शनिवार, 10 सितंबर 2011

अश्रु-भस्म

शांत जल से 
शांत थे मन भाव 
आये थे तुम 
आये थे अनुभाव 

शांत मन में 
सतत दर्शन चाव 
स्वर नहीं बन पाये 
मन के भाव

जल गये सब 
जड़ अहं के भाव
बह गया मन 
मैल - प्रेम बहाव

लगाव से 
विलगाव तक का 'गाव'
दृग तड़ित करता 
कभी करता अश्रु-स्राव

प्रेम - मिलना
प्रेम - पिय अभाव
प्रेम में आते
दोनों पड़ाव

सतत चिंतन
प्रेम की है रस्म
दिव्य औषध
बनते अश्रु-भस्म.
_________________ 
*गाव ........ गाने की क्रिया



प्रश्न : कभी-कभी भाव अभिव्यक्ति का शाब्दिक प्रवाह कमतर होता है लेकिन उसमें जिसका प्रवाह तीव्र महसूस होता है उसे क्या कहें ?
— सात्विक अनुभावों की अनुगूँज 
— मूक चाहत 
— या फिर, संकोची दर्शन-पिपासा.

32 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

सतत चिंतन
प्रेम की है रस्म
दिव्य औषध
बनते अश्रु-भस्म.

वाह गुरूजी!!
एक एक शब्द, सागर बन गया।
फिर भी है तो………
"संकोची दर्शन-पिपासा."

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

कम शब्दों में गहरे भाव ...
बहुत अच्छी रचना ...
शुभकामनायें..

Kailash C Sharma ने कहा…

सतत चिंतन
प्रेम की है रस्म
दिव्य औषध
बनते अश्रु-भस्म.

....कुछ शब्दों में इतना गहन चिंतन...उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..आभार

रविकर ने कहा…

श्रीमन !!
प्रणाम

सुन्दर रचना पढ़कर---
कुछ लिखूं मैं भी --
सोचा - लिखा

मन-सागर में खारा पानी |
बहुत-बहुत बेचारा पानी-
भर-भर घड़े उड़ेले अश्रु-
तब आया यह सारा पानी ||

था मीठा कभी सरोवर सा,
किलके कल-कल कल सोहर सा
कुछ विषद अनोखे भाव जगे-
नव जंतु जमे मन *पोहर सा |

*पोहर = चारा गाह

जब तक मीठा पानी पाया |
घूम-घूम चर रमा-रमाया |
शुष्कता बढ़ी सब क्षार हुआ-
भांटा होकर मन- ज्वार हुआ ||

वो छोड़ चले पावन-प्रदेश,
घूमे निर्जनता बदल वेश |
समताप क्षेत्र संताप युक्त-
डूबे उतराए मीन-मेष ||


आपकी पावन प्रेरणा को नमन ||

केवल कुंडलियों और व्यंग में रमा था हफ़्तों से --

बाहर आया धन्यवाद

आपको बहुत बहुत बधाई --
इस जबरदस्त प्रस्तुति पर ||

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

प्रेम - मिलना
प्रेम - पिय अभाव
प्रेम में आते
दोनों पड़ाव

........
........

pranam.

ZEAL ने कहा…

.

प्रेम में दो क्या सैकड़ों पड़ाव आते हैं । प्रिय के चिंतन मात्र में अनगिनत विचार उठते हैं । प्रत्येक विचार एक पड़ाव ही तो है , जहाँ मस्तिष्क रह-रह कर ठहरता है और आगे जाता है, फिर वापस लौटता है। प्रेम में जितना डूबते हैं , उतने ही पड़ाव आते रहते हैं । प्रेम का प्रसाद तो उसके अंतिम पड़ाव में ही मिलता है, जहाँ आत्माओं का संयोग हो जाता है।

इस श्रेष्ठ रचना के लिए बधाई।

.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

प्रेम सफल हो..सतत चिंतन, सतत चिन्मय में बदल जाय तो आनंद है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत सुन्दर। सुन्दर भाव, सुन्दर शब्द! छन्द-शिल्प के बारे में कुछ समझने की हैसियत नहीं है अपनी।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

शांत मन में
सतत दर्शन चाव
स्वर नहीं बन पाये
मन के भाव

गहन..... कितना कुछ समेटे पंक्तियाँ .....

कुश्वंश ने कहा…

सतत चिंतन
प्रेम की है रस्म
दिव्य औषध
बनते अश्रु-भस्म.

वाह प्रतुल जी वाह , आपका लेखन साहित्यिक भूख को तृप्ति प्रदान करता है आभार

कुमार राधारमण ने कहा…

सक्षम नहीं हूं कुछ भी कहने में।

आशा जोगळेकर ने कहा…

प्रेम की व्याख्या प्रेम के भाव
भवसागर तारेगी प्रेम नाव ।

बहुत सुंदर कविता

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

उत्तर(प्रयास) - चौथा विकल्प भी देना चाहिये था, उपरोक्त सभी।

शांति प्राय: तूफ़ान के पहले या बाद में आती है।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सुज्ञ जी, प्रश्न का उत्तर सही दिया आपने... संकोच में अभिव्यक्ति सिकुड़ जाती है.. मुख से वही शब्द बाहर आते हैं जो मुख्य-मुख्य हों.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ अनुपमा जी, कम शब्दों के ही पीछे भाव पंगत में रह सकते हैं या गहराई में उतर सकते हैं... अधिक शब्दों के पीछे तो भाव फ़ैल जाते हैं...

आपकी प्रशंसा और शुभकामना दोनों का ही मन से स्वागत करता हूँ.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय कैलाश जी, भस्म रमाने वाले ही कैलाश में रह पाते हैं...अश्रु-भस्म को तो आपने उत्कृष्ट स्थान दे दिया... आभार.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रविकर जी, यदि मेरी समीक्षा और मूल्यांकन को महत्व दिया जाता होता तो आपको अवश्य वर्तमान का सर्वश्रेष्ठ आशुकवि घोषित कर देता... जितना मुग्ध आपकी कविताई को पढ़कर होता हूँ उतना मुग्ध कभी अविनाश चन्द्र जी कवितायें पढ़कर होता था... फिर भी आशुकवित्व में तो आप ही सबसे आगे दिखायी देते हैं.

यदि आपको कवित्व में अंक दूँ तो सौ में निन्यानवे दूँगा. एक अंक किसी कारण-विशेष से काट रहा हूँ...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सञ्जय जी, इसी तरह पंक्तियाँ दोहराने से लेख भी सुधरेगा और कविता भी कंठस्थ होगी.... :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दिव्या जी, सैकड़ों पड़ाव को सरलता से समझने के लिये हम उसे सुखात्मक और दुखात्मक रूपों में बाँट लेते हैं.... प्रिय के चिंतन में विचार बेशक अनगिनित हों स्मृतियाँ मात्र सुखद ही होती हैं... प्रिय की स्मृति में आरम्भ में अश्रु तो बस इसलिये निकल आते हैं कि उसका कल्पित विछोह भावुक कर देता है... लेकिन जब विछोह में भी जब सुख मिलने लगे तो इसे अश्रु-भस्म औषध का चमत्कार मानना चाहिए.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ देवेन्द्र जी, प्रेम मन में प्रवेश कर जाये तो आनंद-वर्षा होती ही रहती है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ स्मार्ट इण्डियन... यदि ये कहे कि कुछ समझने की हैसियत नहीं अपनी ... तो इससे अच्छा मज़ाक नहीं होगा कोई.
छंद-शिल्प से अधिक महत्वपूर्ण है भाव का अंतस में उतर पाना.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. मोनिका जी, भाव यदि पंक्तियों में लग जाएँ तो ग्रुप के ग्रुप थोड़े में सिमट आते हैं...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय कुश्वंश जी, साहित्यप्रेमियों को तो काव्य के अभ्यास में भी साधना के स्वर सुनायी देते हैं... उनसे मिली प्रशंसा काव्य-अभ्यासियों के लिये महत्वपूर्ण होती हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ कुमार राधारमण जी, ब्रह्मचर्य से क्षमता प्राप्त की जा सकती है... मनोबल बढ़ता है.. कहने योग्य बातें कहने की क्षमता आती है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीया आशा जी, आपके छंद से मिली शुभकामना केवल वहीं का सफ़र करायेगी जहाँ तरल स्नेह होगा ...क्योंकि प्रेम नाव तो छिछले जल में अथवा शुष्क प्रदेश में तो चल नहीं सकती... ठीक भी है जिनका हृदय प्रेम से लबालब हो हमारी नौका वहीँ चलेगी.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सञ्जय अनेजा जी, आपने चौथा विकल्प मौके(?) पर दिया... जब परीक्षा समाप्त हो गयी.

विकल्प रचने में भी संकोची स्वभाव बरक़रार रहा ...

तूफ़ान के आगे-पीछे के सत्य को आपने जाहिर किया ... क्या प्रेम के आगे-पीछे का सत्य भी यही है क्या?

सतीश सक्सेना ने कहा…

इस मधुर सौम्यता और प्रेम गंगा को प्रणाम !
आपको शुभकामनायें !

ajit gupta ने कहा…

प्रवास पर होने के कारण देर से आयी हूं क्षमा करे। यह सच है कि जब कोई व्‍यक्ति किसी के प्रेम में या आकर्षण में बंध जाता है तो अश्रु बहुत निकलते हैं। अच्‍छी कविता और अच्‍छे भाव।

boletobindas ने कहा…

मित्र पता नहीं मेरी तुछ्छ बुद्धि में कविता उस तरह क्यों नहीं उतर रही है जिस तरह यात्रा के आरंभ की कविताएं थी। क्या नई कविता के नाम से ख्यात कविताओं में कुछ प्रयोग कर रहे हैं आप। क्या अलंकारों का गूढ़ प्रयोग करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ प्रिय रोहित जी, जब ग्रहण करने का पात्र संकरे मुख का होता है तब मोटी धार वाले प्रवाह को समूचा बटोरने में काफी कुछ बिखरता ही है... और नई कविता और पुरानी कविता; अकविता और वाम कविता; गद्य कविता और छंद कविता; स्वर कविता और चित्र कविता न जाने कितने ही रूप भावाभियक्ति ने पाये हैं... भविष्य में आगे भी इस काव्य-क्रीड़ा को करने का सोचा है... कविता को किसी परिभाषा में नहीं बाँधना चाहता... इसे तो मैं एक दशा के रूप में ग्रहण करता हूँ... जो रचनाकार के भीतर बनती है. आप काफी समय बाद ब्लॉगजगत में आने-जाने लगे हैं... प्रसन्नता होती है.... किन्तु इस बात का भी भान है कि आपने एक बड़े ईश्वरीय घात को झेला है... उसकी प्रतीति नहीं जाती...

मैं कविता के साथ कोई प्रयोग नहीं कर रहा... बस कविता को जिस रूप में भी जीता हूँ.. उसे प्रकट कर देता हूँ ... फुरसत में ...बाद में अलंकारों को भी खोज लेता हूँ.... यही मेरे मनोरंजन के साधन हैं...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

मित्र रोहित ....भावाभियक्ति को ---- भावाभिव्यक्ति पढ़िएगा..

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

लगाव से
विलगाव तक का 'गाव'... beautiful!!