शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

मंगली कन्या

तुम अशुभ मान बैठे जो-जो
मुझको तो लगे वही शुभ है!
हे त्रयोदशी मंगली कन्या !
तुम फुल्ल रहो शुभ ही शुभ है!

चतुर्थ, अष्ट, द्वादश घर में
कुण्डली मार बैठा मंगल!
चंचल स्वभाव भयभीत हुआ
अहि मान उसे होता ओझल!

(सभी मांगलिक कन्याओं को समर्पित)

बुधवार, 6 जनवरी 2010

संन्यासी का छोरा

तुमको लगी प्यास पास में आये कुछ-कुछ शरमाये.
"कंठ हमारा सूख गया" तुम बोले मुझसे हकलाये.
"प्य..प्य..प्य...प्य आस लगी पा..पा..पा..पानी दे दो भी.
क्यों बैठे चुपचाप छिपा पानी, मुझको लगते लोभी".
"आपानक था ह्रदय प्रेम का, पानी था उसमें थोडा.
पहले से ही मांग रहा संयम संन्यासी का छोरा."

(प्रेरणा : ऋतुराज परी )

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कविता की छोरी

तेरे जैसी सुन्दर प्यारी
मुझको लगती तेरी छोरी.
तुम हो कविता उल्लासमयी
वो है ममता-मूरत लोरी.

सोने को बार-बार आँखें
पलकों को ओड़ रहीं मोरी.
पर नींद नहीं आती मुझको
बिन देखे कविता की छोरी.

थक जातीं कर-कर इंतज़ार
रोने लगतीं आँखें मोरी.
माँ हाथ फेर करती दुलार
कहती कविता से 'भेजो री'.

तब निकल चली माँ मुख से ही
आई सम्मुख चोरी-चोरी.
उसके जाते ही नयन मुंदे
जादूगरनी कविता-छोरी.


कविता की छोरी - लोरी
(अर्पिता जी को समर्पित)

तीन पागल

पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल

एक वो
जो सुनता न किसी की
बस कहता,
हँसता
कर बात
बिना हँसी की.

दूजा वो
जो न सुनता न कहता
बस रहता
खोया खोया
लगा खोजने में खुद को.

तीसरा वो
जो बडबडाता
बिना सोच
कर देता
सोच प्रधान बातें
तब तर्कहीन बातें भी 
तर्क की कसौटी पर
कसने को
व्याकुल हो
uthtaa  है, वह पागल

पागल पागल पागल
तीन तरह के पागल.

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

kisi ka saal ye nootan

किसी का साल ये नूतन
पिचकता पेट
"भूखा"
बन गया आदर्श मेरा अब.

मरूंगा
"भूख से" ?
या, "चिलचिलाती धुप (dhoop) से" ?
- मैं कब?
मरें हैं अनगिनित निर्धन
वसन से हीन भिक्षुक बन
कटोरा हाथ में ले मांगते
फिरते रहे जो धन.

विवश हो देखती माता
वसन से हीन कन्याएं
मरा परिवार में कोई
वसन-शव खींच ले आये.

उसी से ढांकते हैं तन
उसी से ढांकते यौवन
उसी से कर रहे देखो
सुरक्षित स्वयं का जीवन.

दिखायेगी अभी वर्षा
निराले ढंग आकर के
सुनाएंगी अभी उनको
छतें मल्हार गाकर के.

हा! कैसे कटेगी रात
कटेगा किस तरह जीवन
जलेगा किस तरह चूल्हा
कहाँ पर, फिर बिना ईंधन.

कड़कती ठण्ड में जाने
मरा!* इस बार होगा क्या
मरा पिछले बरस बूढ़ा
मरेगी इस बरस बुढ़िया.

बना फिर जूट के कपडे
बचायेंगे, छिपा बचपन
कटेगा इस तरह फिर से
किसी का साल ये नूतन.

बुधवार, 25 नवंबर 2009

साहित्य प्रेमियों !_पुनश्च संबोधन

इस ब्लॉग का निर्माण आलंकारिक कवितायों को आपके सम्मुख परोसने के लिए किया गया है.
अनुरोध है कि आज से आप इस ब्लॉग का अनुसरण करते हुए अपनी प्रतिक्रियाओं को अवश्य प्रेषित करेंगे.

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

साहित्य प्रेमियो !

मैं आज से नए-पुराने अलंकारों की कवितायें इस ब्लॉग पर दिया करूँगा. 
आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहा करेगी.