मंगलवार, 11 जनवरी 2011

मौन रहने से बिगड़ गई

मौन रहने से बिगड़ गई 
बात, जो चार दृगों के बीच 
नेह की करती थी सृष्टि 
देह से दूर रही दृष्टि. 

कौन दोनों के बीच नयी  
प्रेम की करवाये संधी*.
ग़लतफहमी दोनों के बीच 
फैसला करती, बन अंधी. 

न्याय पावेगा सच्चा कौन 
खड़े हैं दोनों ही निर्दोष. 
दंड भुगतेगा इसका कौन 
छिपे हैं दोनों के ही कोष. 

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संधी — सही रूप 'संधि' है. 
[यह रचना सितम्बर १९९१ की है, पुरानी डायरी देख आज मुझे याद आ गयी, अब सबके सामने है.]

[रस-छंद-अलंकारों पर नयी सामग्री कुछ समय बाद आ पायेगी, तब तक इस झलक का ही प्राशन करें. 
सम्पूर्ण दर्शन बाद में दिया जाएगा.]

13 टिप्‍पणियां:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

sundar geet !

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

बेहद ही ख़ूबसूरत और एक मुकम्मल रचना. इसी आशा के साथ कि आपकी कलम से हम ऐसे ही सरोबार होते रहेगे. सादर आभार !

सुज्ञ ने कहा…

धीर-गम्भीर रचना, आनंद आ गया ! यह पुरानी पर लगती है नई नई सी।

Rahul Singh ने कहा…

कब तक चलेगा छिपा-छिपी का खेल.

sanjay jha ने कहा…

suprabhat guruji

bahut sundar.....

pranam.

M VERMA ने कहा…

ग़लतफहमी दोनों के बीच
फैसला करती, बन अंधी.
गलतफहमियाँ निर्णायक हो जाती हैं

सुन्दर रचना

सुज्ञ ने कहा…

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उतरायाण: मकर सक्रांति, लोहड़ी, और पोंगल पर बधाई, धान्य समृद्धि की शुभकामनाएँ॥
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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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अरुण जी
आपने मेरे भावों का संगीत पहचान लिया. धन्यवाद उसे गीत कहा. क्योंकि मैं इसे अक्सर गुनगुनाता हूँ.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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नरेन्द्र जी
आपके इस विश्वास से मेरा मनोबल बना रहेगा. प्रयास करूँगा ह्रदय के छिपे भावों को शब्द दे पाऊँ.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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सुज्ञ जी,
आप मौसम वैज्ञानिक हैं, हवा किस दिशा में बह रही है .. जानते हैं.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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छिपा-छिपी का खेल तब तक चलेगा जब तक अभीष्ट को ढूँढ न लूँ.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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संजय जी,
आपके प्रेम भरे स्वर से अभीभूत रहता हूँ.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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वर्मा जी,
ग़लतफहमियाँ प्रायः निर्णायक के आसन पर बैठ फैसला सुनाती देखी गई हैं.
अपेक्षाएँ जब हद से अधिक हो जाएँ तब गलतफहमियों की ही पदोन्नति होती है.
आभारी हूँ आपके आगमन का.

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