शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

किया कवि का तुमने अपमान

अरी ओ विष कन्या नादान. 
चली वापस जा तू आपान. 
नहीं पा सकती अब तू पार. 
चाहे कर ले षोडश शृंगार. 

जबरदस्ती अधरों का पान. 
किया कवि का तुमने अपमान. 
इंदु-सी लगती, मद्य-स्नात!
बिंदु का होगा वज्राघात. 

बंदनी छीन बिंदु पी आज. 
चिता चिंता की देगी साज. 
बिंदु बोलेगी - आओ बाज 
अरी मैं ही तेरी सरताज. 

2 टिप्‍पणियां:

ZEAL ने कहा…

कवि के पास तो उसकी लेखनी कि अद्भुत , अपार शक्ति होती है । इसलिए विषकन्या कवि का कुछ नहीं बिगाड़ सकती ।

वीरेंद्र सिंह ने कहा…

बेहद सुन्दर कविता.............