रविवार, 14 अगस्त 2011

बिना सन्दर्भ सौन्दर्य प्रशंसा ... संशय का कारण

यदि मैं आपकी 
अकस्मात् बिना सन्दर्भ 
सौन्दर्य की प्रशंसा करने लगूँ 
तो आपके मन में 
सर्वप्रथम कौन-सा भाव आयेगा 
— क्या संशय तो नहीं? 
स्यात मेरी सोच, मेरी भावना पर.
किवा, प्रशंसा सुनकर 
लज्जा करना उचित समझोगे?
— हाँ, यदि आप 
स्वयं की दृष्टि में भी 
सुन्दर हो 
तो अवश्य लजाओगे.
क्या आप वास्तव में सुन्दर हो? 
आप अपने सौन्दर्य के विषय में क्या धारणा रखते हैं? — जानने की इच्छा है.

क्या विरह भाव के
धारण करने के लिए 
'प्रिय-पात्र' का 
निर्धारण या रूढ़ किया जाना 
संगत है/ उचित है?
? किंकर्तव्य_
[कोमल भाव संवाद साँचे में]

24 टिप्‍पणियां:

ajit gupta ने कहा…

हमें तो कुछ समझ नहीं आया। बात स्‍पष्‍ट लिखते तो शायद समझ पड़ती।

Dr Varsha Singh ने कहा…

प्रशंसा सुनकर लज्जा करना उचित समझोगे?— हाँ, यदि आप स्वयं की दृष्टि में भी सुन्दर हो तो अवश्य लजाओगे.....

प्रशंसा सुनकर लज्जा करना अथवा मुखर होना.....सटीक आकलन किया है आपने....

नवीन शिल्प और विचारयुक्त कविता.....

रक्षाबंधन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

मेरे विचार से मैं सुंदर हूँ...मैं सुंदर हूँ...मैं सुंदर हूँ...का भाव रहे तभी अच्छा है।
इससे जहां कहीं कुरूपता दिखेगी वहीं उसे सुंदर बनाने का प्रयास होगा फिर चाहे कुरूपता बाह्य हो या आंतरिक। बाह्य कुरूपता सहजता से दिख जाती है लेकिन आंतरिक कुरूपता नहीं दिखती। उसी तरह बाह्य सुंदरता दिख जाती है आंतरिक सुंदरता नहीं दिखती। कई बार मैं सुंदर नहीं हूँ का भाव मन को कुंठित कर देता है। जबकि वह अपने कर्मों से औरों की तुलना में अधिक सुंदर होता है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 14 - 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

वन्दना ने कहा…

दो भाव एक मे संजोये हैं।
सौंदर्य ------लज्जा ही सबसे बडा सौंदर्य है ।
विरह भाव मे प्रिय पात्र का निर्धारण हो ना हो मगर वो अदृश्य रूप मे मौजूद रहता ही है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बिना सन्दर्भ किसी कि कोई भी प्रशंसा कुछ हद तक संशय का भाव लाती है ..
बिना पात्र के विरह वर्णन कठिन है ..अदृश्य पात्र भी कहीं न कहीं मन में जीवंत होते हैं ..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"आपकी ... सौन्दर्य की" या "आपके सौन्दर्य की"?

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

हाँ निश्चित रूप से बिना किसी सन्दर्भ के प्रशंसा संशय तो जगाती ही है.......

ZEAL ने कहा…

.

प्रशंसा से संशय का भाव नहीं आएगा। हाँ इस बात का दुःख अवश्य होगा की अमुक व्यक्ति ने इस सौदर्य को पहचानने में इतना विलम्ब क्यूँ किया। लेकिन जो भी हो , प्रशंसा जब ह्रदय से निकलती है तो उसका कोई कारण भी अवश्य ही होता है, अतः सन्दर्भ जरूरी नहीं है , अपितु 'प्रशंसा' में छिपी इमानदारी ज्यादा मायने रखती है।

यदि स्वयं की दृष्टि में सौन्दर्य नहीं है तो सुन्दरता अपूर्ण है। बिना उक्त जानकारी के विनम्रता और लज्जा के भाव नहीं आ सकते ।अपितु आश्चर्य के भाव आयेंगे। अतः अपने गुणों और सुन्दरता से भिज्ञ होना ही चाहिए। 'लज्जा' के भाव आने पर ही प्रशंसा फलीभूत होती है , अन्यथा व्यर्थ जाती है।

प्रिय पात्र की उपस्थिति नकारी नहीं जा सकती । उसके बगैर कुछ अधूरा सा रहेगा।

.

boletobindas ने कहा…

कोई अचानक प्रशंसा करने लगे तो लगता है कोई मतलब होगा ....आजकल निस्वार्थ मन से प्रशंसा करने का रिवाज कम हो गया है..अगर कोई करे तो लोग मानने को तैयार नहीं कि निस्वार्थ प्रशंसा है.

पर आखिर पंक्तियां और बाकी कविता में क्या छुट गया है...कोई पुल...कोई पंक्ति....?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

हमें तो कुछ समझ नहीं आया। बात स्‍पष्‍ट लिखते तो शायद समझ पड़ती।

@ आदरणीया अजित गुप्ता जी,
शायद मैं अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की दीवारें लांघते हुए 'तात्पर्य शक्ति' से टकरा गया हूँ. स्पष्ट तो मुझे भी नहीं है कि मैंने कब प्राकृतिक सौन्दर्य के अंतर्गत मानस-स्थित व्यक्ति-सौन्दर्य को शामिल कर लिया. आगामी पोस्टों में कुछ और अस्पष्ट 'संवाद' सुनकर आपका आगमन न हुआ तो मुझे छंद के परम्परित साँचों में ही भाव ढालने का एकरसीय कार्य करना होगा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. वर्षा जी,
आजकल आपका मौसम भी है... 'कम शब्दों वाली प्रशंसा' फुहार की तरह आनंद देती है. इस बार की 'राखी' मेरी कलाई भूल नहीं पा रही है.
स्वतंत्रता दिवस को मैं वीर-पर्व के रूप में मनाने का पक्षधर हूँ. देखें इसकी शुरुआत कब होती है... चाहता हूँ कि १५ अगस्त को 'स्वराज दिवस' मनाया जाये... न कि 'स्वतंत्रता दिवस'.... जबकि ये भी जानता हूँ 'एक मेढक के टर्राने (चाहने) से वर्षा नहीं होती.'

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ देवेन्द्र जी,
मन में हीन-भाव न आने पाये ... इसलिये आपका कहना सही है कि 'मैं सुन्दर हूँ' का अजपा जप मन में होता रहना चाहिए... यह भी सच है कि 'कर्म और विचार' व्यक्ति की सुन्दरता बहुगुणित कर देते हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ वन्दना जी,
आपकी टिप्पणी पढ़ते ही मन में एक वाक्य आया ... 'अरे वाह! आपने तो दो भावों का जोड़ पहचान लिया...' दरअसल दोनों भाव अलग-अलग समय में लिखे गये.. ' मैंने समझबूझकर ये कार्य किया .. देखना चाहता था कि समुचित आलोचना मिलेगी अथवा नहीं... आपकी टिप्पणी से लगा कि मेरे लिखे को अनदेखा प्रोत्साहन या प्रशंसा नहीं मिलती... पाठक अखरने वाली बात भी निःसंकोच कहने की हिम्मत रखते हैं...... आभार.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

बिना सन्दर्भ किसी कि कोई भी प्रशंसा कुछ हद तक संशय का भाव लाती है ..

@ आदरणीया संगीता जी,

मंझावली गुरुकुल फरीदाबाद की बात है... 'साधना शिविर' लगा था... मैं प्रायः भोजन अवकाश या शाम के कुछ देर अवकाश के समय प्रकृति दर्शन किया करता था... उस दिन भी कर रहा था... खेत-खलियान, बादल, नीलगगन, बहती हवा में हिलते पेड़-पौधे, चहकते पक्षी, कुछ दुधारू पशुओं का घास चरना, सड़कों के किनारे उगी खरपतवार नामी वनस्पतियाँ... उसी बीच किसी अज्ञातयौवना का आगमन ..... मुक्तकंठ से प्रशंसा को बाध्य करने लगा...

दूसरा चित्र :

पूर्णिमा का दिन था.... आकाश तारों से भरा था... चंद्रमा अभी दिखना शुरू नहीं हुआ था... जैसे ही दिखा तो जिह्वा काव्य-स्वाद लेने लगी... प्रशंसा के स्वर जो अब तक मन में ही गुंजित थे बाहर प्रस्फुटित होने लगे....

..... दोनों चित्रों में मेरा कोई विशेष-सन्दर्भ भी नहीं प्रशंसा करने का, उसे तो मैं स्वभाविक अकस्मात् घटना मान रहा हूँ.... और यदि इस पर भी आगंतुक मन में संशय ले आये तो कवि हृदय तो हमेशा के लिये कलंकित हो गया...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

बिना पात्र के विरह वर्णन कठिन है ..अदृश्य पात्र भी कहीं न कहीं मन में जीवंत होते हैं

@ संगीता जी, सच लगता है 'आपका कथन' किन्तु मन में छिपे सत्य को बिना व्यक्त किये संवाद आगे नहीं बढ़ सकता. इसलिये कहता हूँ...

अपने विवाह से ठीक तीन वर्ष पहले मैंने भावी पत्नी की कल्पना कर डाली.. उससे संवाद किया...

"मेरे वश में नहीं है
फिर भी प्रयासरत हूँ.
आशा किञ्चित नहीं
प्रतीक्षा फिर भी है."

"आपके आने की कल्पना से
रोमांचित होना चाहता हूँ.
दुराव-छिपाव और विरक्त अभिनय ने
कर दिया है जड़ अभी."

"अभी हो आप
निराकार, अकल्पनीय
विशुद्ध, ईश्वरवत.
हो लेना चाहता है मन
इसलिये तुममे विरत."

"अये ध्यान में न आ सकने वाले अकल्पित व्यक्तित्व!
आने से पूर्व अपना आभास तो दो ...
थकान से मुंद रही है पलकें
निद्रा में ही चले आओ
अपनी आभासिक छवि के साथ."

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

prem ke sondarya roop me nahi 'bhaw'
me vicharte hain.........
a u r
prasansa sunkar 'lazza' karne' se prasansa falibhoot hota hai...sahi hai.......


pranam.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

"आपकी ... सौन्दर्य की" या "आपके सौन्दर्य की"?

@ अनुराग जी, आपके इंगित करने पर ... हुई त्रुटि पर ध्यान गया... तब मैंने काफी देर तक इस विषय पर सोचा कि यह त्रुटि क्योंकर हुई?

आरम्भ में मैंने इसे कुछ यों लिखा था ...

यदि मैं आपकी
अकस्मात् बिना सन्दर्भ
प्रशंसा करने लगूँ ...

फिर उसे अधिक स्पष्ट करने के लिये 'सौन्दर्य की' शब्द युग्म जोड़ दिया.. लेकिन उससे प्रभावित सर्वनाम पर ध्यान नहीं गया.

'गलतियों से अहंकार नहीं आने पाता'.... सो मुझसे भी हो गई... आगे भी आपसे यही अपेक्षा रहेगी.... बहुत आभारी हूँ.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. मोनिका जी,
जैसे कुछ औषधियों का सेवन कभी भी स्वास्थ्य को हानि नहीं पहुँचाता.. अपितु स्वास्थ्य को पुष्ट ही करता है. उन्हें बिना रोग के भी लिया/दिया जा सकता है वैसे ही क्या प्रशंसा बिना सन्दर्भ के नहीं की जा सकती. मैं तुलसी पत्ते और गिलोय पत्ते को बिना रोग के भी लेता रहता हूँ..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दिव्या जी,
आपने कही गई बात के मर्म में उतर कर एक बार फिर मनोभावों को निरावृत कर दिया..... 'प्रशंसा' में छिपी ईमानदारी' और 'लज्जा के भाव आने पर ही प्रशंसा फलीभूत होती है.' ......... जैसे वाक्य 'बिना सन्दर्भ प्रशंसा' को कटघरे से बाहर लाकर निर्भय कर रहे हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

प्रिय पात्र की उपस्थिति नकारी नहीं जा सकती । उसके बगैर कुछ अधूरा सा रहेगा।

@ सच है... फिर भी कभी-कभी पीड़ा का अभिनय करने के लिये कारुणिक भाव को हृदय में ले आते हैं और अश्रु बहाते हैं... 'प्रिय' का आभासी होकर रहना और उसके विलगाव से जन्मी पीड़ा को संस्कार बना लेना... सामान्य वियोगियों की परम्परा नहीं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

? किंकर्तव्य_ : जब प्रश्न खुद से हो तो मुझे प्रश्न-चिह्न 'शब्द' या 'वाक्य' से पहले लगा देना उचित लगता है.... क्या आपको यह उचित लगा?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

prasansa sunkar 'lazza' karne' se prasansa falibhoot hoti hai.

@ सञ्जय जी, सुप्रभात.
आपने भी सहमती जतायी... मुझे भी यह बात अच्छी लगी.

मदन शर्मा ने कहा…

सटीक बात कही है आपने . सार्थक पोस्ट हेतु हार्दिक शुभकामनायें