गुरुवार, 3 मई 2012

भानु-भामिनी

वियत श्याम घन की प्रतूलिका
पर लेटी पिय भानु-भामिनी
सोच रही बदला लूँगी मैं,
अभ्यागत जो बनी यामिनी.
नित वसुधा के रसिक मनों पर
कंज खिला कंदर्प साथ में
नंग अंग को किये हुए वह
नाचा करती अंध रात में.
मैं देखूँगी द्विज-दर्पण से
दर्पक सह निर्लज्ज यामिनी.
क्या मेरे प्रियतम कवि की भी
बनना चाहे तिया, कामिनी.
शब्दार्थ :
वियत - आकाश; प्रतूलिका - गद्दा; अभ्यागत - अतिथि;
भामिनी - क्रोधोन्मत्त स्त्री; यामिनी - रात्रि; कंज - कमल;
कंदर्प - कामदेव; अंध -गहन; दर्पक - कामदेव/ अभिमानी;
द्विज-दर्पण - चन्द्रमा रूपी दर्पण; तिया - स्त्री/पत्नी.

7 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

सादर प्रणाम |

Ramakant Singh ने कहा…

अर्थालंकार संग शब्दालंकार का सुन्दर संयोजन .
बड़ाई और बधाई के पात्र,स्वीकारें .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

सुज्ञ ने कहा…

अद्भुत काव्य!! आज तो बिजलियाँ गिरा दी।
आँखे चौधियाती है आपने तो मन को चौधिया दिया!! :)

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

.......
.......

nih: shabd


pranam.

Er. Shilpa Mehta ने कहा…

kamaal - adbhut - nihshabd karti rachna ....

बेनामी ने कहा…

Write more, thats all I have to say. Literally, it seems as though you relied on the video to make your point.
You obviously know what youre talking about, why
throw away your intelligence on just posting videos to your weblog when
you could be giving us something enlightening to read?


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