सोमवार, 26 मई 2014

ग्रहण करूँगा शपथ


मुझे देख तुम आते-जाते 
अधर-ओष्ठ दो बार मिलाते 
स्वर 'माँ' से कमतर न लगता 
'प' व्यंजन की झड़ी लगाते। 

माँ के इर्द-गिर्द है 'शाला' 
शयन समय है छुट्टी वाला 
भाषा शब्द और भावों का 
सीख रही व्याकरण निराला।

डाँट प्यार ममता से लथपथ 
हाँका करते गृहस्थी का रथ 
करूँ सुरक्षित जीवन भव्या 
ग्रहण करूँगा मैं भी शपथ। 

8 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (27-05-2014) को "ग्रहण करूँगा शपथ" (चर्चा मंच-1625) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

महेश कुशवंश ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Smart Indian ने कहा…

शुभकामनायें!

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…


आदरणीय मयंक जी, आपके आशीर्वचन और शुभकामनायें मेरी रचनाओं का सदैव मंगल करती रही हैं।

मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है आगे भी आपकी लेखनी सृजन के साथ-साथ कृशकाय नवजात कलमों के लिए मार्गदर्शन की भूमिका निभाती रहे! कलुषित मन से तनाव देने वाले सक्रिय मस्तिष्क स्वतः ही शीतग्रस्त होकर निष्क्रिय हो जायेंगे! काव्य साधकों की एकांतिक साधना में व्यवधान डालने वाले असुरवृत्ति के हो सकते हैं किन्तु फिर भी एक प्रतिशत की संदेह छूट प्रेमी या भक्त स्वभावी जन की अतिशयता को मिलनी चाहिए ही।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

आदरणीय कुशवंश जी, प्रशंसासूचक शब्दों की आवृत्ति कभी बासी नहीं पड़ती। इन शब्दों की ताज़गी भावना में निहित होती है इस कारण ये हर बार मधुर लगते हैं।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

अनुराग जी, "औषधीय पादप-वृक्षों का सम्मान कुशल वैद्य ही करते हैं, मुग्ध अनजान नहीं, परन्तु लाभ वे सभी को बिना भेद किये देते हैं। आम स्वाद के कारण से चाहे राजा माना जाए लेकिन नीम अपने रोगनिवारक गुणों के कारण ही महत्वपूर्ण बना हुआ है।" आपके प्रति एक भाव विशेष लुकाछिपी का खेल खेला करता है।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

संजय भास्कर जी, भीषण गरमी में बँधे 'कर' वाले सन की जय हो! :)