मंगलवार, 29 मई 2012

मैं दर्शनों को ही किराया मानता

है निज उर में, बहुत खाली जगह
एक क्या, अनेक बस सकते यहाँ.
रुक क्यों गये, इत आते हुए तुम
क्या कहीं ओर भी है घर, इस उर के सिवा?
न लूँगा आपसे, कुछ भी किराया
दे दूँगा अपितु, स्नेहिल संपदा.
जो है अभी भी, उर में इकट्ठी
उसको व्यय करना, चाहे शृंगार में ही.
क्या कहा? यहाँ पर आना कठिन है
और बाद में जाना भी मुश्किल.
स्नेह धन को लेना गुनाह है.
तो कहिये - आसान क्या, निर्दोष क्या है?
बिन किये तुम बात मुझसे, चल पड़े.
क्या यही होता आश्रितों का धर्म है?
ये जानकर भी 'है सभी सुविधा यहाँ'
मैं दर्शनों को ही किराया मानता.
कवि क्या कहना चाहता है, उसकी मंशा क्या है?
— क्या वह भटकते नये किरायेदारों को खुला ऑफर दे रहा है?
— क्या वह किसी 'किरायेदार विशेष' को अपने उर-आश्रय की खूबियाँ बता रहा है?
— क्या वह बढ़ती महँगाई में किराया चुकाने का नया तरीका बता रहा है?
या फिर, वह 'तिवारी' पॉलिसी पर चलने की सोचने लगा है?

14 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत सारगर्भित रचना ...बधाई स्वीकारें

नीरज

ZEAL ने कहा…

मंथन कराती, और हलचल पैदा करती , बेहतरीन कविता।

Kailash Sharma ने कहा…

मन में अनेक प्रश्न जगाती गहन अभिव्यक्ति....आभार

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

shabdon ke jaal me fas gaye...sach hai yahan aana bhee kathin hai yahan se jaana bhee kathin hai..behtarin kriti

Ramakant Singh ने कहा…

है निज उर में, बहुत खाली जगह
एक क्या, अनेक बस सकते यहाँ.
रुक क्यों गये, इत आते हुए तुम
क्या कहीं ओर भी है घर, इस उर के सिवा?

इसके बाद भी कुछ समझाना समझना शेष रह जाता है ?

कौशलेन्द्र ने कहा…

लगता है किरायेदार एक ही है और खाली घर बहुत से मंडरा रहे हैं किरायेदार के चारो तरफ़। खाली घर की शिकायत वाज़िब है।

आशा जोगळेकर ने कहा…

दर्शन को ही किराया मानता, वाह ।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ स्वीकार लई बधाई, नीरज भाई !

और इस तरह आपके दर्शन से भी हो गई कमाई.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दिव्या जी, मंथन इस पर भी हो कि 'हलचल' भावों तक सीमित है.
"मम उर-आश्रम में हलचल नहीं होती... वह एक कंप रहित क्षेत्र है.
यदि कंप हुआ भी... उर-आश्रय का ढाँचा मज़बूत होने से .. दीवारें नहीं ढहेंगी." [विज्ञापन]

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ कैलाश जी, उर-आश्रम में कई कक्ष ऐसे हैं जिनमें किरायेदारों का बहुत कम ठहराव है...प्रायः वहाँ ताले पड़े रहते हैं.
'जिनके पास बड़े-बड़े फ़ार्म-हाउस हों उनसे छोटे-मोटे ठिकानों की उपेक्षा हो जाना' - एक सामान्य बात है.
क्रियान्वयन से पूर्व 'प्रश्न' और 'संशय' यदि किरायेदारों के मन में आ जाएँ तब तो बहुत मुश्किल है 'उर-आपार्टमेंट' के सभी 'रूम्स' को 'फिल' करना.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. आशुतोष जी,
ये धंधा ही ऐसा है कि 'बातों की खाते हैं.' आश्रय की तलाश में भटकतों को मीठी-मीठी बातों से उलझाना एक कला है... प्रोपर्टी डीलरों में ये गुण कूट-कूटकर भरा होता है.
ये सच है कि यहाँ पर (उर-स्थली में) विरलों का ही 'फ्लेट' निकलता है.... लेकिन उनका 'फ्लेट' छोड़कर जाना इस अर्थ में कठिन है कि वे रुष्ट होकर बेशक यहाँ से चले जाएँ .... किन्तु उनके इस्तमाल किये 'फ्लेट' में कोई दूसरा नहीं ठहराया जायेगा. वह उसी के नामपर रहेगा. नेमप्लेट उसी की रहेगी. यहाँ ताले लगे फ्लेट्स को दोबारा किराए पर नहीं उठाया जाता.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

फ्लेट = फ़्लैट

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रमाकांत जी,
समझना-समझाना फिर भी पड़ता है.... मार्केट में कब कोई नये ऑफर के साथ आ जाये... और मेरा धंधा चौपट हो जाये... तब तो भूखों ही मरना पड़ेगा.
विक्रेता को जाते हुए ग्राहक से अकसर ये कहते हुए तो जरूर सुना होगा "साब, पूरे बाज़ार में इससे सस्ता सौदा नहीं मिलेगा. आप गलती कर रहे हैं इस ऑफर को ठुकराकर."
मतलब "लौट आइये.. एक बार मुझे परखिये तो!"

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ कौशलेन्द्र जी, आचार्य की दृष्टि से कभी कुछ नहीं बचता. आपने अपने कथन-सूत्र से मेरी मंशा का उदघाटन कर दिया.
अब तो आप भी एक 'गवाक्ष' के अधिकारी हैं.
आप तो जानते ही हैं
'खाली घर भूतों का बसेरा'
'खाली पड़े मकान बहुत जल्द जर्जर हो जाते हैं'
'रहने से ही रौनक आती है'
'बसावट से ही बस्ती बनती है.'