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शनिवार, 29 नवंबर 2014

पौरुषीय व्रीड़ा

देखकर भी मैं गर्दन मोड़
लिया करता हूँ होकर मौन
नयन करते रहते हैं दौड़
धरा को पाता हूँ न छोड़।
 
भ्रमण करते रहते भ्रम में
नयन पलकों में घुस अंदर
परन्तु पूछ रहा मन मौन -
"कौन आया है आश्रम में?"
 
नाम है वही परन्तु बिम्ब
ज़रा सा लगता हैं कुछ भिन्न
देखकर जानूँ कैसे मैं
अभी तक हूँ मैं संयम में।
 

बुधवार, 18 जुलाई 2012

कविता-चेरी

आँखें तलाशती हैं मेरी
कविता के लिये नई चेरी
आ बन जावो प्रेरणा शीघ्र
मत करो आज़ बिलकुल देरी.
है कौन प्रेरणा बने आज़
मैं देख रहा हूँ सभी साज
बैठे हैं अपने गात लिये
पाने को मेरा प्रेम-राज.
आकर्षित करने को सत्वर
कुछ नयन कर रहे आज़ समर
शर छूट रहे हैं दुर्निवार
कुछ डरा रहे हैं लट-विषधर.
मुझको चूमो कह रहे गाल
मुझको छूवो कह रही खाल
पग दिखा रहे हैं मस्त चाल
- ये उलझाने को बिछा जाल.
कुछ कटे हुए केशों की भी
कर रहे हैं इतनी देखभाल
अंगुली फेरें, मुझको लेकिन
फण कटे व्याल लग रहे बाल.
जिन पर वसनों की कमी नहीं
वे वसन दिखाते सभी आज़
आकर्षक बनने को तत्पर
कुछ दिखा रहे हैं छिपी-लाज.
सुन्दर होना सुन्दर दिखना
ये तो सबसे है भली बात
पर मर्यादा भी रहे ध्यान
वसनों के अन्दर रहे गात.
अब भी तलाशती हैं आँखें
कविता के लिये नई चेरी
जो दे कविता को नई दिशा
वो बन जावे आकर मेरी.
 
*कविता-चेरी = 'प्रेरणा' से तात्पर्य
दुर्निवार = लगातार, जिसे रोकना कठिन हो.

बुधवार, 21 जुलाई 2010

दृग नहीं पीठ पीछे मेरे

दृग नहीं पीठ पीछे मेरे
पढ़ सकूँ भाव मुख के तेरे.
चाहूँ देखूँ तुम को लेकिन
बैठा हूँ मैं मुख को फेरे.

अनुमान हाव-भावों का मैं
मुख फेर लगाता हूँ तेरे.
सौन्दर्य आपका है अनुपम
संयम को घेर रहा मेरे.

लेता है मेरा ध्यान खींच
बरबस लज्जा-लूतिका* जाल.
लगता है चूस रहा तेरा
रक्तपा*-रूप निज रक्त-खाल.

* [रक्तपा – जोंक, खून पीने वाली, डायन, पिशाचन; लूतिका – मकड़ी]

गुरुवार, 27 मई 2010

लज्जा के नीड़ में चपलता का बसेरा

अब टिकते नहीं फिसलते हैं
मुख पर जाकर मेरे दो दृग.
पहले रहती थी नीड़ बना
लज्जा, अब रहते चंचल मृग.

चुपचाप चहकती थी लज्जा
बाहर होती थी चहल-पहल. 
चख चख चख चख देखा करते
कोणों को करके अदल-बदल.

अब नहीं रही वैसी सज्जा
औ' रही न वैसी ही लाली.
बस उछल-उछल घूमा करते
मृग इधर-उधर खाली-खाली.

[जब से लज्जा के आवास में चपलता ने डेरा जमाया है लज्जा चहकना भूल गयी है और इस चपलता को नारी की जागृति समझा जा रहा है, बौद्धिकता माना जा रहा है, सहमती और समर्पण में अंतर कर उसे उसके दिव्य गुणों से पृथक करने का प्रयास हो रहा है. 'सहमती' में नारी की गरिमा को और उसके 'समर्पण' में पुरुष के वाक्-जाल को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है.]

बुधवार, 26 मई 2010

ये लज्जा तो केवल संयम

बोलूँ ना बोलूँ ......सोच रही.
बोलूँगी क्या फिर सोच रही.
मन में बातें ...करने की है
इच्छा, लज्जा पर रोक रही.


कुछ है मन में थोड़ा-सा भय.
संकोच शील में होता लय.
पलकों के भीतर छिपे नयन
मन में संबोधन का संशय.


"प्रिय, नहीं आप मेरे प्रियतम
मन में मेरे अब भी है भ्रम
प्रिय हो लेकिन तुम 'प्रिये' नहीं
ये लज्जा तो केवल संयम."


"क्या संयम पर विश्वास करूँ?
या व्यर्थ मान लूँ इसको मैं?
आनंद मिलेगा अंत समय?
क्या संयम देगा लम्बी वय?"

मंगलवार, 25 मई 2010

नर की लज्जा बदरंग गाय

लज्जा नारी का नहीं कवच
लज्जा तो आभूषण कहाय.
लज्जा स्वाभाविक भाव नहीं
लज्जा तो पहनी ओढ़ी जाय.

लज्जा नारी का मूलतत्त्व
फिर भी गुण आभूषण कहाय.
मैंने लज्जा को कवच कहा
मेरी लज्जा अब मुँह छिपाय.

नारी की लज्जा आभूषण
नर की लज्जा बदरंग गाय.
जो दूध बहुत देती फिर भी
मारी पीटी दुत्कारी जाय.

[छंद ज्ञान के समर्थक "ओढ़ी" और "दुत्कारी शब्दों में एक-एक मात्रा घटाकर भी लिख-पढ़ सकते हैं]

रविवार, 16 मई 2010

नयन-मर्यादा

ओ दूर-दूर रहने वाले! हमसे भी दो बातें कर लो.
इतना दूर नहीं रहते जो मिलने में भी मुश्किल हो.
मौन बहुत रहते हो, दूरी पहले से, ये चुप छोड़ो.
कभी-कभी तो आते हैं, मिलते हैं. हमसे हँस बोलो.
जितना आते पास तिहारे उतना नयन झुकाते हो.
लज्जा है ये नहीं तुम्हारी, फिर भी तुम शरमाते हो.
बोल रही प्राची से नूतन, सब बातों से अवगत हो.
'मर्यादा में भी कहते हैं नयन किसी हद तक नत हों.'