रविवार, 17 अक्तूबर 2010

भाषा में जटिलता क्यों आ जाती है?

मित्र!
आपकी रुचि कविता के तत्वों को जानने के प्रति क्यों नहीं बन पा रही है? इस पर मैंने काफी विचार किया और पाया कि


— जिसका अर्थ अनुमान से तय करना पड़े उससे तो विमुखता ही अच्छी.
— जिस क्षेत्र पर पंडितों ने ही अपना अधिकार मान रखा हो उसमें न जाना ही अच्छा.
— जो केवल काव्य-रसिकों के मनो-विनोद की स्थली हो उसपर विषयी-सुख कहाँ मिल पायेगा?
— जहाँ मनोरंजन के लिये विकल्पों की भरमार हों, कविता उस स्तर पर क्या रसानुभूति देगी?


मैं यह समझता हूँ कि आज कविता में व्यक्त शृंगार की उच्चावस्था के दर्शन अन्य माध्यमों के द्वारा सहजता से हो जाते हैं. उसके लिये उसे पाठक रूप धारण नहीं करना होता. शृंगार के पठन का वैकल्पिक सुख उसे गुगलीय दृश्य सुविधाओं से भी प्राप्त हो जाता है. जहाँ श्लील-अश्लील के नैतिक मापदंडों से सरलता से बचा जा सकता है. शायद मेरी बात आप नहीं समझ पा रहे हैं.


मैं और सरल रूप देता हूँ. मैं लेखन या भाषण में उन बातों की प्रायः अच्छी अभिव्यक्ति नहीं कर पाता जिनकी मेरे व्यवहार में स्पष्टता है. जो साफ़-साफ़ पहचान ली जाती हैं. और उन बातों को मैं लेखन में अच्छे रूप से ले आता हूँ जो कहने में संकोच करता हूँ अथवा जो आपसे कह नहीं पाता.


मित्र, मन में कई मनोभाव ऐसे होते हैं जो अधिक विस्तार से स्पष्ट करके भी अस्पष्ट रह जाते हैं. और कई ऐसे होते हैं जो खुलकर सामने नहीं आना चाहते. इस बात को दूसरी तरह समझते हैं. समाज में आप दो-तीन तरह के लोगों को देखते होंगे.


— एक वे जो अपने अंगों के आकार-प्रकार (आकृति) को स्पष्ट करते हुए परिधान पहनते हैं. ..... आधुनिक किञ्चितवसना.


— दूसरे वे जो शालीनता का परिधान पहनते हैं, और उनका सौन्दर्य बाह्य रूप से प्रकट नहीं होता. उनमें छिपे सौन्दर्य को पहचानने के लिये उनसे परिचय करना होता है. थोड़ा समय लगता है उनको समझने में. वे जब समझ में आते हैं तो उनसे नज़रें नहीं मन जुड़ जाता हैं. ..... अवगुंठित दैदीप्यवसना.


— तीसरे वे जो अतिवादी परिधान के हिमायती हैं. उनका उद्देश्य न केवल सौन्दर्य को छिपाना होता है बल्कि समस्त गुणों को पहनावे के कैदखाने में सड़ते रहने देना होता है. चाहे वह शारीरिक सौन्दर्य हो अथवा मन, बुद्धि का सौन्दर्य हो. डाली पर लगे फूल को भी तो पूरे समय तक खिले रहने के लिये प्रकाश और ऑक्सीजन चाहिए ही होती हैं. ......... गलित संपुटितवसना.


मित्र, इसी तरह अर्थ की दृष्टि से भी तीन-चार भेद होते हैं :
तीन तो बहुत ही प्रसिद्ध हैं. एक उतना प्रसिद्ध नहीं है, फिर भी आपको चारों बताऊँगा.


[१] अभिधार्थ ........ जिसका अर्थ पूरा वही होता है जो समझा जाता हैं. जिसके आकार-प्रकार सभी को स्पष्ट (दृष्टिगत) होते हैं. ये अपने मुख्य अर्थ से ही रिझाना चाहते हैं. जैसे कि आधुनिक किञ्चितवसना. इसे वाच्यार्थ भी कहते हैं.
सरल उदाहरण — उड़न तश्तरी आजकल मेरे ब्लॉग पर नहीं आती. ............. इसका अर्थ वही है जो आप समझ रहे हैं.  


[२] लक्ष्यार्थ ........ जिसका अर्थ वही नहीं होता जो कहा जाता है. जिसके मुख्यार्थ से काम नहीं चलता. जिसे समझने के लिये एक चिपके अर्थ की मदद लेनी होती है. सटीक अर्थ तक पहुँचने के लिये उसपर पड़े अवगुंठन को उठाना होता है.
सरल उदाहरण — ब्लॉगजगत में आजकल बरगदों की छाँव तले ही विकास संभव हैं. .......... इसका अर्थ आपको समझाना पड़ सकता है. क्योंकि यहाँ 'बरगद' के लक्षित अर्थ को समझना जरूरी है. बरगद मतलब लम्बे समय से स्थापित बड़ा ब्लोगर.


[३] व्यंग्यार्थ/ व्यंजनार्थ ........ जिसका अर्थ पूरी तरह वह नहीं होता जो कहा जाता है. जिसके अर्थ के लिये तात्कालिक परिवेश से परिचित होना अनिवार्य शर्त है. शब्दों के द्वारा अर्थ नहीं प्राप्त किया जाता. बल्कि प्रयोजन समझकर अर्थ तक पहुँचा जाता है. ......... यह भी एक पकार से अवगुंठित दैदीप्यमान अर्थ होता है.
सरल उदाहरण — "रावण फूँकने वाले आज भी शतक लगा रहे हैं. दर्शन के पिपासु शून्य में ही संतोषी माता की छब देख रहे हैं." 
.............. अर्थ समझने के लिये आपको चिट्ठाजगत का सफ़र करना पड़ेगा. जहाँ रावण पर लिखी रचनाएँ शतक लगाने की ओर हैं. और वहीं दर्शन-प्राशन जैसे ब्लॉग भूखे बैठे हैं.  


एक अन्य भी अर्थ-प्रकार है "तात्पर्य"
[४] जिसमें अपने अनुमान के द्वारा ही अर्थ तक पहुँचा जा सकता है. प्रायः बुरके में बंद सौन्दर्य को या तो बंद ही रह जाना होता है. उसे कोई पाठक नहीं मिलता अथवा उसे कोई गुण-ग्राहक नहीं मिलता. ठीक 'गलित संपुटितवसना' की तरह.
सरल उदाहरण — "उस्ताद उस्ताद बनने के फिराक में हैं. शागिर्द शागिर्द नहीं रहना चाहते."
 ............. इसका अर्थ तो मेरी पाठशाला के विद्यार्थी ही बता सकते हैं. देखता हूँ वे बता पाते हैं या नहीं.


वैसे तात्पर्य शब्दशक्ति को मीमांसक आचार्य कुमारिल भट्ट ने तर्कसम्मत स्थापित किया है जिसकी चर्चा बाद में कभी करेंगे.
मैं यह जानता हूँ कि यदि चर्चा भारी-भरकम हो जाती है तो आप भाग जाते हैं या आते नहीं.




जानता हूँ कि कई काव्य-मर्मज्ञों को मेरी शब्दावली पर आपत्ति हो सकती है. परिभाषाओं से छेड़छाड़ बुरी प्रतीत हो सकती है. फिर भी मुझे अपने अरसिक मित्र को काव्य-जगत से प्रेम करवाने के सिवाय फिलहाल कुछ नहीं सूझ रहा है.

8 टिप्‍पणियां:

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

इस बार गुरुवर आपका तीर सही निशाने पर बैठा है. कविता से मेरी विमुखता के विषय में अपने जो कयास लगाये हैं वो बिलकुल सही हैं.

आजका पाठ बहुत बढ़िया है.

ZEAL ने कहा…

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भाई प्रतुल,

कवी और कविता दोनों को समझना सबके बस की बात नहीं है। मैं ज्यादातर तो कविताओं को समझने की कोशिश ही नहीं करती क्यूंकि मैं असमर्थ हूँ। और जहाँ मैंने समझने की कोशिश की, सर्वथा गलत ही समझा। इसलिए कविता को समझना मेरे लिए तो टेढ़ी खीर के सामान है।

मैं तो स्पष्ट वक्ता हूँ और ज्यादातर ' अभिद्या' में ही संवाद करना पसंद करती हूँ।

आभार।

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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प्रिय विद्यार्थियो !
'अभिधा भाषा सर्वग्राह्य है' यही विशेषता इसका अवगुण हो जाती है कभी-कभी.
लाक्षणिक और व्यंजक कविताओं को तो मन-मुताबिक़ अर्थ दिए भी जा सकते हैं. यह शैली एक प्रकार से अपना बचाव भी है. सामान्य जन 'एक विशेष प्रकार के प्रेम' के सामान्य अर्थ ही लगाएगा. उसे समझाना बेहद मुश्किल होगा. कहाँ तक स्पष्टीकरण देंगे. थक जायेंगे, जीवन समाप्त हो जाएगा लेकिन सीता पर कलंक लगाने वाले उसे वनवास दिलाकर ही दम लेंगे. इसलिये लाक्षणिक और व्यंजक शैली एक सीमित वर्ग के मनो-विनोद का माध्यम बनकर ही रह गया है. इसकी विवशता कोई जानना नहीं चाहता.

वैसे एक अन्य बात भी है कि पहेली का उत्तर खोजने में जो सुख होता है. उसी तरह का सुख ऎसी कविताओं का अर्थ खोजने में मिलता है. इस दृष्टि से भी ऐसा काव्य श्रेष्ठ कहा गया है.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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मित्र V4-0 G,
आपके आने पर मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं.
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मुझे मालूम हैं अपनी जटिलताएँ.
परन्तु आपको मालूम नहीं मेरी विवशताएँ.

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सुज्ञ ने कहा…

क्या यह कवि की मनोव्यथा है?

Shekhar Suman ने कहा…

दो बार पढने के बावजूद मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा...अफ़सोस..

खैर..
इस बार मेरे नए ब्लॉग पर हैं सुनहरी यादें...
एक छोटा सा प्रयास है उम्मीद है आप जरूर बढ़ावा देंगे...
कृपया जरूर आएँ...

सुनहरी यादें ....

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

शे......खर सुमन जी,
आपको जिस भी ब्लोगर की बात समझ में आती है, उससे मदद लें. उससे पूछें कि 'क्या उसे भी समझ में नहीं आता?' यदि उसे भी समझ में नहीं आता तो तीसरे से पूछें कि 'क्या उसे भी समझ नहीं आया?' यदि उसे भी समझ नहीं आये तो मेरा उद्देश्य पूरा हुआ समझो. मुझे अपनी बात उन तीन व्यक्तियों को पढ़वानी थी जो अभी भी ज़मीन से जुड़े हैं.

ज़मीन से इतना भी मत जुडो कि कोई उठाना चाहे तो उठ ना पाओ.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

जी हंसराज जी,
यह लगती तो मनोव्यथा ही है. लेकिन मैंने इस व्यथा में मित्र को शब्द शक्तियों के भेद समझाए हैं. और उसे काव्य जगत में फिर से लाना चाहा है. मैंने उन तत्वों की तलाश की कि कोई किन कारणों से लाक्षणिक और व्यग्यात्मक वाक्य-विन्यासों से जुड़ नहीं पाता. कोशिश की कि उसे भी उन बातों का पता चले कि जटिलता भाषा में क्योंकर आ जाती है.