शुक्रवार, 4 मई 2012

सुन्दर शाप

रहा करता हूँ सबसे दूर
मिलन फिर भी होता भरपूर
जिन्हें मैं आने से रोकूँ
वही घुसते आँखों में घूर.
जहाँ जाता हूँ सारे साथ
चले आते हैं वे चुपचाप
भोर दिन संध्या हो या रात
निरंतर देते सुन्दर शाप.
दिवा में यादों का ले रूप
सोच को ले जाते हैं दूर
रात में स्वप्नलोक का कूप
घुमा लाते हैं मद में चूर.


आज मेरी प्रियंवदा का जन्मदिवस है।  प्रयास करूँगा कि वे आज बिना शिकायत रहें। 

18 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

खुब अभिव्यक्ति!!

सुन्दर शाप?

कविता रावत ने कहा…

Priyamvada ko janmdin ki badhai... is mauke par bahut sundar abhivykati bahut achhi lagi...

रविकर फैजाबादी ने कहा…

शुभकामनाएं |

सुज्ञ ने कहा…

@प्रयास करूँगा कि वे आज बिना शिकायत रहें।

अर्थात् शिकायत के प्रतिदिन अवसर मुहैया करवाते है जनाब :)
उन्हें तो हमारी ढ़ेर सी शुभकामनाएं पहुंचे, पर आपके लिए भी शुभकामनाएँ, आपका संकल्प अनवरत जारी रहे। :)

Ramakant Singh ने कहा…

भोर दिन संध्या हो या रात
निरंतर देते सुन्दर शाप.
दिवा में यादों का ले रूप
janmdin ki shubhakamana sahit badhai.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर ....मेरी और भी उन्हें जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

विलंबित बधाईयाँ|

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji....

...
...


pranam.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अच्छी रचना

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ कविता जी, बधाई के लिये आभार.

मेरी प्रियंवदा यदा-कदा ही मुझसे प्रसन्न होती हैं... क्योंकि मैं युग के हिसाब से काफी पिछड़ा हुआ हूँ.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रविकर जी, आभारी हूँ आपके नियमित मिलने वाले स्नेह का

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सुज्ञ जी, प्रयास फिर निष्फल हुआ.... आपकी समस्त शुभकामनाओं से भी मेरे स्वभाव पर कोई प्रभाव न पड़ा.
इस बार मैंने तय किया था कि जो वे कहेंगी वही करूँगा.... दोनों ने अपने कार्यालयों से निकलने से पहले निश्चित किया कि किसी बड़े रेस्टोरेंट में चला जाये... उन्होंने कहा - पहले साईँ मंदिर फिर रेस्टोरेंट में सुस्वादु भोजन... मैंने हामी भरी. उनके पहुँचने से पहले मैं वहाँ पहुँच गया ... रेस्टोंरेंट कोर्ट के आदेश पर बंद हो चुका था. मैंने इधर-उधर कोई वैकल्पिक रेस्टोरेंट ढूँढा... लेकिन कोई नहीं मिला. बहरहाल उनके आने पर मंदिर गये... उन्होंने पूजा-पाठ किया. मथ्था टेका. अपनी कंजूसी वाले स्वभाव के विपरीत मैंने गरीब महिलाओं को कुछ सिक्के दान में लिये.. फिर तलाश की एक शाकाहारी रेस्टोरेंट की... लेकिन आसपास कहीं नहीं मिला... उन्होंने दूर एक मॉल में चलने की बात की... मैंने 'अधिक समय होने की बात' से मना किया. तलाशते हुए एक रेस्टोरेंट मिला ... जाने लगे लेकिन मैंने कहा - इसमें नॉनवेज है... उन्होंने कहा -- 'नहीं है.' मैंने कहा -'देखो वहाँ कबाब लिखा है'. उन्होंने कहा -- 'वो केवल नाम है, वे वेज कबाब है.' मैंने कहा- 'मुझे नोन-वेज नाम से भी उलटी आती है.' मैंने कहा बराबर में साउथ-इन्डियन रेस्टोरेंट है. वहाइन चलते हैं.' उन्हें ये बात बेहद बुरी लगी. उन्होंने तब मुझे 'न जाने क्या-क्या कहा'... अब केवल मेरा काम सुनने का था.

मेरा बोलना उनको उपदेश लगता है, मैंने कुछ मनबहलाव करने के लिये शोपिंग की और दोनों बेहद तनाव के साथ घर लौट आये.' मैंने काफी मनाने की कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ. और एक और दिन मेरे बुरे स्वभाव से खराब हुआ.

क्या करूँ जब-जब अच्छा करना चाहता हूँ 'बुरा हो जाता है' उसके एक दिन पहले एक अच्छी शॉप से बड़े मन से एक बर्गर और एक कोई वेजरोल, खरीदा,.. लेकिन दोनों ही बासी और खट्टे निकले...

मित्र, मैं इस बदले ढर्रे में नहीं ढल पा रहा हूँ.... जो उन्हें पसंद है... वे चीज़ें ही मुझे नापसंद हैं. जैसे चोकलेट, नयी फिल्म, पेस्टी .............

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रमाकांत जी,
शुभकामनाओं के लिये आभारी हूँ.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. मोनिका जी,
जन्मदिन की शुभ्रकामनाओं के लिये धन्यवाद.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सञ्जय जी, आपकी बधाइयाँ देर से भी मिलें तो भी बासी नहीं पडतीं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

सुन्दर शाप ?

@ अब क्या व्याख्यारित करूँ.... जिनके दर्शन नहीं होते.
जिनके अदर्शन से निरंतर मानस में स्मृति बनी रहती है. वह अब सुखकर प्रतीत होती है.

कम कहे को अधिक समझें....

सुज्ञ ने कहा…

शाप सुहाने लगे तब भी मुक्त हो जाना नितांत आवश्यक है। शापमुक्ति का उपाय क्या है?

कोई शान्त शीतल स्नेह सरोवर अवश्य होगा, जहां विषाद का दाह, और सुहाती खुजलाहट का त्वचा रोग मिट जाता हो?

सुज्ञ ने कहा…

@मेरा बोलना उनको उपदेश लगता है,और एक और दिन मेरे बुरे स्वभाव से खराब हुआ.

सलाह तो सही है आपकी किन्तु उपदेश में अहंकार का अंश भी न आना चाहिए। प्रतिवाद भी स्नेह समर्पण की मधुर वाणी से सम्भव है। प्रत्येक व्यक्तित्व में न्यूनाधिक जानकारी का इगो होता ही है। संतुलन रखना होता है कि इगो हर्ट भी न हो, स्वाभिमान भी बचे और अभिमान में रूपान्तर भी न हो, सुक्ष्म व्यवहार है। वाणीव्यवहार में भी अनुशासन के प्रति चेतना आवश्यक है।