मंगलवार, 24 जून 2014

निःशब्द क्षमा


 
 
 
 
 
 
 



क्षमा किसे मैं करूँ स्वयं से बड़ अपराध किया किसने
माँग रहे तुम क्षमा भूल पर मुझको दंड दिया जिसने
कोमलता के भाव ह्रदय से बन-बनकर तेरे निकले
फिर भी मैं था मौन देख बढ़ गया भाव तेरे पिचले
तुम पर मुझको क्रोध नहीं क्यों शब्द तुम्हारे हैं पिघले
मैं तो खुद को कोस रहा चुपचुप कुछ वर्षों से पिछले
अमा रही जब तक निज मन में तब तक ही मैं था भटके
जब से दरस किया तव का सुषमा मेरे मुख पर मटके।

7 टिप्‍पणियां:

कालीपद प्रसाद ने कहा…

सुन्दर !
उम्मीदों की डोली !

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

संजय भास्‍कर ने कहा…

very nice expressions

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

कालीपद जी, जो विचार जनसामान्य में समाचारों से निर्मित हुए हों, उन्हें जस का तस बिना वक्रोक्ति के रख दिया जाए तो वहाँ कवित्व की जड़ें बामुश्किल जम पाती हैं। ऐसे समाचारी भावों को व्यक्त करने के लिए जो आक्रोश या छंद चाहिए वह अभ्यास से संभव है। अन्यथा आयु की पक्वता के प्रतिकूल रचनाएँ क्षमा दायरे में खड़ी कर दी जाती हैं।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

रविकर जी, अपने प्रकाश को समेटकर खद्दोतों की टिम-टिम प्रस्तुतियों को चर्चा मंच देना स्तुति योग्य है।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

संजय भास्कर जी, प्रायः लोग एक्सप्रेशन्स के अंदर 'क्षमा'भाव को लेना भूल जाते हैं। भाव व्यक्त करने में जितना आकर्षण 'क्षमा' का होता है उतना किसी अन्य का नहीं। क्षमा माँगने वाले और क्षमा करने वाले के कायिक और मानसिक अनुभाव दर्शनीय होते हैं।

कविता रावत ने कहा…

सुन्दर मधुर कोमल अहसास