बुधवार, 6 अप्रैल 2011

छंदों का वर्गीकरण ........... पाठ 2

छंद — 
१] वैदिक छंद 
२] लौकिक छंद — मात्रिक छंद , वार्णिक छंद 
मात्रिक छंद — 
१] सम मात्रिक छंद
२] अर्ध मात्रिक छंद 
३] विषम मात्रिक छंद 
वार्णिक छंद — 
१] सम वार्णिक छंद 
२] अर्ध वार्णिक छंद 
३] विषम वार्णिक छंद 

अन्य छंद भेद : 
मात्रिक एवं वार्णिक छंदों के दो-दो अन्य भेद हैं — 
१] साधारण मात्रिक छंद – ३२ मात्राओं तक सीमित 
२] दंडक मात्रिक छंद – ३२ से अधिक होने पर दंडक मात्रिक छंद कहलाते हैं. 
३] साधारण वार्णिक छंद – २६ वर्णों तक सीमित
४] दंडक वार्णिक छंद – २६ से अधिक होने पर दंडक वार्णिक छंद होता है. 

मात्रिक और वार्णिक छंदों का विस्तार आगे के पाठों में किया जाएगा. फिलहाल मैं पाठ की जटिलता को देखते हुए सरलतम और रोचक जानकारी पहले दिये दे रहा हूँ. जिससे पाठ में कुछ तो रोचकता आये. अभी छंद-विषयक कुछ महत्वपूर्ण जानकारी देना जरूरी समझा है इसलिये नवल विद्यार्थी अपना धैर्य नहीं गँवायें तो आगामी पाठों को सहजता से समझ पायेंगे. 

शुभाशुभ गण, दग्धाक्षर एवं उनका परिहार :
शुभ गण — मगण, नगण, भगण, यगण
अशुभ गण — जगण, रगण, सगण, तगण
शुभाशुभ विचार का तात्पर्य यह है कि शुभ गणों से ही किसी पद्य का आरम्भ करना चाहिए. छंदारम्भ में अशुभ गण का प्रयोग दोष माना गया है. 
['दग्धाक्षर एवं उनका परिहार' पर आगे चर्चा की जायेगी]

प्रश्न : एक कविता दी जा रही है, जिसमें शास्त्र की दृष्टि से दोष बताइये :

बुद्धि से लो काम 
हृदय को हावी मत होने दो. 
दबा हुआ जो भाव 
हृदय में, ज़ाहिर मत होने दो. 

वही प्रीति का बीज 
बाद में फलदायी तरु होगा. 
जिसको सबकी आँख 
बचाकर, रोंपा सींचा होगा. 




प्रश्नों का स्वागत है. जितने जिज्ञासु प्रश्न होंगे उतना सुन्दर पाठ होगा.

28 टिप्‍पणियां:

ZEAL ने कहा…

.

प्रश्न : एक कविता दी जा रही है, जिसमें शास्त्र की दृष्टि से दोष बताइये :

उत्तर: कोई दोष नहीं है । इन नेत्रों को दोष देखने कि आदत ही नहीं ।

[Beauty lies in the eyes of beholder]

Jokes apart , गुरूजी , क्षमा-दृष्टि रखियेगा । कक्षा में सदैव नीचे से ही प्रथम ही आती हूँ । संजय जी से ईर्ष्या है , इनका गृह-कार्य तो सुज्ञ जी कर देते हैं पर मेरी कोई मदद नहीं करता ।

.

ZEAL ने कहा…

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अब एक सामान्य ब्लॉगर कि टिप्पणी -

स्नेह से रोपा-सींचा हुआ बीज , सदा पल्लवित होता है हर तत्व से ऊपर उठकर।

.

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

balak prashnawali samajh to pa raha hai lekin uttar dene me kinchit aksham hai......5 baar uthak baithak
laga liye hain.....

@ zeal di...irshya ki kya baat hai...ek baar monitar bhai hal kar jayen....ap mere copy se nakal kar lena...

pranam.

दीपक बाबा ने कहा…

दोष तो कुछ नज़र नहीं आया....

वही प्रीति का बीज
बाद में फलदायी तरु होगा.
जिसको सबकी आँख
बचाकर, रोंपा सींचा होगा.

कर कविता अच्छी लगी.

सुज्ञ ने कहा…

दिव्या जी,
संजय जी,

अपुन का थोडा धाक पड़रेला है क्लास में
गुरुजी भी अपुन को स्कॉलर स्टू्डेण्ट समझरेला है।

अभी अपुन कोई घाई करने को नहीं मांगता। नहीं तो अपुन का सारा पोल खुल जाएंगा, क्या??

-- मुन्नाभाई महाकवि

सुज्ञ ने कहा…

पीट्सबर्ग का न्यूज-पेपर
The Best Hindi Blogs में अपून का स्कूल फेमस हो गया है। सभी को सीरियस होके पढने का।

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

एक उदहारण दिए होते तो विद्यार्थी को आसानी होती दोष देखने में

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

एक सूचना :

दिये हुए दोषी काव्य में गण संबंधी दोष है. पता करें किस तरह से...

श्री गिरधारी जी का धन्यवाद जो उन्होंने प्रश्न को सरल करवा दिया.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

काव्य आरम्भ हुआ है :

SI S S SI ........ ?

ajit gupta ने कहा…

प्रतुल जी, यहाँ सभी प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी हैं अत: एक एक गण को अच्‍छी प्रकार से समझाएंगे तभी आपके प्रश्‍नों का उत्तर दे पाएंगे। मेरे ध्‍यान में यह आया है कि छंद का प्रारम्‍भ "रगण" गण से हुआ है और इसे आपने अशुभ बताया है।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

कुछ देर से मुझे एक अजीब-सी अनुभूति हो रही है मैंने अपनी पाठशाला को 'सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग सूची' में शामिल देखा.
पहले पहल तो मैं समझ नहीं पाया कि सुज्ञ जी 'क्या कह रहे हैं?' गूगल में 'पिट्सबर्ग न्यूजलेटर' डाल-डालकर देखा कुछ नहीं मिला. अपने बुद्धूपने पर हँसता रहा.

मुझे लगता है कि किसी सामर्थ्यवान स्नेहीजन ने यह प्रचार कार्य किया है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

गुरूजी, क्षमा-दृष्टि रखियेगा । कक्षा में सदैव नीचे से ही प्रथम ही आती हूँ । संजय जी से ईर्ष्या है , इनका गृह-कार्य तो सुज्ञ जी कर देते हैं पर मेरी कोई मदद नहीं करता ।
@ दिव्या जी, कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं कि जहाँ नक़ल बुरी नहीं समझी जाती. सीखने के लिये हमेशा हम अपने बड़ों की नक़ल करते हैं. हम जिनसे प्रभावित होते हैं उनका अनुकरण करते हैं. बच्चा नक़ल कर-करके पूरी भाषा सीख जाता है. इसलिये कहते हैं कि बालक भाषा अनुकरण से सीखता है. यही सूत्र प्राथमिक पाठशाला में लागू है सञ्जय जी कभी न कभी अपने विचारों को भी सुज्ञ जी के उधार लिये सांचों में ढालने लगेंगे. आपकी मदद को पाठशाला में सभी है. एक सच्ची बात यह भी है कि जो बहुमुखी प्रतिभा का धनी होता है वह किसी अन्य की सहायता नहीं लेता, अपनी सहायता स्वयं करता है. आपका स्थान ऊपर और नीचे दोनों तरफ से प्रथम ही है. कोई भी सूची बने आपको विस्मृत नहीं किया जा सकता. हुनर दिखाने में, सवाल उठाने में, प्रेम बरसाने में, आवेश या विरोध झलकाने में.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सञ्जय जी, अब आप खुद-बा-खुद उट्ठक-बैठक लगा लेते हैं, तो लगता है कि आपके शरीर का छंद ठीक काम कर रहा है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दीपक बाबा जी, दोष ढूँढ़ना वैसे भी ठीक नहीं होता. गुणगान करते रहना चाहिए.

वैसे भी दीपक कभी अपने तले अँधेरे को देख नहीं पाता. उसका कार्य होता बिना भेदभाव के प्रकाश देना.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीया अजित गुप्ता जी,
छंद में दोष को आपने सही पहचाना,
आपके सुझाव पर प्रारम्भ में ही विचार किया था.
सोचा था कि विधिवत चलूँ लेकिन जानता हूँ कि विषय नीरस बनते देर नहीं लगेगी इसलिये बेतरतीब चल रहा हूँ. प्रश्न होंगे उत्तर दूँगा.
मेरा मानना है कि बातचीत शैली से, चर्चा करते हुए शिक्षा की नींव मज़बूत पढेगी. उदाहरणों से बात स्पष्ट करने का प्रयास रहेगा.
यदि गुरुजनों की निगरानी बनी रहेगी तो यह जटिल कार्य सहजता से होता चलेगा. अन्यथा मैं भी हताश होकर बैठ जाऊँगा.

सुज्ञ ने कहा…

प्रतुल जी,

क्षमा कर दिजियेगा 'The best hindi blogs'का लिंक मैं सही न दे पाया। मैने भी अभी चेक किया वह लिंक तो आपके ही टिप्पणी फार्म का चस्पा हो गया। 'पीट्सबर्ग का न्यूज-पेपर' से आशय था पीट्सबर्ग वाले स्मार्ट इन्डियन श्री अनुराग शर्मा संचालित ब्लॉग एग्रीगेटर "श्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग सूचि"
और उसमें प्रकाशित किया गया इस पाठशाला पर आलेख।

मैं अनुराग शर्मा जी का आभार मानता हूँ।

आप यहाँ देख सकते है…
http://hindi-blog-list.blogspot.com/2011/04/blog-of-day-hindi-india-pratul.html

सुज्ञ ने कहा…

गुरूजी,

अजित गुप्ता जी की बात सही है। सभी प्राथमिक विद्यार्थी ही है।
जैसे रगण में र का क्या तात्पर्य है नहीं जानते और वह किस तर्ह शुभ अथवा अशुभ है?

अतः गण को ही सरलता व विस्तार से बताएँ।

ajit gupta ने कहा…

प्रतुल जी, कुछ समय पूर्व आचार्य संजीव सलिल जी ने हिन्‍दयुग्‍म पर दोहे की कक्षाएं प्रारम्‍भ की थी। वहाँ पर भी बहुत‍ कुछ सीखने को मिला था। मैंने उनसे छंदों के बारे में भी कहा था कि आप इसे जारी रखें। लेकिन कार्य की अधिकता से वे जारी नहीं रख पाए। अब आपने बहुत अच्‍छा कार्य हाथ में लिया है। मेरा यही निवेदन है कि एक बार उनकी कक्षाओं को देख लें, उन्‍होंने बड़े ही सरल तरीके से और क्रमबद्ध पाठ दिए थे। सभी के गले उतर गए थे। यदि आपने इसे दुरूह किया तो विद्यार्थी भाग जाएंगे। उनकी कक्षा से भी गायब हुए थे और सलिल जी भी निराश हो गए थे। तब मैने उनसे कहा था कि आप डटे रहें, हम आपकी कक्षा में जरूर आएंगे। अब यहाँ भी मैं कह रही हूँ कि मैं आपकी कक्षा में जरूर आऊँगी। लेकिन गुरुजी थोड़ा सरलीकरण चाहिए। आशा है आपने अन्‍यथा नहीं लिया होगा।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वाह वाह ..... मुन्नाभाई महाकवि....):

हम तो गुरु जी टिप्पणियों से ही अभिभूत हो गए ..

आपको ' बेस्ट हिंदी ब्लॉग' की बधाई .....

हाँ गुरु जी हम कक्षा में आयेंगे जरुर ...
भले ही न पढ़ें पर ताँक - झाँक का भी तो अपना ही मजा है ...
एग्जाम के वक़्त देखा जाएगा ....

आपकी कक्षा से एक और बालक नदारद है अभी ....):

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वो ....क्या है गुरु जी ...
हमने लौटते वक़्त आपका चेहरा अच्छी तरह से देखा .....
तो हमें अपने शिक्षक दामोदर जी याद आ गए ...
बड़ी-बड़ी लाल आँखें ...और मूछें बिलकुल आपकी तरह ....
एक ही बार चिल्लाते थे ...''लड़की ...''
और हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम ....
आँख से जितने आंसू गिरते थे मार बढ़ती जाती थी ..
इसलिए उनकी कक्षा में रोना मना था .....
आप तो वैसे नहीं हैं न .....?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सुज्ञ जी, आज पता चला कि यह अनुराग जी का अनुराग है जो मुझे प्रोत्साहित कर रहा है. मैं उनका ऋणी हुआ. आप जैसे वरिष्ठ विचारकों की सहृदयता ही है जो इस नाट्य को चालित किये हूँ.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

जैसे रगण में र का क्या तात्पर्य है नहीं जानते और वह किस तरह शुभ अथवा अशुभ है?
अतः गण को ही सरलता व विस्तार से बताएँ।

@ विद्यार्थियों, छंद में मात्रिक विधान का एक सूत्र है : य मा ता रा ज भा न स ल गा.

य गण = यमाता = ISS = आरम्भ लघु =शुभ
म गण = मातारा = SSS = सर्व गुरु = शुभ
त गण = ताराज = SSI = अंत लघु = अशुभ
र गण = राजभा = SIS = मध्य लघु = अशुभ
ज गण = जभान = ISI = मध्य गुरु = अशुभ
भ गण = भानस = SII = आरम्भ गुरु = शुभ
न गण = नसल = III = सर्व लघु = शुभ
स गण = सलगा = IIS = अंत गुरु = अशुभ
ल = लघु = I
गा = गुरु = S



कैसे पहचाना जाये सरलता से शुभ गणों को?

@ म न भ य = मतलब जो गण मन भाये वही शुभ हैं. यह केवल शास्त्रीय दृष्टिकोण है.

किन्तु आगे के छंदों में आप इन अशुभ गणों से आरम्भ होने वाले छंद भी देखेंगे.

यथा : सगण से आरम्भ और अंत होने वाला एक छंद 'सवैये' का एक प्रकार 'दुर्मिल सवैया' है. जिसमें आठ स गण होते हैं. फिर भी वह गीति की दृष्टि से अति उत्तम है.

ध्यान दें : सवैया क्योंकि वार्णिक छंद है इसलिये इसमें शुभ और अशुभ का विधान लागू नहीं होता. मात्रिक छंदों में शुभ और अशुभ गणों की मान्यता है. जिसका विस्तार बाद में किया जाएगा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीया अजित जी, आज सुबह ही मैंने संजीव सलिल का ब्लॉग तलाशा है. अब समय मिलते ही उसे पढूँगा भी. अभी उनके पाठ नहीं देख पाया हूँ. उनकी अन्य व्यस्तता ही रही होगी जिस कारण उनकी नियमितता नहीं रही अन्यथा छंद जैसा विषय एक नशा है जिसकी लत लग जाये तो छूटती ही नहीं. कोशिश कर रहा हूँ कि सरल से सरल कर सकूँ छंद को. आपकी किसी बात का बुरा मानने का प्रश्न ही नहीं उठता. आपकी दोहे वाली पोस्ट से प्रेरणा मिली थी. प्रेरकों के प्रति मन में गुप्त प्रेम को स्थान दिया है जिसे पल्लवित उसी पथ पर बढ़ते हुए करूँगा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीया हरकीरत जी, नदारद बालक प्राइवेट ट्यूशन ले रहा है. भारतीय कालगणना विषय में शोध करने के लिये अवकाश लिये है.

कई व्यक्ति सांचों में विचारों को ढालने के अभ्यास से पकते हैं. तो कुछ विरले हैं जो सांचों को तोड़कर भावों की प्राकृत रचनाओं को गढ़ने में विश्वास करते हैं.

वैसी वैचारिक पक्वता सृजने की प्रतिभा सबमें नहीं होती. मैं जानता हूँ कि आप निगरानी हमेशा रखते हैं लेकिन बहु उपयोगी पोस्टों पर ही आशीर्वाद चिह्नित करते हैं.

आप तो वैसे नहीं हैं न .....?

@ यहाँ अध्यापन का गुरूर नहीं मिलेगा. क्योंकि मैं डिग्रीधारी नहीं. रुचि से स्वाध्याय किया है.

Sunil Kumar ने कहा…

आपने बहुत अच्‍छा कार्य हाथ में लिया है| आभार...

ajit gupta ने कहा…

प्रतुल जी, कल दिल्‍ली थी तो आपकी टिप्‍पणी अभी देखी है। सलिल जी की दोहा-कक्षा हिन्‍दयुग्‍म डॉम काम पर है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कक्षा में आने में देर हुई ...हानि के बजाये लाभ मिला ...म न भ य यह काफी सरल हो गया है याद रखने में ...

रोचक प्रस्तुति करण .

असल में आपका ब्लॉग मुझे मिल नहीं रहा था .. आज आपकी शाब्दिक स्नेह वर्षा में भीग यहाँ पहुंची हूँ ....आभार

कुमार राधारमण ने कहा…

अच्छा है। दो-एक कवियों को लिंक अग्रेषित कर रहा हूं।