गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

कल्पनाशक्ति तेज़ करा लो.S..S...S....

नहीं कहूँगा 
मैंने कोई 
नहीं किया अपराध. 
किन्तु आपको 
सुनना होगा 
मेरा यह संवाद -
"एक पक्ष का प्रेम सदा 
होता आया है पाप. 
पक्ष दूसरे के भी मैंने 
कभी सुने पदचाप."

प्रश्न : इन पक्तियों के पीछे क्या कथा हो सकती है? यदि अनुमान लगा सकते हो तो उस प्रसंग की कल्पना करें जो इस संवाद-प्रकरण को जन्म देता हो.

16 टिप्‍पणियां:

kunwarji's ने कहा…

वाह!शीर्षक से न्याय करती पोस्ट!

कल्पना ही करनी है तो लो जी......

मानव मन की प्रवृत्ति को मै ऐसा मानता हूँ की उसे जो करना होता है वो उसे करने के लाख बहाने सोच लेगा,हम ओरो को सुनाने के बहाने खुद संतुष्ट करते चले जाते है की फलां कार्य हो जाएगा तो ये ठीक होगा,वो ठीक होगा!नहीं हुआ तो ऐसा हो जाएगा,वैसा हो जाएगा!और जब नहीं करना होता तो....वहो उसे ना करने के लाख बहाने...!

फिर जो वो देखना चाहता है उसे वही दिखाई भी देता है और महसूस भी होता है!वैसा सा भले ही ना भी हो,तो भी!

अब मन कहना चाहता है कि हाँ मै अपराधी तो हूँ,पर उकसाया हुआ!उसे पता है उसका अपराध छिपाए नहीं छिपना....अब अपना बचाव भी करना है,और मरते-मरते भी सफलता कि आस नहीं छोड़ी है,तो......

सूझता अभी अधिक कुछ ओर नहीं,

अपनी चोरी तो मानता कोई चोर नहीं!

प्रतुल जी ज्यादा तो नहीं हो गया....?

कुंवर जी,

ZEAL ने कहा…

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नहीं कहूँगा
मैंने कोई
नहीं किया अपराध। ...

जाने अनजाने हम सभी से पाप होते ही रहते हैं। जो समय रहते संभल जाए वही श्रेयस्कर है।

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sanjay jha ने कहा…

suprabhat guruji

jane anjane ..... kabhi bhoolvash
galtiyan ho hi jati hai....

sundar kavita....samajha me aaye....
kabhi kabhi primary ke kshatra ke
liye bhi likhha karen....

pranam.

सुज्ञ ने कहा…

गुरूजी,
बस यही तो समस्या है, कल्पना ही नहीं होती।

रचना बडी जानदार है।

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

प्रतुल जी अगर एकतरफा प्यार पाप है तो मैं ये पाप अक्सर करता रहता हूँ. जिंदगी में बहुत बार ऐसा हुआ है की कोई मुझे अच्छा लगा और बहुत बार मन की पसंद इकतरफा प्यार में भी परिवर्तित होती रही है. सच कहूँ तो आप मुझे एकतरफा प्रेमी का खिताब दे सकते हैं.

सुज्ञ ने कहा…

आपको तो सदैव ही हमारी शुभकामनाएं रहती है यह पाश्चात्य नव-वर्ष का प्रथम दिन है, अवसरानुकूल है आज शुभेच्छा प्रकट करूँ………

आपके हितवर्धक कार्य और शुभ संकल्प मंगलमय परिपूर्ण हो, शुभाकांक्षा!!

आपका जीवन ध्येय निरंतर वर्द्धमान होकर उत्कर्ष लक्ष्यों को प्राप्त करे।

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

सर जी.....सबसे पहले तो आपको सादर प्रणाम करते हुए नववर्ष की शुभकामनाएँ.

अब आपके सवाल का अनुमान ......
मुझे लगता है शायद आप ये कहना चाहते हैं कि एक तरफ़ा प्यार करने वालों को दुसरे पक्ष के अर्थात जिससे वो प्यार करता है, उसकी भावनाएं जानने की भी कोशिश करनी चाहिए.

क्रिएटिव मंच-Creative Manch ने कहा…

प्रसंग क्या हो सकता है?
शायद यही कि ''नज़र अपनी अपनी ख्याल अपना अपना.''
क्या विस्तार की आवश्यकता है?
..............
नववर्ष २०११ की हार्दिक शुभकामनाएँ.
..............
'सी.एम.ऑडियो क्विज़'
हर रविवार प्रातः 10 बजे

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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सूझता अभी अधिक कुछ ओर नहीं,
अपनी चोरी तो मानता कोई चोर नहीं!
प्रतुल जी ज्यादा तो नहीं हो गया....?

@ हरदीप जी, आपके मन का स्वर आनंद दे रहा था कि आपके संकोच ने रसभंग कर दिया. वह कुछ और विस्तार लेता तो शायद आप छिपे अर्थ उदघाटित हो पाते.
यह सही है कि "अपनी चोरी कोई चोर नहीं मानता." लेकिन जासूसी नज़रों के सामने लाने का औचित्य तो यही था कि वे सब अनुमान लगते जिनकी संभावना थी.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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संजय जी,
प्राथमिक छात्रों के लिये शीघ्र ही कुछ न कुछ लेकर आऊँगा.
मैं अक्सर भूल जाता हूँ कि आप भी हैं.
मुझे अच्छा लगता है - आप मुझे महसूस कराते रहते हैं कि
हमें कभी भाव-जटिलता के वृक्षों पर चड़ने की होड़ में कोमल-अर्थों के नन्हें पौधों को कुचलना नहीं चाहिए.
भविष्य में इसी तरह टोकते रहें तो मैं राह पर आ ही जाऊँगा.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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सुज्ञ जी,
रचना जानदार है शायद मोटी खाल वाली है.
कल्पना न लगाने का बहाना ........ आपका अपने बचाव के लिये तो नहीं है - यह पक्का है.
पर लगता है मेरे कान खींचने का मन नहीं है. आप गुरु का मान देते हैं, इस कारण चुप हैं.
अर्थ निकलेंगे तो कान खिंचेगे ही.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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दीप जी,
इस संवाद-प्रकरण को आपने पहचाना तो अवश्य, पर स्वानुभूत अनुभवों के आधार पर.
कोई नवीन कल्पना नहीं की, और ना ही लगाए अनुमानों में पैनापन आ पाया है.
कोई दो राय नहीं कि आप एकतरफ़ा प्रेमी हैं तभी आपके चाहने वाले हमेशा आपको फोन करते रहते हैं
या फिर संपर्क अन्य तरीकों से आपका द्वार भी खटखटाते हैं पर आप हैं कि आप उनसे बात करना या मिलना पसंद नहीं करते
मन की मौज के अनुसार ही मिलते-जुलते हैं, बात करते हैं.
क्या यह एकतरफ़ा प्रेम है या फिर कुछ.
एकतरफा प्रेम में भी दूसरे पक्ष के पदचाप तो सुनायी देने ही चाहिए.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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अब आपके सवाल का अनुमान ......
मुझे लगता है शायद आप ये कहना चाहते हैं कि एक तरफ़ा प्यार करने वालों को दुसरे पक्ष के अर्थात जिससे वो प्यार करता है, उसकी भावनाएं जानने की भी कोशिश करनी चाहिए.

@ विरेन्द्र जी, आपने खालिस कोशिश की. आपके तर्क पैने होते हैं
मुझे लगता है कि अब कल्पनाशक्ति में भी पैनापन आ ही जाएगा.
खेल-खेल में हम इस पाठशाला में नवीनताओं को आत्मसात कर पायेंगे.
मैं प्रयास करूँगा कि हमेशा नये ढंग से बात कहूँ. आपकी उपस्थिति से मेरा मनोबल बढ़ता है.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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क्या विस्तार की आवश्यकता है?
@ क्रिएटिव मंच ही यदि विस्तार पर प्रश्न चिह्न लगा दे. तो किससे आशा की जानी चाहिए सृजनात्मकता की.
यह साहित्यिक-खेल है, काव्य-क्रीड़ा है. इसमें अनुमान लगाने का खेल लेकर आया था. अब यदि विस्तार वाली भाग-दौड़ पर ही प्रतिबंध लगा दें तो
कौन खेल में भाग लेगा?

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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जाने अनजाने हम सभी से पाप होते ही रहते हैं। जो समय रहते संभल जाए वही श्रेयस्कर है।
@ वैदिक यज्ञ पद्धति में पाँच प्रकार के यज्ञों का विधान है. ब्रहम यज्ञ, देव यज्ञ, पितर यज्ञ, अतिथि यज्ञ और बलिवैश्य यज्ञ - इन सभी में हम न केवल धन्यवाद ज्ञापित करते हैं अपितु निरंतर होते आ रहे पापों का मोचन भी करते हैं. अब ये प्रक्रियाएँ बेशक कम हो गयी हैं. फिर भी प्रायश्चित और उपवास-संकल्पों का का महात्म्य अभी भी बरकरार है.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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प्रसंग से अनुमान :
प्रेमी का कहना है कि उसके ह्रदय में प्रेम बीज का वपन अकस्मात् नहीं हुआ और ना ही वह कोई चमत्कार है.
उस बीज का आना उन पदचापों का सुनना है. जो प्रेम का परिवेश बना रहे थे.
सीधे रूप से कहूँ तो
एक पक्ष का प्रेम अकारण नहीं हो जाता दूसरा पक्ष भी उसका छिपे रूप से प्रयास करता ही है. पदचाप का स्वर वह उष्णता निर्मित करता है जिसकी गरमी से प्रेम बीज अंकुरित हो ही जाता है.

यह बात दोनों पक्ष के लिये एक-समान है.
जिसके प्रयास बाह्य हो जाते हैं वह पक्ष उजागर हो जाता है. और जिसके प्रयास आभ्यंतर ही रहते हैं वह एक समय बाद अपने वासना-विकारों को भस्म कर लेता है.

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