गुरुवार, 5 जुलाई 2012

शिकायत

"आऊँगा"
कह कह कर
क्यों रह रह जाते हो
आपके लिये रिक्त करती हूँ घर
पर तुम ना आते हो.
"गाऊँगा"
कह कह कर
चुप क्यों रह जाते हो
आपके लिये बाँधती हूँ नूपुर
पर तुम ना गाते हो.
"जाऊँगा"
कह कह कर
तुम क्यों ना जाते हो
आपके लिये प्रशस्त करती हूँ पथ
पर तुम घबराते हो.

24 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति ।

आभार प्रतुल जी ।।

रविकर फैजाबादी ने कहा…

यह है शुक्रवार की खबर ।

उत्कृष्ट प्रस्तुति चर्चा मंच पर ।।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अति सुंदर ....

India Darpan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

Sushil ने कहा…

सुंदर !
अच्छा लो चले ही जाता हूँ
चलो अब नहीं घबराता हूँ !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

kitne arth ... kitna snehil manuhaar

ZEAL ने कहा…

कौन है इतनी शिकायत कर रहा है, मान क्यों नहीं लेते ? ब्लॉगर होकर घबराना कैसा। कवि और ब्लॉगर से तो बड़े-बड़े नेता भी घबराते हैं।

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत सुन्दर प्यारी सी रचना

मदन शर्मा ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति आभार !!!!

Ramakant Singh ने कहा…

कह कह कर
तुम क्यों ना जाते हो
आपके लिये प्रशस्त करती हूँ पथ
पर तुम घबराते हो.

गजब की चाह .

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत ही उलझन है। सबकुछ कहकर न जाना ही तो इस उलझन को दूर करता है।

सतीश चंद्र सत्यार्थी ने कहा…

क्या खूब!
आपकी कविताएँ वाकई सुन्दर हैं..
बधाई..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

रविकर ...

बन गये 'खबर'... हम बेखबर

अब इधर-उधर ... लगे जाते डर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. मोनिका,

दूसरों के घर, किञ्चित स्वर.

'उपस्थिति' पर, अति सुन्दर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ इंडिया दर्पण !

दे निमंत्रण... 'करो पदार्पण, ब्लॉग किसी क्षण.'

हथेलियाँ रगड़ ... 'आयेगा'-ये प्रण, 'उपस्थिति कृपण'

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सुशील जी... अगर

आये हो इधर, जाना कर डिनर

बोलो हो निडर, बिना भंगस्वर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रश्मि प्रभा'त झर

'ब्लोगर सम्मान' पर

है स्नेह का असर

जो आये मेरे घर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दिव्या की नज़र, पढ़ती है 'अंतर'.

प्रश्न के उत्तर, स्वेद तर-ब-तर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ राजेश कुमारी स्वर

को तारीफ़ का है ज्वर.

मन चाहता मगर

ना जाये वह उतर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ मदन छोड़े शर

पुष्प के इधर.

मुझे क्या फिकर

रति कोप घर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रमाकांत सर

लट बिखेर कर

कह रहे - मुझ पर

चाह का असर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ मनोज का स्तर

'सोच' पलस्तर

आद्र हो उतर

फिर भी रहे सुपर.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सतीश चंद्र पर

काव्य का असर

जो आ गये इधर.

धन्य हुआ घर.

ZEAL ने कहा…

waah Pratul ji, Great retorts !