हो मर्दन न हो संभव नहीं.
चिर प्रेम हो प्रियतम न हो संभव नहीं.
सुर ताल हो सरगम न हो संभव नहीं.
जब हों बंधे नृत्यांगना पद में नूपुर
संगीत हो नर्तन न हो संभव नहीं.
आपान हो गणिका न हो संभव नहीं.
अपमान हो चिंता न हो संभव नहीं.
फँसता निराशामय हृदय मझधार में
भगवान् हो तिनका न हो संभव नहीं.
दिनमान हो दिविता न हो संभव नहीं.
कवि पास हो कविता न हो संभव नहीं.
जब भी चलोगे कंटकों कि राह पर
प्रिय आप हों ओ' हम न हों संभव नहीं.
(समर्पित: स्वसा गीतिका को)
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
बुधवार, 27 जनवरी 2010
सोमवार, 18 जनवरी 2010
आँखें
काट लिए हैं दिवस और न जाने ही कितनी रातें.
नयन तुम्हारे देखन को उत्सुक हैं मेरी दो आँखें.
कभी आप नयनों को अवनत कर लेते हो शरमाते.
और कभी मेरी मर्यादा खोल नहीं पातीं आँखें.
एक बार ही मिलीं हमारे नयनों से तेरी आँखें.
पहले स्वागत नहीं किया अब करने को उत्सुक आँखें.
हाय! सुरक्षित हैं क्या तेरी वो प्यारी-प्यारी आँखें.
किवा ग्रस्त घावों से हैं वे बाण छोड़ने से आँखें.
(प्रेरणा: मंदाक्ष)
समर्पित: सभी विस्फारित नयनों वालों को
नयन तुम्हारे देखन को उत्सुक हैं मेरी दो आँखें.
कभी आप नयनों को अवनत कर लेते हो शरमाते.
और कभी मेरी मर्यादा खोल नहीं पातीं आँखें.
एक बार ही मिलीं हमारे नयनों से तेरी आँखें.
पहले स्वागत नहीं किया अब करने को उत्सुक आँखें.
हाय! सुरक्षित हैं क्या तेरी वो प्यारी-प्यारी आँखें.
किवा ग्रस्त घावों से हैं वे बाण छोड़ने से आँखें.
(प्रेरणा: मंदाक्ष)
समर्पित: सभी विस्फारित नयनों वालों को
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
दृग नहीं पीठ पीछे मेरे
दृग नहीं पीठ पीछे मेरे
पढ़ सकूँ भाव मुख के तेरे
चाहूँ देखूं तुमको लेकिन
बैठा हूँ मैं मुख को फेरे.
अनुमान हाव-भावों का मैं
मुख फेर लगाता हूँ तेरे.
सौन्दर्य आपका है अनुपम
संयम को घेर रहा मेरे.
लेता है मेरा ध्यान खींच
बसबस लज्जा-लूतिका जाल.
लगता है चूस रहा तेरा
रक्तपा-रूप निज रक्त खाल.
(कच-देवयानी प्रबंधकाव्य से)
पढ़ सकूँ भाव मुख के तेरे
चाहूँ देखूं तुमको लेकिन
बैठा हूँ मैं मुख को फेरे.
अनुमान हाव-भावों का मैं
मुख फेर लगाता हूँ तेरे.
सौन्दर्य आपका है अनुपम
संयम को घेर रहा मेरे.
लेता है मेरा ध्यान खींच
बसबस लज्जा-लूतिका जाल.
लगता है चूस रहा तेरा
रक्तपा-रूप निज रक्त खाल.
(कच-देवयानी प्रबंधकाव्य से)
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
चरमर कर चलती है गाड़ी
भरी... परन्तु भरी जा रही
ला लाकर के और सवारी.
नहीं खिंच रही खींच रहा है
जान लगाकर वृषभ अगाड़ी.
चली कदम दो कदम, रुकी फिर
चली पुनः रुक-रूककर गाड़ी.
'अरे! चलावो तेज़ ज़रा' --
आती पीछे आवाज़ करारी.
वृषभ देह पर दीख रही है.
खिली अस्थियों की फुलवारी.
भ्रमर-कशा गुंजन-सटाक ध्वनि
करता गूम रहा व्यभिचारी.
क्षुधा-वृषभ पिय नित्य बैठने
आया करती है फुलवारी.
मिलन-कुशा कि बातें करके
मिल जाती निज देह पसारी.
फिर आयी है क्षुधा मिलन को
आस लिए अब चौथी बारी.
'लौट चली जावो' कहता है
'क्षुधे अरी ओ मेरी प्यारी!'
'पित ने मेरा लालचवश कर
दिया मृत्यु से अब रिश्ता री!
तुम निर्धन हो निम्न वर्ण की
वो यम कि संपन्न सुता री!'
बड़बड़ करती रही सवारी.
चरमर कर चलती है गाड़ी.
(आधुनिकतम लो-फ्लोर बसों को समर्पित)
ला लाकर के और सवारी.
नहीं खिंच रही खींच रहा है
जान लगाकर वृषभ अगाड़ी.
चली कदम दो कदम, रुकी फिर
चली पुनः रुक-रूककर गाड़ी.
'अरे! चलावो तेज़ ज़रा' --
आती पीछे आवाज़ करारी.
वृषभ देह पर दीख रही है.
खिली अस्थियों की फुलवारी.
भ्रमर-कशा गुंजन-सटाक ध्वनि
करता गूम रहा व्यभिचारी.
क्षुधा-वृषभ पिय नित्य बैठने
आया करती है फुलवारी.
मिलन-कुशा कि बातें करके
मिल जाती निज देह पसारी.
फिर आयी है क्षुधा मिलन को
आस लिए अब चौथी बारी.
'लौट चली जावो' कहता है
'क्षुधे अरी ओ मेरी प्यारी!'
'पित ने मेरा लालचवश कर
दिया मृत्यु से अब रिश्ता री!
तुम निर्धन हो निम्न वर्ण की
वो यम कि संपन्न सुता री!'
बड़बड़ करती रही सवारी.
चरमर कर चलती है गाड़ी.
(आधुनिकतम लो-फ्लोर बसों को समर्पित)
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
मंगली कन्या
तुम अशुभ मान बैठे जो-जो
मुझको तो लगे वही शुभ है!हे त्रयोदशी मंगली कन्या !
तुम फुल्ल रहो शुभ ही शुभ है!
चतुर्थ, अष्ट, द्वादश घर में
कुण्डली मार बैठा मंगल!
चंचल स्वभाव भयभीत हुआ
अहि मान उसे होता ओझल!
(सभी मांगलिक कन्याओं को समर्पित)
बुधवार, 6 जनवरी 2010
संन्यासी का छोरा
तुमको लगी प्यास पास में आये कुछ-कुछ शरमाये.
"कंठ हमारा सूख गया" तुम बोले मुझसे हकलाये.
"प्य..प्य..प्य...प्य आस लगी पा..पा..पा..पानी दे दो भी.
क्यों बैठे चुपचाप छिपा पानी, मुझको लगते लोभी".
"आपानक था ह्रदय प्रेम का, पानी था उसमें थोडा.
पहले से ही मांग रहा संयम संन्यासी का छोरा."
(प्रेरणा : ऋतुराज परी )
"कंठ हमारा सूख गया" तुम बोले मुझसे हकलाये.
"प्य..प्य..प्य...प्य आस लगी पा..पा..पा..पानी दे दो भी.
क्यों बैठे चुपचाप छिपा पानी, मुझको लगते लोभी".
"आपानक था ह्रदय प्रेम का, पानी था उसमें थोडा.
पहले से ही मांग रहा संयम संन्यासी का छोरा."
(प्रेरणा : ऋतुराज परी )
सोमवार, 4 जनवरी 2010
कविता की छोरी
तेरे जैसी सुन्दर प्यारी
मुझको लगती तेरी छोरी.
तुम हो कविता उल्लासमयी
वो है ममता-मूरत लोरी.
सोने को बार-बार आँखें
पलकों को ओड़ रहीं मोरी.
पर नींद नहीं आती मुझको
बिन देखे कविता की छोरी.
थक जातीं कर-कर इंतज़ार
रोने लगतीं आँखें मोरी.
माँ हाथ फेर करती दुलार
कहती कविता से 'भेजो री'.
तब निकल चली माँ मुख से ही
आई सम्मुख चोरी-चोरी.
उसके जाते ही नयन मुंदे
जादूगरनी कविता-छोरी.
कविता की छोरी - लोरी
(अर्पिता जी को समर्पित)
मुझको लगती तेरी छोरी.
तुम हो कविता उल्लासमयी
वो है ममता-मूरत लोरी.
सोने को बार-बार आँखें
पलकों को ओड़ रहीं मोरी.
पर नींद नहीं आती मुझको
बिन देखे कविता की छोरी.
थक जातीं कर-कर इंतज़ार
रोने लगतीं आँखें मोरी.
माँ हाथ फेर करती दुलार
कहती कविता से 'भेजो री'.
तब निकल चली माँ मुख से ही
आई सम्मुख चोरी-चोरी.
उसके जाते ही नयन मुंदे
जादूगरनी कविता-छोरी.
कविता की छोरी - लोरी
(अर्पिता जी को समर्पित)
तीन पागल
पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल
एक वो
जो सुनता न किसी की
बस कहता,
हँसता
कर बात
बिना हँसी की.
दूजा वो
जो न सुनता न कहता
बस रहता
खोया खोया
लगा खोजने में खुद को.
तीसरा वो
जो बडबडाता
बिना सोच
कर देता
सोच प्रधान बातें
तब तर्कहीन बातें भी
तर्क की कसौटी पर
कसने को
व्याकुल हो
uthtaa है, वह पागल
पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल.
तीन तरह के पागल
एक वो
जो सुनता न किसी की
बस कहता,
हँसता
कर बात
बिना हँसी की.
दूजा वो
जो न सुनता न कहता
बस रहता
खोया खोया
लगा खोजने में खुद को.
तीसरा वो
जो बडबडाता
बिना सोच
कर देता
सोच प्रधान बातें
तब तर्कहीन बातें भी
तर्क की कसौटी पर
कसने को
व्याकुल हो
uthtaa है, वह पागल
पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल.
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
kisi ka saal ye nootan
किसी का साल ये नूतन
मरूंगा
वसन से हीन भिक्षुक बन
कटोरा हाथ में ले मांगते
फिरते रहे जो धन.
विवश हो देखती माता
वसन से हीन कन्याएं
मरा परिवार में कोई
वसन-शव खींच ले आये.
उसी से ढांकते हैं तन
उसी से ढांकते यौवन
उसी से कर रहे देखो
सुरक्षित स्वयं का जीवन.
दिखायेगी अभी वर्षा
निराले ढंग आकर के
सुनाएंगी अभी उनको
छतें मल्हार गाकर के.
हा! कैसे कटेगी रात
कटेगा किस तरह जीवन
जलेगा किस तरह चूल्हा
कहाँ पर, फिर बिना ईंधन.
कड़कती ठण्ड में जाने
मरा!* इस बार होगा क्या
मरा पिछले बरस बूढ़ा
मरेगी इस बरस बुढ़िया.
बना फिर जूट के कपडे
बचायेंगे, छिपा बचपन
कटेगा इस तरह फिर से
किसी का साल ये नूतन.
पिचकता पेट
"भूखा"बन गया आदर्श मेरा अब.
मरूंगा
"भूख से" ?या, "चिलचिलाती धुप (dhoop) से" ?
- मैं कब?मरें हैं अनगिनित निर्धन
वसन से हीन भिक्षुक बन
कटोरा हाथ में ले मांगते
फिरते रहे जो धन.
विवश हो देखती माता
वसन से हीन कन्याएं
मरा परिवार में कोई
वसन-शव खींच ले आये.
उसी से ढांकते हैं तन
उसी से ढांकते यौवन
उसी से कर रहे देखो
सुरक्षित स्वयं का जीवन.
दिखायेगी अभी वर्षा
निराले ढंग आकर के
सुनाएंगी अभी उनको
छतें मल्हार गाकर के.
हा! कैसे कटेगी रात
कटेगा किस तरह जीवन
जलेगा किस तरह चूल्हा
कहाँ पर, फिर बिना ईंधन.
कड़कती ठण्ड में जाने
मरा!* इस बार होगा क्या
मरा पिछले बरस बूढ़ा
मरेगी इस बरस बुढ़िया.
बना फिर जूट के कपडे
बचायेंगे, छिपा बचपन
कटेगा इस तरह फिर से
किसी का साल ये नूतन.
बुधवार, 25 नवंबर 2009
साहित्य प्रेमियों !_पुनश्च संबोधन
इस ब्लॉग का निर्माण आलंकारिक कवितायों को आपके सम्मुख परोसने के लिए किया गया है.
अनुरोध है कि आज से आप इस ब्लॉग का अनुसरण करते हुए अपनी प्रतिक्रियाओं को अवश्य प्रेषित करेंगे.
अनुरोध है कि आज से आप इस ब्लॉग का अनुसरण करते हुए अपनी प्रतिक्रियाओं को अवश्य प्रेषित करेंगे.
मंगलवार, 24 नवंबर 2009
साहित्य प्रेमियो !
मैं आज से नए-पुराने अलंकारों की कवितायें इस ब्लॉग पर दिया करूँगा.
आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहा करेगी.
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