शुक्रवार, 25 मार्च 2011

हे देवि ! छंद के नियम बनाए क्यूँकर?

शीघ्र ही 'पाठशाला' फिर से शुरू होने वाली है. विषय होगा 'छंद चर्चा'. 

छंद के महात्म्य को पुनः स्थापित करने की मन में जो भावना प्रकट हुई,  वह अकारण नहीं हुई.
— पहला कारण, काव्य के आधुनिक रूप के प्रति मेरा प्रसुप्त आक्रोश.
— दूसरा कारण, मैं उन तम्बुओं को उखाड़ने का सदा से हिमायती रहा हूँ, साहित्य जगत में जिनके बम्बू केवल इसलिये गड़े कि वे कुछ अधिक गहरे दिखायी दें. 'टोली प्रयास' रूप में अपनी अलग पहचान कोशिशें और कविता को तरह-तरह के वादों में बाँटकर ये बम्बू उसे आज एक ऎसी दुर्दशा तक ले आये हैं जहाँ वह फूहड़ मनोरंजन के रूप में ही अधिक पहचानी जाती है. 
जब किसी क्षेत्र का कोई नियम टूटता है और उसकी सराहना करने वालों की तादात अधिक होती है .. तब उस क्षेत्र में अराजकता शीघ्र फ़ैल जाती है.

कविता के क्षेत्र में भी छंद-बंधन टूटते जा रहे हैं. यह टूटन कहाँ तक उचित है इस विषय पर आगे विचार जरूर करेंगे. आज ब्लॉगजगत में डॉ. रूपचंद शास्त्री 'मयंक' एवं श्री राजेन्द्र जी 'स्वर्णकार' छंद-नियमों को मानकर न केवल रचना कर रहे हैं अपितु छंद को प्रोत्साहन भी दे रहे हैं. पिछले दिनों दोहों के वर्गीकरण पर श्रीमती अजित गुप्ता जी की एक सुन्दर पोस्ट देखने में आयी थी. छंद-ज्ञान प्रचार में उनका योगदान भी मुझे हर्षित कर गया. 

बहरहाल, छंद-चर्चा पर पाठशाला पुनः खोलने का अमित अनुरोध आया तो मैं अपने मन की इच्छा को छिपाकर न रख सका. बस कभी-कभी यह आभास होता है कि मेरा सीमित प्रयास निरर्थक सा है इस कारण ही बीच-बीच में उदासीन हो जाता हूँ. वैसे कुछ अन्य कारण भी बन आते हैं उदासीन होने के, लेकिन सुज्ञ जी जैसे विचारक मुझे संभाल लेते हैं. संजय झा हमेशा अपनी उपस्थिति से यह एहसास कराते हैं कि क्लास पूरी तरह से खाली नहीं है.

एक बार फिर से कहना चाहता हूँ कि मैं 'विषय का पंडित' नहीं हूँ लेकिन फिर भी मुझे 'निरंतर पूछे जाने वाले प्रश्न' कुछ नया सोचने को उत्साहित करते हैं. कृपया इतनी कृपा अवश्य बनाए रखियेगा कि 'प्रश्न' सक्रीय रहें, मृत न होने पायें. 

पाठशाला शुरू करने से पहले मैं अपने आक्रोश को प्रकट कर अभी फिलहाल खाली हो जाना चाहता हूँ :  

हे देवि ! छंद के नियम बनाए क्यूँकर ?
वेदों की  छंदों में ही रचना क्यूँकर ?
किसलिये प्रतीकों में ही सब कुछ बोला ? 
किसलिये  श्लोक रचकर रहस्य ना खोला ? 

क्या मुक्त छंद में कहना कुछ वर्जित था ? 
सीधी-सपाट बातें करना वर्जित था ? 
या बुद्धि नहीं तुमने ऋषियों को दी थी ? 
अथवा लिखने की उनको ही जल्दी थी ? 

'कवि' हुये वाल्मिक देख क्रौंच-मैथुन को . 
आहत पक्षि कर गया था भावुक उनको . 
पहला-पहला तब श्लोक छंद में फूटा .
रामायण को लिख गया था जिसने लूटा .

माँ सरस्वती की कृपा मिली क्यूँ वाकू ? 
जो रहा था लगभग आधे जीवन डाकू ? 
या रामायण के लिये भी डाका डाला ? 
अथवा तुमने ही उसको कवि कर डाला ? 

हे सरस्वती, बोलो अब तो कुछ बोलो ! 
क्या अब भी ऐसा हो सकता है ? बोलो . 

अब तो कविता में भी हैं कई विधायें . 
अच्छी जो लागे राह उसी से आयें . 
अब नहीं छंद का बंध ना कोई अड़चन . 
कविता वो भी, जो है भावों की खुरचन . 

कविता का सरलीकरण नहीं है क्या ये ? 
प्रतिभा का उलटा क्षरण नहीं है क्या ये ? 

छाया रहस्य प्रगति प्रयोग और हाला. 
वादों ने कविता को वैश्या कर डाला. 
मिल गई छूट सबको बलात करने की . 
कवि को कविता से खुरापात करने की . 

यदि होता कविता का शरीर नारी-सम . 
हर कवि स्वयं को कहता उसका प्रियतम . 

'छायावादी' ... छाया में उसको लाता . 
धीरे-धीरे ... उसकी काया .. सहलाता. 
उसको आलिंगन में .. अपने लाने को . 
शब्दों का मोहक सुन्दर जाल बिछाता . 

लेकिन 'रहस्यवादी' करता सब मन का .
कविता से करता प्रश्न उसी के तन का .
अनजान बना उसके करीब कुछ जाता. 
तब पीन उरोजों का रहस्य खुलवाता . 

पर, 'प्रगतीss वादी', भोग लगा ठुकराता . 
कविता के बदले 'नयीS .. कवीता'* लाता. 
साहित्य जगत में निष्कलंक होने को . 
बेचारी कविता को ... वन्ध्या ठहराता . 

और 'प्रयोगवादी' ...  करता छेड़खानी .
कविता की कमर पकड़कर कहता 'जानीS'
करना 'इंग्लिश' अब डांस आपको होगा . 
वरना ......... मेरे कोठे पर आना होगा . 

अब तो कविता-परिभाषा बड़ी विकट है . 
खुल्लमखुल्ला कविता के साथ कपट है .
कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है .
कविता वादों का ... नहीं कोई सम्पुट है . 

ना ही कविता मद्यप का कोई नशा है .
कविता तो रसना-हृत की मध्य दशा है .
जिसकी निःसृति कवि को वैसे ही होती . 
जैसे गर्भस्थ शिशु प्रसव ... पर होती . 

जिसकी पीड़ा जच्चा को लगे सुखद है .
कविता भी ऎसी दशा बिना सरहद है .

23 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

प्रणाम गुरूजी,

आनंद हुआ, अवकाश के बाद पाठशाला पुनः प्रारंभ है।

अब तो कविता में भी हैं कई विधायें .
अच्छी जो लागे राह उसी से आयें .
अब नहीं छंद का बंध ना कोई अड़चन .
कविता वो भी, जो है भावों की खुरचन .

अब तो कविता-परिभाषा बड़ी विकट है .
खुल्लमखुल्ला कविता के साथ कपट है .
कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है .
कविता वादों का ... नहीं कोई सम्पुट है .

यही स्वछंदता देख यह मानने को जी ललचाता है कि कवित्व जन्मजात होता है। स्वाध्याय से उसे निखारा जा सकता है किन्तु किसी में जबरन उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

अमित शर्मा ने कहा…

आदरणीय गुरूजी प्रणाम !
आपने पाठशाला पुनः लगाना स्वीकार किया है, यह जानकर मन हुमक उठा है.
काफी दिनों से छंद शास्त्र के अध्यन की चाहना हो रही थी, सुखद आश्चर्य हुआ है की आपने पाठशाला 'छंद चर्चा' से ही प्रारम्भ करने का निश्चय किया है.
"यत पिंडे तत ब्रह्मांडे" के अनुसार जो जो तत्त्व इस विराट स्रष्टी में है वही तत्व हमारे खुद के अन्दर भी है, बस विराट पुरुष सर्व समर्थ है, और हम ससीम इसलिए हर जीव में सब तरह की क्वालिटी नहीं दिखाई देती, पर होती सब में है. इसी तरह जैसा की सुग्यजी ने कहा की "कवित्व जन्मजात होता है" ------- कवित्व ही नहीं सारे तत्त्व जन्मजात होतें है. बस यह तो हमारे विवेक और देश-काल परिस्थिति पर है की किस गुण का विकास ज्यादा और नियम बद्ध होता है.
अपने भावों को शब्द देते समय तुकांत गति दे देने मात्र से रचना सुरुचिपूर्ण तो हो जाती है, पर सम्पूर्ण छंद-योजना के अनुसार ना होने से उतनी सरसता उस रचना में नहीं आ पाती है. और "छंद" तो स्वयं "वेदांग" है, अगर छंद रचना में ही छंद के सारे अंगो का यथायोग्य विधान ना किया जाए तो ऐसा छंद तो हीनांग ही रह जाएगा.
इस परिपेक्ष्य में आपका हम जैसे अज्ञ-विद्यार्थियों के हितार्थ छंद-शास्त्र की जानकारी देने हेतु आपका सन्नद्ध होना आलाह्द्कारी है.
आशा है की आप अपने उद्देश्य को परिणिति तक पहुंचाते हुए, अपने ज्ञानालोक से हमारे अज्ञ-तिमिर का भंजन करेंगे.

आभार सहित
अमित शर्मा

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

ye pathshala chalti rahe....hamari kamna hai.....

sikhne ki koi umra thore hi hoti hai.......

balak ko yaad rakhte hain...abhari hain....


pranam.

मदन शर्मा ने कहा…

ना ही कविता मद्यप का कोई नशा है .
कविता तो रसना-हृत की मध्य दशा है .
जिसकी निःसृति कवि को वैसे ही होती .
जैसे गर्भस्थ शिशु प्रसव ... पर होती .
मैंने आने में जरा देर कर दी इसके लिए माफ़ी चाहूँगा.
हमने आपकी पोस्ट शब्दशः पढ़ी
बहुत सुन्दर !
रंगपंचमी की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ..

सतीश सक्सेना ने कहा…

सस्नेह शुभकामनायें !!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

विद्वान बंधुवर प्रिय प्रतुल जी
सस्नेह अभिवादन !

कविता के जन्म लेने के साथ उसके सबके सामने प्रकट होने की प्रक्रिया पर बहुत पहले एक कविता लिखी थी … आज आपका आलेख पढ़ा तो स्मरण हो आई …
देखिए -

* कविता *

व्यर्थ प्रयासों में न उलझिए,
मन को मन की कहने दें !
धकियाए कब नदी बही है ?
स्वतः शाश्वत बहने दें !

स्वयं से छल, कविता से छल,
इक क्षेत्र तो बाकी रहने दें !
सुकविता को सम्पूर्ण प्रक्रिया;
प्रसव-वेदना सहने दें !

जीवन दौड़ा नहीं जा रहा,
सांसें संयत रहने दें !
अभी नहाई है कविता,
कपड़े भी उसे पहनने दें !

स्वयं आपकी शोभा; उसको
अधिकाधिक संवरने दें !
रोम-रोम खिल जाने दें, और
अंग-प्रत्यंग महकने दें !

हो जाए तैयार; तो दर्पण से
उसका जी भरने दें !
स्वयं हो वह आश्वस्त; उसे
फिर चाहे जहां विचरने दें !

- राजेन्द्र स्वर्णकार


इस विषय पर मुझे बहुत बात करनी है … अभी बहुत कुछ लिखा भी था … लेकिन मेरी ही ग़लती से मिट जाने से मूड चौपट हो गया … मेरी आंखों में भी अभी इंफेक्शन है … इसलिए ज़्यादा लिखने में वैसे भी तक़्लीफ़ हो रही है ।
एक अच्छे विषय के साथ अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई !

रंगपंचमी की शुभकामनाएं ! मंगलकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

सुज्ञ ने कहा…

राजेन्द्र जी नें कविता के माध्यम से सहज प्रवाहमय कविता के लिए सटीक निवेदन है।

क्या इसे इन सन्दर्भों से देखें………?

व्यर्थ प्रयासों में न उलझिए,
मन को मन की कहने दें !
धकियाए कब नदी बही है ?
स्वतः शाश्वत बहने दें ! (सहज भाव आलेखन)

स्वयं से छल, कविता से छल,
इक क्षेत्र तो बाकी रहने दें !
सुकविता को सम्पूर्ण प्रक्रिया;
प्रसव-वेदना सहने दें ! (छंदबद्धता)

जीवन दौड़ा नहीं जा रहा,
सांसें संयत रहने दें !
अभी नहाई है कविता,
कपड़े भी उसे पहनने दें !(शब्द श्रंगार)

स्वयं आपकी शोभा; उसको
अधिकाधिक संवरने दें !
रोम-रोम खिल जाने दें, और
अंग-प्रत्यंग महकने दें !(भाव और शब्दों का संयोजन)

हो जाए तैयार; तो दर्पण से
उसका जी भरने दें !
स्वयं हो वह आश्वस्त; उसे
फिर चाहे जहां विचरने दें !(सर्वांग निरिक्षण)

राजेन्द्र जी, सुन्दर सटीक भाव निरूपण हुआ है

ZEAL ने कहा…

जिसके पास संजय जी , अमित जी , सुज्ञ जी ,जैसे मित्र हों , उन्हें उदासीन होने की क्या आवश्यकता है भला । पाठशाला जारी रखिये।

ZEAL ने कहा…

.

आपका आक्रोश जायज है। लेकिन देवी सरस्वती तो माँ है आखिर । अपनी हर संतान से स्नेह रखती है। कुछ होनहार हैं , तो कुछ थोड़े कमतर , लेकिन ज्ञान पाने की लालसा तो सभी रखते हैं , इसलिए अपनी-अपनी स्लेट (ब्लॉग) पर कुछ न कुछ लिखकर , अभ्यास किया करते हैं।

विद्वान् , ज्ञानीजनों का कर्तव्य है की क्षमादृष्टि रखते हुए , आक्रोश को त्यागकर , विद्यार्थियों का कल्याण करें ।

.

ZEAL ने कहा…

सुज्ञ जी ने छंदों के बेहतरीन सन्दर्भ दिए हैं ।

ZEAL ने कहा…

.

@-धकियाए कब नदी बही है ?
स्वतः शाश्वत बहने दें !

@-सुकविता को सम्पूर्ण प्रक्रिया;
प्रसव-वेदना सहने दें

इन पंक्तियों में काव्य की सुन्दरता मुग्ध कर रही है।

.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

प्रसन्नता की बात है कि सभी विद्यार्थी अपनी-अपनी सीटों पर आकर बैठ गये, श्यामपट पर लिखने के बाद ही मुझे अत्यंत आवश्यक कार्य ने उलझा लिया. मैंने लम्बे अवकाश के बाद भी लंबा अल्प विराम ले लिया, क्षमा करें.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

सुज्ञ जी,
स्वच्छंदता का छंद शात्रोक्त नियमों का पालन नहीं करता. मन तो उसमें शीघ्र रम जाता है लेकिन फिर भी काव्य-शिक्षा के प्राथमिक विद्यार्थियों को अनुशासित करने के लिये छंद का शास्त्रीय ज्ञान आवश्यक होता है.

जिस प्रकार किसी डांसर या सिंगर के लिये शास्त्रीय नृत्य या संगीत की शिक्षा उसकी जड़ें मज़बूत कर देती है. उसी प्रकार काव्य सृजन से पहले यदि नवोदित रचनाकार बन्धनों को मानकर चलते हैं तो उनकी सृजनशीलता में निखार ही आता है. हाँ स्वाध्याय से अवश्य सृजन को फायदा पहुँचता है - इसमें कोई दो राय नहीं.

एक बात बताना चाहता हूँ वह यह कि किसी सामान्य व्यक्ति को भी कुछ सीमा तक कवि बनाया जा सकता है लेकिन उसके लिये एक अष्ट-नियमों [अष्ट-अर्हतायें] का विधान करना होगा.

मैंने इस नियम से कुछ साथियों में कभी सृजनशीलता के गुणसूत्र प्रतिष्ठापित किये थे और वे रचना करने भी लगे थे.

समय आने पर उनका उदाहरण समेत वर्णन करूँगा.

सुज्ञ जी, अष्ट-नियमावली [कविता-दशा प्राप्त होने की शर्तें] और बलात कवि उदाहरणों के बारे में मुझे आगे याद अवश्य दिला दीजिएगा.

.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

@ प्रिय अमित जी, नमस्ते.
आप सभी का प्रेम मुझे इस गुरु-शिष्य वाले नाट्य को खेलने को बार-बार विवश कर देता है.
खैर, मुझे भी यह नाटक रुचता है, मानस में दबी शिक्षण की भूख को आप फलाहार करा ही देते हैं.

छंद-चर्चा लम्बी चलने का आसार है क्योंकि यह वृहत विषय है. आपने 'यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे' की बात से ही छंद चर्चा का सार कह दिया.

"..... कवित्व ही नहीं सारे तत्त्व जन्मजात होतें है. बस यह तो हमारे विवेक और देश-काल परिस्थिति पर है की किस गुण का विकास ज्यादा और नियम बद्ध होता है."
– आपके इस चिंतन को बाद में विस्तार देने का सोचा है......

जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नियम में बँधा हुआ गतिमान है. जब यह नियम कहीं भंग होता हुआ प्रतीत होता है तब प्रलय होती है/ सृष्टि का नाश होता है.

और जहाँ भी उसका छंद बदलता है मानो युग बदल जाता है. उसका गति लय प्रवाह बदलते ही कल्प, मन्वंतर भी बदल जाते हैं.

यही नियम तो पिंड [मनुष्य] में भी लागू दिखायी देता है. जब तक मनुष्य आचार-सहिंताओं का पालन करता है उसके जीवन का छंद बिगड़ने नहीं पाता. वह स्वस्थ और ऊर्जा से प्लावित रहता है.

जैसे ही वह रोगग्रस्त होता है ऊर्जा की क्षति करता है उसका छंद बदल जाता है मतलब कि वह स्वच्छंद हो जाता है या फिर बदले हुए छंद की रचना करता है.

इसे इस तरह से भी समझ सकते है कि

माना कि कोई ओजगुण की देशभक्ति की कविता रचता है. कुछ समय बाद वह मनोरंजन के नाम पर फूहड़ हास प्रधान वासना भड़काऊ शृंगारिक रचनाओं को पसंद करने लगता है

तब उसका न केवल शारीरिक छंद [स्वास्थ्य] बदल जाएगा अपितु उसकी रचना-धर्मिता का छंद [काव्य-दशा] भी बदल जाएगा.


अमित जी, जितना जानता हूँ उतना अवश्य बताऊँगा और प्रयास रहेगा कि रोचकता बनी रहे.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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सञ्जय जी, आपकी उपस्थिति से मनोबल ऊँची कुर्सी पर जा बैठता है. आपको देख-देखकर ही कई बार तो नयन अश्रुओं से खेलने लगते हैं.

.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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मदन शर्मा जी,

कविता संबंधी जो धारणा फिलहाल बनी हुई है वह इस पाठशाला में छंद-चर्चा करने से बदल भी सकती है - इस संभावना को छूट दी हुई है.

आपने देर से आने की बात पर माफी चाही, मैं स्वयं समय का पाबन्द नहीं, प्रतिउत्तर देने में विलम्ब कर देता हूँ. इस पाठशाला में क्षमा जैसे शब्द केवल प्रश्न के उत्तर न दे पाने पर मैं ही प्रयोग करूँगा. इसलिये इन शब्दों को प्रयोग करने की सभी को मनाही है.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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सतीश sir,
आपका सस्नेह आशीर्वाद व्यक्तिगत रूप से भी मिलता रहता है. ..... लगता है शिक्षा-अधिकारी इंस्पेक्शन पर हैं...

यह सोचकर अच्छा लगता है कि 'लगातार नज़र में हैं हमारी पाठशाला'.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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@ आदरणीय राजेन्द्र जी, नमस्ते.

"धकियाए कब नदी बही है ?
स्वतः शाश्वत बहने दें !" ........ सुन्दर.

बहने ही तो देते हैं,
रोका किसने कब बाँध बना.
फूहड़ मनोरंजन तब से ही,
मन की मौजों को फाँद तना.

स्वच्छंद नदी से ही निकली नालियाँ तबाही लाती हैं.
अनुशासित होकर ही नदिया कवि-कृषकों को हर्षाती है.

स्वयं हो वह आश्वस्त; उसे
फिर चाहे जहां विचरने दें !

@ कविता को हर क्षेत्र में आने-जाने की छूट है. इस बात को मानता हूँ. लेकिन काव्य-अभ्यासी को छंद का ज्ञान कर ही स्वच्छंद गुण को अपनाना चाहिए.

नियम और बंधनों को मानने वाला यदि उनका उल्लंघन करता भी है तो वह इतनी समझ विकसित कर चुका होता है कि छूट ली जाने वाली चीज़ों को पहचानता है.

वह अतुकांत रचता भी है तो भी उसमें काव्य-तत्व बने ही रहते हैं. वह विषय में वर्जनाओं का विस्तार युक्तिसंगत उचित अनुपात में ही करता है. उसका लय और प्रवाह अकारण कहीं भी नहीं विचरने लगता.

यदि मृत्यु वाले शोकातुर विषय में कोई रेप-सोंग [तीव्र गति वाली कविता] रच जाये तो वह मूर्ख लोगों में ही हास्य पैदा करेगी और संवेदनशील लोगों में निष्प्रभावी होगी.

आपकी आँखों का इन्फेक्शन जल्द सही हो जाये.... इसकी कामना करता हूँ. आपका मूड फिर बन जाये तो बहार आ जाये. छंद-चर्चा आगे बढ़े.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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@ सुज्ञ जी आपने राजेन्द्र जी के भावों का सन्दर्भ पहचानकर उसे समीक्षक शब्दावली से भूषित कर दिया.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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दिव्या जी,
मानवीय स्वभाव है कि वह बराबर के इंस्टीटयूट में लगी भीड़ को देखकर अपनी पाठशाला को कमतर आँकने लगता है. बीच में मैं ही एक आचार्य के गुरुकुल में जाने लगा था. वहाँ आत्मबोध हुआ तो लौट आया. अब फिर से बिना प्रतिस्पर्धा भाव के पाठशाला में अपना कर्तव्य निभाऊँगा.

आपके आने से भी पाठशाला का छंद बिगड़ने नहीं पाता, एक लय में रहता है.

.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

दिव्या जी आपने बाद की टिप्पणियों में सुन्दर विचार दिये. ज्ञानीजनों को कर्तव्य बोध कराया. आगे आक्रोश को युक्तिसंगत रखने का प्रयास किया जाएगा.

आपने राजेन्द्र जी की कविता में से मोती चुन ही लिये.

.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

माँ सरस्वती की कृपा मिली क्यूँ वाकू ?
जो रहा था लगभग आधे जीवन डाकू ?
या रामायण के लिये भी डाका डाला ?
अथवा तुमने ही उसको कवि कर डाला ?
ye panktiyan achchi lagin....

Baki to kuchh jankari nahin rakhti is vishay me..... aage ki kakshaon ki prateeksha rahegi.... Shubhkamnayen..... ( mafi chahti hun hindi nahin likh pa rhi hun..)

सुज्ञ ने कहा…

गुरूजी,

अष्ट-अर्हतायें जानना रसप्रद रहेगा। अष्ट-नियमावली [कविता-दशा प्राप्त होने की शर्तें]।

मैं अवश्य याद दिलाउंगा।

अभी तो छंद का पाठ लेने को तत्पर है। कृपा किजिए गुरूदेव।