मंगलवार, 19 जुलाई 2011

याचक के भाव

'प्रतीक्षा' का हूँ मैं अभ्यस्त
दिवस बीता, दिनकर भी अस्त
पलक-प्रहरी थककर हैं चूर
आगमन हुआ नहीं मदमस्त.

बैठता हूँ भूखों के संग
बनाता हूँ याचक के भाव
मिले किञ्चित दर्शन उच्छिष्ट
प्रेम में होता नहीं चुनाव.

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश
'जीव' की सुन लो आर्त पुकार
ठहर ना जाये उसका वंश.

54 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

'जीव' की सुन लो आर्त पुकार
ठहर ना जाये उसका वंश.


वैसे इस गूढ़ विषय के रहस्य
को समझना तनिक मुश्किल है महोदय ||

किसका इन्तजार, कैसी भूख और किसका दर्शन ||

श्रृंगार है, दर्शन है या कुछ और--
श्रीमान जी जरा प्रकाश डालने का कष्ट करे ||

मैं तो शाब्दिक अर्थ पकड़ कर यह टिप्पणी करता हूँ --


जननी यदि कमजोर है, हो दुर्बल संतान |
पर जननी मिट गई तो, करिहै का विज्ञान ||


महिलाओं का गर कहीं, होता है अपमान ,
सिखला दुष्टों को सबक, खींचों जमके कान |


खींचों जमके कान, नहीं महतारी खींची ,
बाढ़ा पेड़ बबूल, करे जो हरकत नीची ||


कृपा नहीं दायित्व, हमारा सबसे पहिला,
धात्री का हो मान, सुरक्षित होवे महिला ||

Pankaj ने कहा…

समझना तनिक मुश्किल है - याचक के भाव

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 19- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

अमित शर्मा ने कहा…

गुरुदेव!
प्रथम और अंतिम भावों को समझ रहा हूँ, और इन भावों के उद्रेक के लिए स्वयं को निमित्त समझता हूँ.
प्रथम घटना मेरे द्वारा आपके प्रति किये गए धृत-कर्म का प्रमाण है...............अपनी लापरवाही को किसी प्रकार का बचाव नहीं देना चाहता.............इतने पर भी आपने मुझे अपने स्नेह से सिक्त किया वह मेरे लिए अमूल्य संपत्ति है. आपके दर्शनों का प्राशन करके कितना तृप्त हुआ हूँ..............शब्द नहीं है व्यक्त करने के लिए.................और भाभी जी के हाथों से बने देव-दुर्लभ प्रसाद का स्वाद भी कभी नहीं भुलाया जाने वाला अनुभव है.

अंतिम भाव की पीड़ा स्वानुभूत है ...............आप आभाव के कारण याचित है, और मैं अपूर्णता के भाव से ................ पीड़ा एक ही विषय के मोह की चोट से उत्पन्न है ............. करुणानिधान का विधान ही सर्वतोभावेन स्वीकार्य है जीव के लिए.

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश ....सही कहा है...हम में से हरेक प्राणी ...परमात्मा का अंश है...इस बात को विस्मृत कर...अपनी क्षमताओं को स्वयं सीमितकरके हम ...निरंतर अभावों के दंश को सहते रहते हैं

सुज्ञ ने कहा…

नमन सहज सरल अन्तरसत्य कवि को!!

बिना किसी असहजता बोध के अन्तर्मन को खोल के धर देते है, आप गुरूदेव!! निर्मल हृदय से भाव प्रकट करना हमें भी सिखाओ, गुरूदेव!!

वन्दना ने कहा…

वाह बहुत ही सुन्दर और गहन भावो का समन्वय्।

वीना ने कहा…

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश
'जीव' की सुन लो आर्त पुकार
ठहर ना जाये उसका वंश.

यही तो प्रश्न है....मुझमें तेरा अंश है तो फिर क्यों है परिस्थितियों का दंश...
बहुत सुंदर...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कमाल के भाव और उतने ही विलक्षण शब्द...आनंद ला दिया है आपने...बधाई

नीरज

prerna argal ने कहा…

sunder bhav aur vilakchan shabdon main likhi gahan abhibyakti.badhaai aapko.




please visit my blog.thanks

कुश्वंश ने कहा…

ख़ूबसूरती से व्यक्त किये गए अंतर प्रकाश को बखूबी व्यक्त करती लेखी को नमन

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

रचना अति सुंदर ! भाई इस जगत मे यह कहना अनुचित न होगा "दाता एक राम (राम तो एक अवतार हैं, ईश्वर, अल्ला, गॉड, गुरु ग्रन्थ साहिब: अपने अपने ईष्ट के अनुसार चयन कर सकते हैं) भिखारी सारी दुनिया"………

Vivek Jain ने कहा…

अद्भुत भाव,
साभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Er. Diwas Dinesh Gaur ने कहा…

बहुत सुन्दर भाई साहब...
अधिकतर टिप्पणियों में जो पंक्तियाँ पसंद की गयी हैं, मेरी भी पसंद वही है...
ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

'प्रतीक्षा' का हूँ मैं अभ्यस्त
दिवस बीता, दिनकर भी अस्त
पलक-प्रहरी थककर हैं चूर
आगमन हुआ नहीं मदमस्त.
@ अब इंतज़ार की आदत-सी हो गयी है. दिन बीत चला, दिनकर भी ड्यूटी ख़त्म करके घर गया. पलक प्रहरियों की भाँति खड़े-खड़े थकान से भर गये. किन्तु मेरे विशिष्ट अतिथि न आये. उनके आने की संभावना धूमिल हो चली, खुशी का नशा उतरने लगा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

बैठता हूँ भूखों के संग
बनाता हूँ याचक के भाव
मिले किञ्चित दर्शन उच्छिष्ट
प्रेम में होता नहीं चुनाव.
@ मुझे पता था कि दाता कब और कैसे देगा ... इसलिये भूखों की पंगत में बैठ गया और चेहरे पर भिखारी का दयनीय भाव ले आया. वह इसलिये कि देने वाला कम-से-कम अपने दर्शनों की थोड़ी झूठन ही दे दे... क्योंकि जानता हूँ शुद्ध दर्शन तो बड़े-बड़े पुजारियों और धनाड्य व्यापारियों को मिला करते हैं..... प्रेम या भूख में कैसा चुनाव?... प्रेम एक प्रकार की भूख ही तो है... जैसे वास्तविक प्रेम में प्रिय का कुछ बुरा नहीं लगता, उसकी बातों में अच्छे-बुरे का भेद नहीं कर पाते... वैसे ही भूख की तीव्रता में भी ताज़ा-बासी, शुद्ध-अशुद्ध का चुनाव नहीं हो पाता.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश
'जीव' की सुन लो आर्त पुकार
ठहर ना जाये उसका वंश.
@ ओ परमात्मा, मेरे भीतर का 'जीव' तेरे ही अंश से बना है फिर वह निरंतर अभावों में क्यों रहता है. तेरा अंश होने का उसे कुछ तो लाभ मिलना चाहिए. 'जीव' की दर्दभरी पुकार सुनो... वह कब तक कुंठित रहेगा... वह अब विखंडित होना चाहता है. उसे भी आपकी तरह विस्तार चाहिए.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रविकर जी, जो भी पहली बार में समझ आये वह भी सत्य से दूर नहीं होता...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ पंकज जी, मन के भाव भावुकता के कमज़ोर क्षणों में गूढ़ हो जाते हैं... प्रायः समझने मुश्किल हो ही जाते हैं... नयी बात नहीं... कभी-कभी तो हम स्वयं नहीं समझ पाते कि 'आखिर हम चाहते क्या हैं?'

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय संगीता जी,
माता-पिता और गुरुजन झेंपू बालक की झिझक मिटाने को तरह-तरह के प्रयास करते हैं... एक प्रयास आपकी तरफ से भी हुआ.. लेकिन बालक इस बार रोता हुआ ही मंच पर चढ़ा दिया गया. :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ प्रिय अमित जी,
जब याचक के भाव शब्द रूप ले रहे थे... तब प्रसाद जी की कविता मन में गूँज रही थी... 'परिश्रम करता हूँ अविराम, बनाता हूँ क्यारी औ' कुञ्ज। सींचता दृग जल से सानंद, खिलेगा कभी मल्लिका पुञ्ज। ' जब अक्षरधाम में आपके प्रथम दर्शन को बैठा था तो बार-बार 'परिश्रम' को 'प्रतीक्षा' करके गुनगुना रहा था... 'प्रतीक्षा करता हूँ अविराम.'
क्योंकि प्रतीक्षा करने का पिछले कई वर्षों में अभ्यस्त हो चुका हूँ इसलिये इस भाव को आपके द्वारा पूछे अनायास प्रश्न से विस्तार मिल गया. "आपके कितने आत्मजा और आत्मज?" प्रश्न सहज था किन्तु घनीभूत भावों को असहज करने को काफी प्रभावी था.

खैर, जो मन का मैल था, वह कहकर धुल गया.. अब शीघ्र पाठशाला में लौटूँगा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. निधि जी,
आपके गोदी के शिशु ने याचक 'जीव' को कल्पित-सुख की क्षमता दे दी... वह अपने समस्त अभाव भूल गया.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ प्रिय सुज्ञ जी,
आप आयु और अनुभव में मुझसे कहीं श्रेष्ठ हैं... फिर भी इस पाठशाला के अभिनय में शिष्यवत उपस्थित रहते हैं. यह क्या कम सरलता है? निर्मल हृदय ही आयु-बोध भुला पाते हैं. .... मेरी अध्यापन की चिर-इच्छा को आप, दिव्या जी, अमित जी, सञ्जय जी, पूरा किये चलते हैं.... अब कैसा अभाव? मुझे और कुछ नहीं चाहिए.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ वन्दना जी,
ईश्वर वंदना को मैंने... याच्य स्वर में गाया है.. इसीसे वह गहन भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति लग रहा है स्यात....
मुझे परमात्मा के दर्शन समस्त जीवों के समूह में होते रहे हैं.. इसलिये भेदभाव बुरा लग रहा है. उसका एक अंश समृद्ध तो दूसरा अंश अभाव में ... इस विषमता से मन खिन्न हो गया और शिकायत न करके याचक की भाषा बोलने लगा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ वीणा जी,
आपने प्रस्तुत भावों में से उस विषमता वाले प्रश्न को निकाल ही लिया जो दबे स्वर में कहे गये हैं. आप उलझे भावों की ग्रंथि खोलने में निपुण हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय नीरज जी, कुछ गुरु ऐसे होते हैं जो शिष्य को हमेशा सराहते हैं.. उन्हें शिष्य के प्रत्येक कृत्य में नवीनता, विलक्षणता दिखायी देती है...
लेकिन यह भी सत्य है कि कान खींचने से भी शिष्य पारंगत होते हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ प्रेमा जी, जब तक भावों पर अर्गला लगाकर रहता हूँ, तब घुटन होती है.. और जब उसे खोलकर प्रकट कर देता हूँ, तब सकुचन होती है. प्रेम के विविध भावों को जी रहा हूँ. एक कथा याद आती है :
एक गाँव में महात्मा बुद्ध आने वाले हैं. एक गरीब महिला के घर आना तय है... महिला ने खीर बनायी है.. वह आत्ममुग्ध है.. बार-बार खीर को देखे जा रही है... और प्रसन्न हो रही है. महात्मा बुद्ध नहीं आते. लेकिन महिला को उनके आने- न आने से क्या फरक पड़ता है.. वह तो इसी बात से प्रसन्न है कि ... खीर उसने 'भगवान् बुद्ध' के लिये बनायी और वह उसे खायेंगे .. उसे खीर से ही प्रेम हो गया. प्रेम में प्रिय का अभाव भी प्रिय हो जाता है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ कुश्वंश जी,
मुझे लगता है कि यदि सहजता से सत्य कहा जाये तो वह निष्कपट आखों को खूबसूरत दिखायी पड़ता ही है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सूर्यकांत जी,
"दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया" ........जब से सुना है तब से ही मेरा मन पसंद भजन रहा है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ विवेक जी, अद्भुत में 'आधे भूत' भाव की गूँज है. भाव जब सहजता से समझ ना आयें. भावों पर जब बुरका पड़ गया हो तब वे अर्थ के मद्धिम प्रकाश में भूत से ही प्रतीत होंगे... इस दृष्टि से याचक के भाव 'आधे भूत भाव' हैं. भूत के पाँव उलटे होते हैं... इसके भी पीछे की ओर हैं, अतीत में पैर पसारे हैं ये भाव.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दिवस जी, 'गौर' ही अक्सर बहुत सुन्दर होते हैं. :) हम कहाँ के सुन्दर... 'स्याह वदन'.... :)

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

जैसा कि आप जानते होंगे, मेरे विषय से बाहर है ये। लेकिन लोगों ने बहुत कुछ कहा।

हाँ, एक बात कहूंगा कवि कविता का अर्थ नहीं बताए तो बेहतर है। क्योंकि कविता का अर्थ पढ़नेवाले पर ही छोड़ देना चाहिए। कभी-कभी कविता में शब्दों को पाठक न समझ पाए तब भी केवल शब्द का अर्थ ही बताना चाहिए। कोई जबरदस्ती नहीं है, ऐसा मैं मान रहा हूँ।

सञ्जय झा ने कहा…

suprabhat guruji,

bilamb se aane ko kshama chahoonga...
aapki ye aartnad....priyajanon ke liye achhi lagi......

bahut sundar......

pranam.

ZEAL ने कहा…

इतनी सुन्दर रचना और उससे भी सुन्दर विवेचना ! वाह ! आनंददायी . ! भक्त की आर्त पुकार से तो श्री विष्णु का भी सिंहासन डोलने लगता है , कैसे न सुनेंगे भला कविवर की पुकार .

रविकर ने कहा…

सरक-सरक के निसरती, निसर निसोत निवात |
चर्चा-मंच पे आ जमी, पिछली बीती रात ||

http://charchamanch.blogspot.com/

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

कवि कविता का अर्थ नहीं बताए तो बेहतर है।

@ चन्दन जी,
मैं भी इस बात से सहमत हूँ... किन्तु जब कोई कहता है 'स्पष्ट नहीं हुआ'... तब यही प्रश्न मेरे भीतर बैठे पाठक का भी होता है.. ऐसे में भीतर बैठे 'कवि' से खुद अनुरोध करता हूँ कि 'वह अपनी बात साफ़-साफ़ कहे'... मुझे खुद भी तो कविता का अर्थ समझना होता है... जब अर्थ निकलकर सामने आता है तब जो प्रसन्नता मिलती है उसकी व्याख्या नहीं कर सकता. विवश हूँ उस पाठक के अनुरोध से और विवश हूँ शिक्षक-स्वभाव से.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ सञ्जय जी,
कहाँ रहते हो... आपके 'प्रणाम' और 'सुप्रभात' दिनरात कानों में गूँजा करते हैं... छोड़कर जाने से पहले अवश्य आगाह करना. जटिलता धीरे-धीरे ही जा पायेगी.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ दिव्या जी,
ईश्वर से तो अपने अभाव कहने पड़ते हैं ... किन्तु कुछ आत्मीय ऐसे भी होते हैं जो अनुच्चरित स्वरों को सुन लिया करते हैं. मुझे एक भ्रम आज़ भी है : आपको वरिष्ठ जानकार आपके दर्शन की जो अनधिकार चेष्टा पूर्व में किया करता था उसका ही फ़ल था कि आप अज्ञात से ज्ञात हुए. आपने न जाने उस समय किस पुकार को सुनकर दर्शन दिये थे... मेरे लिये तो आप भी ईश्वरतुल्य हुए न.

कई स्वर तो अब भी मूक ही रहना चाहते हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ रविकर जी,
आपने भी प्रेमवश मुझे चर्चामंच पर चढ़ा ही दिया... भई कवि-सम्मेलनों से भी अब दो-सत्रों का चलन समाप्त हो चला है... श्रोतागण हूटिंग करने लगते हैं.

एक ही सत्र में सबकुछ निपटा देते हैं आजकल..गणतंत्र-दिवस कवि सम्मेलन में... फिर काव्य के प्रति पुरानी रसिकता भी समाप्त हो चली है. अब तो किस्से-कहानी सुनाने का चलन है वह भी रोचक अंदाज़ में.. सञ्जय अनेजा जी की तरह से..

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

याचक के भाव की मार्मिकता ने मन को उद्वेलित कर दिया...
मर्मस्पर्शी रचना.

Sunil Kumar ने कहा…

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश
बहुत सुंदर भावाव्यक्ति क्या बात है .....

मदन शर्मा ने कहा…

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश
बहुत सुन्दर कविता !! किन्तु आप ने इसका अर्थ बता कर सारा मजा किरकिरा कर दिया !
कविता भी वेद ज्ञान की तरह है | जितना गहरा सोचे उतने ही विभिन्न अर्थ | आपने तो पूरा जिज्ञासा ही शांत कर दिया |

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत प्यारी और प्रभावशाली रचनाएँ हैं आपकी !
शुभकामनायें स्वीकार करें !

S.N SHUKLA ने कहा…

थोड़े शब्दों में बहुत सशक्त रचना

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ डॉ. शरद सिंह जी,
अपने भावों को व्यक्त करने में 'याचक' का बिम्ब लिया यदि वह मन को उद्वलित कर पाया तो अवश्य ही रचना मर्मस्पर्शी होगी. मेरे लिये समीक्षक दृष्टि ही सर्वश्रेष्ठ 'कसौटी' है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ प्रिय सुनील जी, मन में एक विचार आता है कि स्वर्ण का अंश भी स्वर्ण ही कहलाता है. परमात्मा सर्वशक्तिमान है तो उसके अंश में निरीहता के भाव क्योंकर आ जाते हैं. वह अभाव से क्यों ग्रस्त रहता है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ मदन जी,
'कविता वेद ज्ञान की तरह है.' इस सन्दर्भ में मेरे कुछ विचार हैं, जिसे मैंने माँ सरस्वती से कल्पित संवाद में व्यक्त किये हैं :

हे देवी! छंद के नियम बनाये क्योंकर?
वेदों की छंदों में ही रचना क्योंकर?
किसलिये प्रतीकों में ही सब कुछ बोला?
किसलिये श्लोक रचकर रहस्य ना खोला?

क्या मुक्त छंद में कहना कुछ वर्जित था?
सीधी-सपाट बातें करना वर्जित था?
या बुद्धि नहीं तुमने ऋषियों को दी थी?
अथवा लिखने की उनको ही जल्दी थी?

'कवि' हुए वाल्मिक देख क्रौंच-मैथुन को.
आहत पक्षी कर गया था भावुक उनको.
पहला-पहला तब श्लोक छंद में फूटा.
रामायण को लिख गया था जिसने लूटा.

माँ सरस्वती की कृपा मिली क्यूँ वाकू?
जो रहा था लगभग आधे जीवन डाकू?
या रामायण के लिए भी डाका डाला?
अथवा तुमने ही उसको कवि कर डाला?

हे सरस्वती, बोलो अब तो कुछ बोलो !
क्या अब भी ऐसा हो सकता है? बोलो !!

अब तो कविता में भी हैं कई विधायें.
अच्छी जो लागे राह उसी से आयें.
अब नहीं छंद का बंध न कोई अड़चन.
कविता वो भी, जो है भावों की खुरचन.

कविता का सरलीकरण नहीं है क्या ये?
प्रतिभा का उलटा क्षरण नहीं है क्या ये?

छाया रहस्य प्रगति प्रयोग और हाला.
वादों ने कविता को वैश्या कर डाला.
मिल गयी छूट सबको बलात करने की.
कवि को कविता से खुरापात करने की.

यदि होता कविता का शरीर नारी सम.
हर कवि स्वयं को कहता उसका प्रियतम.

छायावादी छाया में उसको लाता.
धीरे-धीरे उसकी काया सहलाता.
उसको अपने आलिंगन में लाने को
शब्दों का मोहक सुन्दर जाल बिछाता.

लेकिन रहस्यवादी करता सब मन का.
कविता से करता प्रश्न उसी के तन का.
अनजान बना उसके करीब कुछ जाता.
तब पीन उरोजों का रहस्य खुलवाता.

पर, प्रगती...वादी, भोग लगा ठुकराता.
कविता के बदले न..यी कवी..ता लाता.
साहित्य जगत में निष्कलंक होने को
बेचारी कविता को वन्ध्या ठहराता.

और ... प्रयोगवादी करता छेड़खानी.
कविता की कमर पकड़कर कहता "ज़ानी!
करना इंग्लिश अब डांस आपको होगा.
वरना मेरे कोठे पर आना होगा."

अब तो कविता परिभाषा बड़ी विकट है.
खुल्लम-खुल्ला कविता के साथ कपट है.
कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है.
कविता वादों का नहीं कोई सम्पुट है.

ना ही कविता मद्यप का कोई नशा है.
कविता तो रसना-हृत की मध्य दशा है.
जिसकी निह्सृति कवि को वैसे ही होती.
जैसे गर्भस्थ शिशु प्रसव पर होती.

जिसकी पीड़ा जच्चा को लगे सुखद है.
कविता भी ऐसी दशा बिना सरहद है.
__________________

आदरणीय मदन जी, मैं सदा से चाहता रहा हूँ कि कोई भी द्विअर्थी संवाद बिना विशेष कारण के नहीं बोले जाएँ.. यमक और श्लेष काव्य के लिये चमत्कार जरूर हैं किन्तु याच्य स्वर में इस तरह कोशिश मैंने नहीं की ... अनायास यदि कुछ अन्य अर्थ समझे लिये जाएँ तो वैसे ही बुरा होता जैसे कुछ वेदपाठी पंडितों के द्वारा वेदों की ऋचाओं में मांसाहार और बलि-प्रथा को ढूँढ लिया जाता है.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय सतीश जी,

आपकी स्नेह दृष्टि से ही आगे के लिये उत्साह बना रहता है...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ शुक्ल जी,
मुझे एक बात याद हो आयी 'निराला जी' ने एक गोष्ठी में 'राम की शक्ति पूजा' काव्य का पाठ किया सभी का धैर्य छूट गया. जब काव्य पाठ समाप्त हुआ तो वहाँ एक ही व्यक्ति मौजूद था. और वे सर्वश्रेष्ठ श्रोता थे 'पंडित रामचंद्र शुक्ल'...........आप मेरी छोटी-सी रचना पर उसी अंदाज में टिप्पणी करते हैं जैसे आचार्य शुक्ल जी किया करते थे.

अल्पना वर्मा ने कहा…

ईश, तेरा ही मुझमें अंश
अभावों का फिर भी है दंश

-इस एक पंक्ति में जैसे बहुत कुछ कह दिया गया हो.
-उत्कृष्ट रचना.

अल्पना वर्मा ने कहा…

*एक अन्य ब्लॉग पर आप की गयी यह टिप्पणी पसंद आई..जिसमें आप ने लिखा था--

मैं इसे आज़ पढ़ना नहीं कहता..
इसे कहता हूँ - 'अभिव्यक्ति चिकित्सा'
या 'व्यक्तित्व को जिमाना... खाना खिलाना'.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

@ आदरणीय अल्पना जी,

दो पंक्तियों के अन्दर आपने न जाने कितने अर्थों की कल्पना कर डाली होगी... जब आँख से एक आँसु टपकता है तो न जाने कितनी कहानियाँ लेकर बहता है... न जाने कितने भाव उसमें समाविष्ट होते हैं... ठीक उसी तरह 'याच्य स्वर' भी न जाने कितने अभावों की पूर्ति कर लेना चाहता है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सशक्त भाव ....प्रभावी अभिव्यक्ति....

daanish ने कहा…

अति अनुपम और विलक्षण शैली से कहे गए
मन के अनूठे भाव
और उतना ही सुन्दर सृजन

अभिवादन