सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

जो नहीं कभी सोचा मैंने

जो नहीं कभी सोचा मैंने 
वो भी तुमने कर दिखलाया 
समझा कीचड़ में कमल खिला 
भ्रम था मेरा तम था छाया. 


सरिता तुमको समझा मैंने 
पावन जल की पाया नाला. 
सविता प्राची की समझ तुम्हें 
कपटी मन की पाया बाला. 


कवि ने तुमको कविता समझा 
समझा तुमको जीवन दाता. 
पर यहीं भयानक भूल हुई 
निकली तुम निज काली माता. 




उपर्युक्त पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है? 
— संदेह 
— भ्रांतिमान 
— श्येन भ्रम {नूतन अलंकार}
— मायोपमा {नूतन अलंकार}

39 टिप्‍पणियां:

Majaal ने कहा…

काली अथवा धवल दुग्ध बाला,
मधुर स्मरण, या हो छल गाथा,
हो चाहे जैसा रूप भावों का,
अंतिम अनुभव कागद स्थल पाता.

लिखते रहिये ...

सुज्ञ ने कहा…

मायोपमा का आभास हो रहा है।

Majaal ने कहा…

माफ़ कीजिएगा, आपका प्रश्न नज़र नहीं आया था.. यहाँ तो लगता है बाकायदा कक्षा चल रही है ... बढ़िया है, जारी रखिये ... हम तो इस मामले में निपट मूर्ख है...उत्तर तो नहीं पता, शुभकामनाए ही रख लीजिये हमारी तरफ से ...

Shekhar Suman ने कहा…

यह तो अपने बस का नहीं है.... हम तो बस धन्यवाद दे सकते हैं...
मेरे ब्लॉग पर इस बार

एक और आईडिया....

Naresh ने कहा…

Guru Ji pranam

aapne addmission ke bare mai kuch betaya nahi kafi time ho gaya agar class me seat nahin hai to window ke raste se hi padha do jisse meri padhai ka loss na ho.

ok bye bye

Guru ji aapse ek question karna chahata hu plz. answer jarur dena

dil me aag legaye savan ka mahina nahin jeena nahin jeena nahin jeena?

Is anucade mai kaun-sa alangkar hai?

Naresh ने कहा…

Guru JI main janta hu Amit ji or Divya ji apke class ke sabse Gyani Student hain. Jab aap Common Wealth Game ki chhutti par chale gaye the to Amit ji hi class ke moniter the.

Jab mera addmission ho jayega to main bhi Amit and Divya ji ki tarha man laga kar padhunga.

अमित शर्मा ने कहा…

@ dil me aag legaye savan ka mahina nahin jeena nahin jeena nahin jeena?

Is anucade mai kaun-sa alangkar hai?

# इसमें बुद्धि-भ्रंश अलंकार और सत्यानाश रस है :))

अमित शर्मा ने कहा…

मायावती प्रकट भई, कवि भयो मायाशय
मायिक सृष्टि मन रची मायोपम आशय

१. मायावती >>>> कामदेव की स्त्री, रति
२. मायाशय >>>> माया से अभिभूत। उदाहरण—सुरभिति दिशि-दिशि कवि हुआ धन्य मायाशय।—निराला।
३. मायिक >>>> मायावी। अवास्तिवक पर वास्तविक-सा दिखायी पड़नेवाला
४. मायोपम >>> कवि प्रतुल रचित नूतन अलंकार

अमित शर्मा ने कहा…

गुरुदेव क्या सुग्यजी और मैं सही हैं, क्या यहाँ मयोपमा अलंकार ही है .

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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प्रिय नरेश जी,
आप गीत पसंद करते हैं. और उनमें अलंकार ढूँढना चाहते हैं. मुझे स्वीकार है.
हाँ आपके प्रवेश की मैंने पिछली पोस्ट में एक शर्त रखी थी. पूरी करें तो विधिवत प्रवेश होगा. अन्यथा 'सर्व शिक्षा अभियान योजना' के तहत आप अपना भी प्रवेश ही समझो.
आप वीप्सा शब्दालंकार वाले गाने को गुनगुनाना पसंद करते हैं.
यदि कोई आपके गाने को मेरे सम्मुख गुनगुनाता है तो मैं भी एक कविता की पंक्ति अवश्य उच्चरित कर देता हूँ :
"नहीं तुमको जीने की चाह,
हमें न मरने की परवाह"

आपके लिये पाठशाला के कपाट सदा खुले हैं.
हाँ मेरे प्रिय ही हैं
रोल नंबर १ अमित शर्मा और
रोल नंबर २ दिव्या श्रीवास्तव
लेकिन बाक़ी भी मेरे प्रिय ही हैं, उनका प्रेम है कि वे अपनी गुरुता भूलकर मुझे इस पाठशाला को चलाने की प्रेरणा दिए जाते हैं. आप आते रहेंगे तो अन्यों से भी परिचित हो ही जायेंगे.

थोड़ा अमित जी की बात पर भी गौर कीजिएगा.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

मजाल जी,
"अंतिम अनुभव कागद स्थल पाता."
@ सत्य कहा.... मेरे आखिरी अनुभव ने ही कागज़ की शरण ली. अन्यथा भाव तो सरिता की तरह बहते जाते थे. उनको पुंजीभूत किया मेरे आखिरी अनुभव ने........... सही पकड़ा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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प्रिय विद्यार्थियो,
'नाला' क्या इतना हेय है कि अन्य सदभाव उसकी उपेक्षा ही करें.
'नाला' बना कैसे? वह करता क्या है?
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वह हमारी ही गंदगी का तो परिणाम है.
वह हमारी ही गंदगी को सतत ढोता है.
वह हमारा सेवक है. हमारे मल-मूत्र और समस्त विकारों को निरंतर हमसे दूर ले जाने वाला.
नहीं, उसे हेय नहीं होना चाहिए. उसमें भरा रहने वाला कीचड़ हमारे कारण से ही तो है.
______________
अरे! जिसे मैंने अब तक पावन जल की सरिता (गंगा) समझा वह तो नाला निकला.
@ वास्तव में वह पहले गंगा की तरह पावन थी लेकिन उसे समाज ने नाला बना दिया.
उसका रूप माया के कारण परिवर्तित हुआ. .......... मायोपमा अलंकार.
इसके लिये हंसराज सुज्ञ जी को दिए जाते हैं 100 बटा 100 अंक. और अमित जी ने नक़ल की है इसलिये उनका परीक्षा परिणाम रोका जाता है.
हाँ उनकी कविताई को मध्येनज़र रखते हुए उन्हें इस बार पढ़ने वाला छात्र जानकार माफ़ किया जाता है.

अमित शर्मा ने कहा…

धत तेरे की ! अब गुरूजी इन सहपाठियों के चक्कर में मेरी दुर्गत क्यों बना रहें है. आप अन्य पहेली ब्लोगों की तरह किया कीजिये, या आप ही बताइए की दूसरा अलंकार बताऊ............................कितना सोच-साचकर मयोपमा को परिभाषित करने के लिए दो लाइन लिखने की मेहनत करी अरु आपने परिणाम ही रोक दिया!!!!!!!!!!!!!!!!!! घोर अन्याय........................ अब आपके वशीभूत हड़ताल भी तो नहीं कर सकते, पर हड़ताल भी महाविद्यालय(कॉलेज) में ही की जा सकती है यह तो विद्यालय है........................... स्कूल में तो हड़ताल का ऑप्शन ही नहीं होता.............................. चलिए जी "जो राम रची रखा" :))

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

रोल नंबर १

जो नहीं कभी सोचा तुमने
वो भी मैंने कर दिखलाया.
समझा कविता पर रीझेंगे
ईर्ष्या ने मुझको भड़काया

होता जंगल में शेर एक
बाक़ी उसकी है री..आया.
गुरु जीता बनकर मूलकृति
बाक़ी को कर देता साया

तुम कहते हो अन्याय इसे
मैं कहता हूँ 'होता आया'
मैं नहीं नया कुछ करता हूँ
प्रतिभा ने ही धक्का खाया.

जिनकी प्रतिभा के साथ अन्याय होता है
प्राय उनके नाम नहीं लिये जाते.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

अमित जी,
मैं स्वयं ही कहने वाला था अन्य अलंकार भी खोजें जाएँ. तो आनंद द्विगुणित होगा. परिणाम की चिंता न करें. aap par तो abhi dheron aarop lagne se rah gaye hain.

ZEAL ने कहा…

भाई प्रतुल,

अलंकार तो नहीं मालूम , लेकिन आपकी कवितायें रसों की खान लगती हैं। मेरा मूलांक '२' है , इसलिए मुझे अपना रोल नंबर पसंद आया। आशा है आप मुझे पास कर देंगे। अलंकारों की दुनिया से अपरिचित हूँ । यहाँ सीख रही हूँ।

सुज्ञ जी का उत्तर बढ़िया लगा । अमित जी के परिश्रम के लिए उन्हें भी अंक दे दो न भैया।

नरेश जी को क्षमा न करियेगा । कक्षा में लेट आते हैं ।

'नहीं जीना , नहीं जीना ' में सुसाइड-अलंकार दिखाई दे रहा है। धरा ३०२ लग सकती है।

..

सुज्ञ ने कहा…

अमित जी,

सब गुरुदेव की माया है

यह यज्ञ था, इन्द्र देव से अमरता का वरदान पाने का।

वस्तूतः आपका श्रलोक सटीक था, गुरू जी के लिये…
मायावती प्रकट भई, कवि भयो मायाशय।
मायिक सृष्टि मन रची मायोपम आशय ॥

नत-मस्तक गरूदेव

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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दिव्या जी,
शांत प्रकृति के सुज्ञ जी सतसैया के दोहों की तरह ही बात कहते हैं.
अमित जी के लिये शुरू में ही मैंने कह दिया था कि 'उनके लिये साधारण अंक नहीं हैं.' उनके लिये विशेष अंक संभाल कर रखे हूँ. छोटे बच्चों की तरह इसके लिये भी आप जिद न करने लगना. बहिनों के लिये हमारी श्रद्धा अवनत पलकें हैं.
नरेश जी 'योजना के तहत' प्रवेश पाए हैं. इसलिये उनकी मन की मौज हमें समय-असमय झेलनी ही होगी. मैंने आपके घर पर आकर 'वधु की विदाई' नामक कविता सुनाने का वादा किया था. सो 'पाठ-४' पढ़ाने से पहले उसे अवश्य सुनाऊँगा.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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अमित जी,
"मायिक >>>> मायावी।
अवास्तविक पर वास्तविक-सा दिखायी पड़नेवाला"

@ परिभाषा को सही दिशा देने में ले चलने वाले ये शब्द-युग्म मुझे पसंद आये. और वह भी कवितायी के माध्यम से.
जिसके प्रति जितना अधिक अन्याय होता है, सच्चे साथियों और शुभचिंतकों में उसके लिये विशेष प्रकार की सहानुभूति पैदा हो जाती है. इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि कौन-कौन आपके लिये सच्ची भावनाएँ रखता है.

_______________
इस नाटक के सूत्रधार आप ही हैं. इस बात को आप छात्र बनकर विस्मृत कर बैठे हैं.
जैसे अवतारवादियों के 'राम' विस्मृत कर बैठे थे अपने समस्त ज्ञान को गुरुकुल में.
उन्होंने गुरु वसिष्ठ से विधिवत ही ली थी श्रमसाध्य विद्या.

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अमित शर्मा ने कहा…

@ परिभाषा को सही दिशा देने में ले चलने वाले ये शब्द-युग्म मुझे पसंद आये.

# चेला धन्य हुआ गुरुदेव ! मानों आपने साक्षात अंक दान दिया हो..........................अंको के अंक तो जाये भाड़ में.........................आपकी अनुकम्पा बनी रहे

अंक अंक ते कोट गुनी महिमा अधिकाय
वा मिले अहंक बढे या मिले आनंद पाय
- अमित शर्मा


इस दोहे में कौनसा अलंकार है :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

अमित जी,
भावों को कविता [छंद] में व्यक्त करने में सृजन सुख होता है.
छंद निर्माण करते समय प्रारम्भ में मात्राओं का काफी ध्यान रखना होता है.
आप जिस दोहे की नक़ल लेकर आये हैं उसमें क्या त्रुटियाँ हैं, उसपर बात करते हैं :
आपने कहा :
"अंक अंक ते कोट गुनी महिमा अधिकाय
वा मिले अहंक बढे या मिले आनंद पाय"
अब आप इसमें
[१] 'कोट' को 'कोटि' लिख सकते हैं.
[2] 'महिमा अधिकाय' के स्थान पर दो मात्राओं को बढ़ाकर लिखना होगा, जैसे कनक-कनक वाले दोहे में 'मादकता अधिकाय' था वैसे ही यहाँ 'मोहकता अधिकाय' जैसा ही कुछ आना चाहिए. वह क्या हो अब यह सोचना है.
"अंक अंक ते कोटि गुनी महिमा अति अधिकाय.
वा मिलिके अहंक बढ़े या मिलि मन मुसकाय.

....... इसमें यहाँ कोटि में एक मात्रा अधिक बैठ रही है. इस कारण हम संख्यावाची अन्य शब्द 'लख' बैठा कर देखते हैं.
"अंक अंक ते लख गुनी महिमा अति अधिकाय.
वा मिलिके अहंक बढ़े या मिलि मन मुसकाय.

— मन मुसकाय और आनंद पाय सामान्यतः एक ही अर्थ देते हैं.

>>>>>>> जम गयी न बात!
१३-११/ १३-११ मात्रिक विधान वाले छंद को दोहा कहते हैं.

अमित शर्मा ने कहा…

गुरुदेव इस पोस्टमार्टम के लिए तैयार ही था मैं :)
__________

छंद के अंग का ध्यान ना रखने का कारण सिर्फ इतना था की, मेरे हिंदी साहित्य के टीचर श्रीगुलाबदान जी बारहट कहा करते थे की पहले अपने भावों को प्राथमिक स्तर पर तुकांत स्वरूप देने की कोशिश करो, मात्रा, वर्ण आदि उसके बाद अपने आप ही अपने अपने स्थान ग्रहण करते जायेंगे. अगर उस समय अभ्यास जारी रखा होता तो इतने मेहनत दुबारा ना करनी पड़ती.
चलिए अच्छा ही हुआ आपकी शागिर्दी करने का सौभाग्य भी तो प्राप्त हुआ इस मिस.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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विद्यार्थियो!
अमित जी ने पूछा है ..... अलंकार कौन सा है?
— बताइये, क्या कोई विद्यार्थी इसमें अलंकार बताएगा?
सोचिये तब तक मैं आपको अलंकार की एक नयी परिभाषा बताता हूँ .....
अलंकार = अलं + कार अर्थात रोकने वाला.
पाठ्य वस्तु को पढ़ते समय जो हमारे ध्यान को अटकाए अथवा कुछ समय को रोक दे वो अलंकार होता है.
हाँ, इसका मतलब यह नहीं है कि कक्षा में पढ़ते समय कोई शरारती विद्यार्थी आकर ध्यान बटाए तो वह अलंकार कहलायेगा. यह रोकने वाला कारक पाठ्य वस्तु में छिपे सौन्दर्य को उदघाटित करके आनंद [रस] पैदा करता है.

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अमित शर्मा ने कहा…

@ — मन मुसकाय और आनंद पाय सामान्यतः एक ही अर्थ देते हैं.

# यहाँ मैं आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ, कहाँ गुरुदेव के गले लगाने से उत्पन्न आनंद, और कहाँ मात्र मुस्कुराना


आनंद पुं० [सं० आ√नन्द् (समृद्धि)+घञ्] [वि० आनंदित,आनंदी] १. मन में होनेवाली ऐसी अनुकूल तथा प्रिय अनुभूति जो अभीष्ट तथा सुखद परिस्थितियों में होती है तथा जिसमें अभाव, कष्ट, चिंता आदि नाम को भी नही होतें।

मुस्कराना अ० [?] इस प्रकार धीरे से हँसना कि होंठ फैल जायँ परन्तु दशन-पंक्ति दिखाई न दे।

अमित शर्मा ने कहा…

फितरत-ऐ-तगाफुल बसी रग रग में ज़माने की
चाहत-ऐ-अमित कि छूटे ना तफ़ज्जुल गुल की

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

अमित जी,
दो बातों पर ध्यान दें :
यह मुस्कराना है मन का.
दूसरी बात यह सामान्य अर्थ बताया है.

अमित शर्मा ने कहा…

इसीलिए तो मैं भी कह रहा हूँ की आनंद भी मन में ही उमगता है, जहाँ फिर कुछ कामना शेष नहीं.........................और मुस्कुराना!!!!!!!!!!

अमित शर्मा ने कहा…

दूसरा आप मेरे भाव-प्रकटीकरण को मुक्तक छंद मान सकते है......................................कवि केशव अपने भावों पर कविता के अलंकारों को महत्त्व दे गए थे तभी तो उनके लिए कहा जाता है "..............................,उड़गन केशवदास"

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

मुस्कान तो आनंद की बाह्य प्रस्तुति है. जो बाह्य है वही दर्शनीय है. इस कारण आनंद को मुस्कान का सामान्य अर्थ बताया है.
___________________
नेट बहुत प्रोब्लम दे रहा है.
इस कारण उत्तरों में विलम्ब हो रहा है.

अमित शर्मा ने कहा…

मुस्कान प्रसन्नता का की अभिव्यक्ति हो सकती है, आनंद की नहीं.....................आनंद तो अपने आप में परिपूर्ण है उसे किसी अभिव्यक्ति की क्या जरुरत.....................चेले को आनंद हुआ था, मात्र प्रसन्नता नहीं :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

मान लिया अमित जी मान लिया.
"सूर सूर तुलसी ससी, उडगन केशव दास
अब के कवि खद्दौत सब, जहँ तहँ करहिं प्रकास.
>>>>>>>>>>>>>> आपके भावों का पूरा सम्मान है लेकिन मात्राओं का भी अभ्यास करो.

उपर्युक्त छंद में भी मात्राओं का पूरा ध्यान रखना कवि नहीं भूला है.

अमित शर्मा ने कहा…

अब मात्राओं के अभ्यास के लिए ही तो आपकी शाला ज्योइन किये है:)

अमित शर्मा ने कहा…

यह तो क्या है की आनंद और मुस्कान का बहाना लेकर थोड़ी आनंद धाम की चर्चा करने का मन हो गया था

अमित शर्मा ने कहा…

"फितरत-ऐ-तगाफुल बसी रग रग में ज़माने की
चाहत-ऐ-अमित कि छूटे ना तफ़ज्जुल गुल की"
______________
इसका भी तनिक पोस्ट मार्टम कर दी जिए

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

आपके इस शेर को देख कर मैंने उर्दू शब्द कोष उठा लिया था.
इस शेर की दहाड़ तो माशाअल्लाह काफी कर्णप्रिय है :
"दुनिया के हर शख्स से मिली थी उपेक्षा आदतानुसार.
बस अमित की चाहत है 'छोड़ न दे फूल अपनी खुशबू." अथवा
'छूटे न कृपा इस पाठशाला की"

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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एक कविता अमित जी के शास्त्रार्थ में विजयी होने पर :

मुस्कान
__________
अधरों के मध्य पड़ी रेखा
छोरों से झुकी हुई थी जो
तुम हुए सफल, खिल गये नयन
द्वय छोर कहें हमको खींचो.

खिंच गये छोर, फिर जोर-जोर
खींचातानी में खुले अधर
कुछ दन्त दिखे, कुछ हुआ शोर
रेखा मिटकर हो गयी अमर.
.

सुज्ञ ने कहा…

क्या हिम्मत वाला विद्यार्थी है, फ़टाफ़ट पुछ लेता है?
हम तो दब्बू पिछली पंक्ति में बैठे,मात्र सुन रहे है।

पर यह गुरू-चेला संवाद से हमारे ज्ञान में अभिवृद्धि अवश्य हुई।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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Roll No. 3 Hansraaj Sugya Ji,

गगरी पूरी भरी हो तो छलकती नहीं.
सागर की गंभीरता का मतलब यह नहीं कि वह अज्ञानी है.
उसकी गंभीरता उसकी गहराई की तरफ इंगित करती है.

.

सुज्ञ ने कहा…

अर र र, ना गुरू जी
फ़ूल के कुप्पा हो जायेंगे।
और अंत में अंक कम आये,
तो लताड भी बडी खायेगें