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बुधवार, 25 जून 2014

आखेट कुशलता

तुम चले, चला धीरे-धीरे
मन मेरा चुपके से पीछे। 
तुम रुके, नहीं रुक सका हाय
संयम मेरे मन को खींचे।
क्यूँ रुके, नहीं तब था जाना
अब जान गया चख हैं तीखे।
रुक जाता तो मन मर जाता
आखेट-कुशलता बिन सीखे।

गुरुवार, 6 मार्च 2014

स्नेह ऋण - २

पिछले का शेष ... 

उर - सर स्वर यूँ 
निकला जैसे फूट पड़ी हो धारा 
शीतल जल की 
जिसमें छिपा हुआ था 
नेह - ऋण प्यारा 
"क्यों होते हो व्याकुल 
क्या रूठा है भाग्य तुम्हारा 
या फिर तुम भी यही चाहते 
हो निज पानी खारा 
एक बार तो आकर देखो 
मेरे अंतस में तुम 
सम्भवतः 
मिल जाए आपको 
हुआ आपसे जो गुम।"

मैंने सोचा - 
बड़ा बुरा है ऋण को लेकर जीना
कड़क शीत में डर के मारे 
कैसे आये पसीना 
नयन बंद कर डुबकी मारी 
थर - थर काँप गया मैं
उर - सर के हर कौने जाकर 
देख - देख हाँफा मैं 
बाहर आकर सर से बोला -
"तुमने मिथ्या बोला 
नहीं मिला मुझको  पिय का ऋण 
उर में धधके शोला। "
सरवर बोला -
"नहीं - नहीं मेरे वचनों में मिषता 
मुझमें ही आ छिपी हुई थी 
पिय - ऋण की अस्थिरता 
देखो! अपनी देह 
दीखती है धुंध - परी निकलती 
जाती है वापस 
पिया के पास हवा - सी उड़ती 
यही आपके पिय का ऋण है 
स्वयं जा रहा पिय के 
पास, जहाँ देनी है उसको 
पावनता पहचान। "

मैंने पूछा -
सरवर से 
"क्यूँ रहते शीतल हरदम 
रजनी आकर पास फहराती 
शीतलता का परचम
काँप - काँप जाता हूँ 
जब - जब देती पिया उधार 
कभी वक्ष से लगकर 
और कभी अधरों से प्यार 
पर उस कम्पन में मुझको 
शीतलता नहीं सताती 
पर सर में डुबकी लेने की 
सोच भी भय दिखलाती। "
 
सरवर बोला -
फँस जाओगे यदि लिया उधार 
और अंत में देना होगा 
सूद सहित ऋण - प्यार 
इससे तो मैं ही अच्छा हूँ 
मेरी शीतलता से 
आप बनोगे पाक 
बचोगे घोर वपु - निंदा से 
और यदि मिल जाता मुझमें
दूषित उर का प्यार 
उसका भी कर देता उर - सर 
प्यार सहित उद्धार 
और यदि ऐसे ही पिय से  
लेते रहे उधार 
ऋण भी पा जाएगा उस दिन 
बहुत अधिक विस्तार  
दब जाओगे बोझ तले तब 
प्राण रोएगा फबक - फबक कर 
दूषित हो मैं उबल पड़ूँगा 
कर बैठूँगा 
खर्च आपकी गुप्त निधि का 
हो जाओगे रंक आप 
अपने से ही जब 
मुझसे मिलकर पश्चाताप 
करोगे तब। 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

स्नेह-ऋण

शरद निशा में
काँप रहा तन
थर-थर-थर-थर
मैं बिस्तर में सिमट गया
तन फिर भी शीतल
तभी कहीं से आया लघु
एक स्वप्न प्यारा
पिय ने मेरी दशा देखकर
मारी स्नेह धारा
उस गरमी से दहक उठा
मेरा शीतल तन
चलि*
उर में जो ठहर गई थी
मेरी धड़कन
पौं फटने में रहे
मात्र अब थोड़े ही पल
और अधिक बन गया भुवन
शीकर में शीतल
भोर भई
भानु भी भय से
भाग रहे भीरु बन
कड़क शीत में
कर-पिया से
माँग रहे स्नेह तन
भानु
पिया के आँचल में
छिप गया सिमटकर
हुआ कपिल रंग
था अब तक जो
भगवा दिनकर
स्नेह ताप से गर्म किया
दिनकर ने निज तन
उर में छाई धुंध
छँटी और बढ़ा सपन
ह्रदय धुंध हटते ही पिय का
स्नेह हटा निज उर से 
सम्भवतः छिप गया
ओट पाकर के
निज उर-सर से
व्याकुल हो पूछा तब मैंने
"उर-सर! कहाँ छिपा है
'पिय का ऋण'
जिससे ठंडा निज
तन-मन बहुत तपा है
आप बता दें तो मिल जाए
ढाँढस मेरे हिय को।
आज नहीं तो
कल उधार
लौटाना है पिय को।"
 आगे का स्वप्न कहीं लापता हो गया है। मिलते ही आपसे मिलवाने लाऊँगा।

गुरुवार, 31 मई 2012

स्वप्न सुन्दर वल्लभा

पलकों तले मेरे बसा एक स्वप्न था.
जिसमें थी सोती एक सुन्दर वल्लभा.
लावण्य की सारी निधि उस पर ही थी.
वह स्वयं थी लेटे हुए निधि द्वार पर.
पुष्प-शैया पुष्प-कण से थी विभूषित.
पुष्प-वृष्टि हो रही पलकों तले नित.
स्वप्न-जग में घूमती वह देखकर यह.
हाथ में है हाथ पिय का साथ में वह.
जा रही पिय के सह झूलन को झूला.
पिय, पिया-स्पर्श से अपने को भूला.
झूलने आ पहुँचे उर-सर के तीरे.
महकते पुष्कल खिले थे पद्म-नीरे*.
निज जीवन-वृक्ष पर झूले पड़े थे.
पेंग देते ही स्पंदित वृक्ष होते.
झूलकर वे चल दिये उर-सर किनारे.
पग बढ़ाते तट-तटी पर शीतलारे.
अस्त होते देख दिनकर लालिमारे.
कुछ समय बैठे थके तट पिय-पियारे.
बैठ तट पर देख खिलती सित कुमुदिनी.
ले रही पिय शीतलाई भरनि तंबी.
पी उसका पी रहा स्नेह-नीर सर में.
औ' उर को कर दिया स्नेह-रिक्त क्षण में.
तभी .... वे आँख से ओझल निशा में हो गये..
हाय, निज नयन बहुत व्याकुल हुए.
पलकें करों से मसलता मैं नित उठा.
पर उठ न पाती स्वप्न सुन्दर वल्लभा.
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* नीरे = नियरे, नेड़े, पास में

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

जलन

सहसा आये थे ...... देह साज 
मिलने को, जाने कौन व्याज. 
अधिकार जमाने .... पुरा-नेह 
मानो करते थे .... मौन राज. 


फिर भी .. कर व्यक्त नहीं पाए 
निज नेह,.. मौन के मौन रहे. 
कब तलक रहे जीवित आशा 
मेरी, .. इतनी चुप कौन सहे? 


चुप सहने को .. मैं सहूँ सदा 
पर कैसे छलमय मान सहूँ? 
तुम करो बात जब दूजे से, 
मैं जलूँ, 'जलन' किस भाँति कहूँ?