बुधवार, 10 नवंबर 2010

तिलक हस्त


वो तिलक हस्त 
मस्तक तक आ 
आनंद दे गया था मुझको. 
बेझिझक ताकते 
थे दो चख 
आशी देते मानो हमको. 

थे रिक्त हाथ  
दो टूक बात 
मैं बोल नहीं पाया तुमको. 
हो चतुर आप 
कर बिन अलाप 
छीना तुमने मेरे मन को. 


['दौज-तिलक' जब मैंने काल्पनिक तिलक-हस्त से करवाया और निरंतर ताकते नेत्रों से आशीर्वाद पाया.]

प्रश्न : हम 'सीधी बात' के लिये 'दो टूक' शब्द-पदबंध का प्रयोग क्यों करते हैं? 

24 टिप्‍पणियां:

sanjay ने कहा…

suprabhat gurugji.....

ati-sundar kavya......

iske poorv ke path ka vishleshan jitne me apne ki oos se kam me
vishaya spasht nahi ho pata....isiliye maine sankshipt bataya.....(ye mandir hai...yahan
vyanga...sayad mai kuch galat kah
gaya....kshma karen)

pranam

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

सुन्दर कविता !

काफी देर सोचा पर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाया की हम "सीधी बात" को "दो टूक बात" क्यों कहते हैं. अब तो अपने भी दो चख तकते आपको.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

संजय जी,
आपने ग़लत नहीं कहा था. बस मैं उसे व्यंग्य मान बैठा था. आपने स्पष्ट कर मुझमे अगली कक्षा लेने के लिये उत्साह भर दिया.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

मित्र दीप,
कई संस्कृत शब्दों की निष्पत्ति ध्वनिपरक है. बहुत से क्रियात्मक शब्दों की धातुओं का उत्स 'ध्वनि' है.
जैसे पेड़ से पत्ता गिरा, आवाज़ हुई पत, [एकदम सुनसान और शांत प्रदेश में जब उसकी ध्वनि सुनी जाए, तो ऎसी ही कुछ ध्वनि आती है....... पत या फत.]
इस ध्वनि से 'पत' धातु निर्मित हुई, जो नीचे गिरने का अर्थ लिये है. पतन, पतित, पत्ता या पत्र [जो अंततः नीचे ही गिरता है, जिसकी परिणति नीचे गिरना ही है}
इसी तरह के अन्य शब्दों पर विस्तार से कभी और चर्चा करेंगे.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

फिलहाल आपको 'सीधी बात' के लिये 'दो टूक' का अर्थ बताता हूँ.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

लेकिन नहीं, अभी नहीं, सभी विद्यार्थी निवृत होकर आ जाएँ पहले. फिर बताएँगे.
कहीं जाइयेगा नहीं.

..

ZEAL ने कहा…

सुन्दर रचना - आभार !

sanjay ने कहा…

suprabhat guruji


gurukul ke pratham-kshtra(moniter)
kahan hain.....sabhi ko nivrit kar
agli kaksha ka prarambh karen...


pranam.

सुज्ञ ने कहा…

गुरुजी,

यह क्या माज़रा है, शाला में तो छोटे छोटे पाठ पढाते हो और बाहर जाकर (टिप्पणियों) फ़ेक्ल्टी रूप में बडे बडे पाठ पढा आते हो?

राज क्या है गुरूजी?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

कविता का अर्थ :
मेरी कल्पना में किसी ने मेरे मस्तक पर तिलक लगाने को हाथ बढाया तो मुझे जो आनंद मिला वह अदभुत था.
बिना संकोच के दो नयन मुझे निरंतर ताक रहे थे ऐसा लग रहा था मानो वे मुझे आशीर्वाद देते हों.

मैंने अपने माथे पर तिलक तो लगवा लिया पर उन्हें उपहार देने को मेरे हाथ खाली थे.
लेकिन मैं कुछ न दे पाने की असमर्थता वाली सीधी बात उनसे कह नहीं पाया.
पर वे चतुर थे उन्होंने बिना शब्द किये [चुपचाप] मेरे मन को मुझसे छीन लिया.
यह उनका अधिकार भी था.
..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

'दो टूक' का अर्थ :

हम 'टूक' शब्द का प्रयोग टुकड़े के लिये करते हैं.
दो टूक का मतलब है ..... दो टुकड़े

जब हम किसी वस्तु के दो टुकड़े करते हैं तब जो कोण बनता है वह 180 डिग्री का होता है.
हम चाहे जैसे भी दो दुक करें १८० डिग्री ही का कोण बनेगा. जबरदस्ती आप चाहे कोण आड़ा-तिरछा भी करना चाहें तो भी ध्यान दें तो पायेंगे कि वह सरल [सीधा] कोण ही बन रहा है. आप चाहें रोटी को या कागज़ को दो टूक करें हाथों की स्थिति लम्बवत या समानांतर सरल कोण ही बनाएगी. यह भी ध्यान रहे कि दोनों टुकड़े बराबर-बराबर होने चाहिए.
हम किसी वस्तु को गिर कर यदि टूटते देखते हैं. तब भी यदि वस्तु तो टूक होती है तो दूसरा टुकड़ा पहले टुकड़े से १८० डिग्री कोण पर ही दिखायी देगा. हाँ यदि वस्तु के टुकड़े कई हुए हैं तो सभी के कोण भिन्न होंगे. तब हम दो टूक वाली बात 'सीधी बात' के लिये नहीं फिट कर सकते.

सीधी बात को 'दो टूक' के रूपक से बाँधना प्रारम्भ से मनुष्य की कल्पनाशीलता और चित्रात्मकता से बातों को समझने की कोशिश रही है.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

दिव्या जी,
सुन्दर रचना - आभार !
@ आपकी प्रतिक्रिया में अनुप्रास का छठा भेद है.

सुन्दर का अंत 'र' पर हुआ और 'र' से दूसरा शब्द 'रचना' शुरू हुआ और वह 'ना' पर ख़त्म हुआ 'ना' में 'आ' छिपा है 'आ' से आभार शुरू हुआ.
आपकी प्रतिक्रिया पर मुझे विस्मय हुआ. अंत में विस्मय चिह्न जो लगा है. मन विस्मय के साथ उस योजक चिह्न पर जा बैठा है जो आपने प्रशंसा में आभार के पहले बिछा दिया है.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

संजय जी,
मेरे मार्गदर्शक छात्र मुझे दिशा दिखा मुझसे रुष्ट हो, न जाने किन कार्यों में व्यस्त हैं. मैं अपने प्रेम को प्रचलित शब्दों में दर्शाता नहीं ना! इस कारण वे मुझसे दूरी बना रहे हैं. ईश्वर की यही इच्छा है. मैं तो इस पाठशाला की दीवारों को भी पढ़ा कर अपने शिक्षक होने की भूख मिटा लूँगा. वे शायद किसी समस्या में हों जिसे स्वयं सुलझाने में लगे हों. यही एक बात है मेरे साथियों में कि वे अपने दुःख अपने तक ही रखते हैं. अपने कष्टों में हिस्सेदार ना बनाना उनका गुण है.
मैं भी नहीं पूछूँगा ..... शायद कष्ट अत्यंत निजी हो... इस कारण. शुभेच्छा ही कर सकता हूँ.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

सुज्ञ जी,
मैंने काफी समय से आपका गृहकार्य भी नहीं देखा. आज़ खोले बैठा हूँ. 'द्वेष की गाँठ' आदि लेख पढ़ने हैं.
प्रायः टीवी पर उन समाचारों को अधिक देखा जाता है जो जन-समस्याओं से जुड़े होते हैं, विवादास्पद मुद्दों से जुड़े होते हैं, टांग-खिंचायी वाले होते हैं, किसी की पोल खोलने वाले होते हैं. मैं भी उन समाचारों को अधिक देखने लगा हूँ.
आस्था और श्रद्धा चेनलों पर जाने का अवसर ही नहीं मिलता. जन-समस्याओं से जुड़े चेनलों पर जब जाता हूँ तो वहीं बैठ जाता हूँ. इसलिये वहाँ मेरी बातें [टिप्पणियाँ] लम्बी हो जाती हैं. क्या करूँ? मेरी भी कुछ कमजोरियाँ हैं. जो छोड़े नहीं छूटतीं.

..

सुज्ञ ने कहा…

आभार, गुरुजी,

आपने स्पष्ठ किया, हमने एक सुंदर सा सबक़ पा लिया।

अमित शर्मा ने कहा…

गुरूजी प्रणाम !
खेद सहित क्षमा चाहता हूँ. आपको बिना बताये इतने दिनों अनुपस्थित रहा...............पर क्या करूँ "गृह कारज नाना जंजाला" ....................आशा है आप बालक की लापरवाही को भुला कर नया पाठ सिखाने का उपक्रम करेंगे. पुराने पाठों का दोहरान मैं extraa class में कर दूंगा.

सुज्ञ ने कहा…

गुरुजी,

मोनिटरी पुनः सौप दें,अमितजी को आगये!!

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

विद्यार्थियो!
आज़ कक्षा कुछ भरी-भरी सी लग रही है. आप अवकाश बहुत लेने लगे हो. लेकिन आपके अवकाश आलस्य में नहीं बीते यह जानता हूँ. मैं पिछले दिनों आप सभी के घर पर गया तो पाया — एक का घर मंदिर है. एक का घर शास्त्रार्थ-भवन है. एक का घर बहुत-सी व्याधियों को ठीक करने का चिकित्सालय है. एक का घर 'कासे कहूँ' .... सालभर से बंद पड़ा है और एक विद्यार्थी अपनी बिना पहचान दिए खिड़की से झाँककर भाग जाता है. उसका घर तो मेरी स्मृति में ही हो गया है.
मेरा इतने दिनों दर-दर भटकना अपने प्रिय विद्यार्थी की तलाश में था. कहीं तो मिलता, लेकिन कहीं नहीं मिला. और अब आकर चुपचाप बैठ गया है. अगला पाठ शीघ्र पढ़ाया जाएगा.

..

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

सुज्ञ जी,
अवकाश का ईनाम नहीं दिया जाता, सजा होती है. उनकी यही सजा है कि वे सभी पाठ शीघ्रता से दोहरा लें.

..

सुज्ञ ने कहा…

गुरुजी,

अच्छा हुआ जब आपके चरण-कमल पडे घर सजे हुए थे। नैवध्य सामग्री से संतुष्ट तृप्त तो हुए न गुरुजी?

पुन: दर्शन दिजियेगा!!

sanjay ने कहा…

suprabhat guruji,

post likhne ke liye hum apne blog-page par jate hain to kya karte hain?

koi hindi-typin tool kaise load karen?

sarir aswashth hai sayad viral hai....

phir milte hain...

pranam.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

संजय उर्फ़ शैलेन्द्र जी,
आप अस्वस्थ हैं. वायरल है. जानकर दुःख हुआ.
आप घर आ जाओ. जितना आता है सब बता दूँगा.
तकनीकी क्षेत्र की जानकारी कुछ कम है.
बड़े भाईसाहब सतीश जी से पूछें तो वे सब बता देंगे.
मुझे वे ही बताते हैं जब कोई तकनीकी भूल करता हूँ.

..

sanjay ने कहा…

shradhye satish bhaijee ka koi contact no........

pranam.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

इ-मेल पहचान है मेरे पास सतीश जी की.
आपको चाहिए तो आप मेरे इ-मेल पर संपर्क करें तो अवश्य दे दूँगा.
मेरे ID :
pratul1971@gmail.com
pratulvasistha@gmail.com
pratulvasistha71@gmail.com

..