तुम अशुभ मान बैठे जो-जो
मुझको तो लगे वही शुभ है!हे त्रयोदशी मंगली कन्या !
तुम फुल्ल रहो शुभ ही शुभ है!
चतुर्थ, अष्ट, द्वादश घर में
कुण्डली मार बैठा मंगल!
चंचल स्वभाव भयभीत हुआ
अहि मान उसे होता ओझल!
(सभी मांगलिक कन्याओं को समर्पित)
यह ब्लॉग मूलतः आलंकारिक काव्य को फिर से प्रतिष्ठापित करने को निर्मित किया गया है। इसमें मुख्यतः शृंगार रस के साथी प्रेयान, वात्सल्य, भक्ति, सख्य रसों के उदाहरण भरपूर संख्या में दिए जायेंगे। भावों को अलग ढंग से व्यक्त करना मुझे शुरू से रुचता रहा है। इसलिये कहीं-कहीं भाव जटिलता में चित्रात्मकता मिलेगी। सो उसे समय-समय पर व्याख्यायित करने का सोचा है। यह मेरा दीर्घसूत्री कार्यक्रम है।
"भूखा"बन गया आदर्श मेरा अब.
"भूख से" ?या, "चिलचिलाती धुप (dhoop) से" ?
- मैं कब?मरें हैं अनगिनित निर्धन