मंगलवार, 14 सितंबर 2010

शटल-चरित्र

है शुष्क नहीं बाहर का तल
ये समझ चुका है अंतस्तल. 
मैं तो भीतर की बात करूँ 
संवादों में ना है 'कल-कल'. 

'कल-कल का स्वर' जीवन हलचल. 
जो शुष्क हो रहा है पल-पल, 
पिघलेगा नहीं तो झेलेगा 
संवादों की बौद्धिक दलदल. 

दलदल का बाहर स्निग्ध पटल
दृग फिसल रहे, पग नहीं अटल. 
मनोरंजन ही करता 'चरित्र' 
बनकर दो रैकेट बीच शटल. 

एक नया रूपक : 
* 'स्त्री-बौद्धिकता' मतलब 'शटल चरित्र' 
जब कोई स्त्री बुद्धि-प्रधान बातें करती है. तब वह वैचारिक-भूमि पर पुरुष बुद्धियों के रैकटों के बीच शटल कोक की तरह मनोरंजन देती है.

** 'दलदल का बाहर स्निग्ध पटल' : 
एक दलदल ऎसी भी जिसकी ऊपरी परत फिसलन भरी हो और अंदरूनी दलदली हो. 
दोहरा नुकसान, हलकी हों तो जाने से फिसल जाएँ. भारी हों तो जाने से धँस जाएँ. 
पहले हलकी [दृष्टि] गयी, फिसल गयी.  
बाद उसके भारी-भरकम कदम बढ़े, वे भी धँस गये.

*** 'कल-कल का स्वर' जीवन हलचल.
.... इसे बाक़ी तीन पंक्तियों से अलग पढ़ना है, एक सूत्र की तरह. 

[दिव्या जी द्वारा पिछली पोस्ट में की गयी काव्य-टिप्पणी पर मेरी प्रतिक्रिया]

7 टिप्‍पणियां:

ZEAL ने कहा…

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@-एक नया रूपक :
* 'स्त्री-बौद्धिकता' मतलब 'शटल चरित्र'
जब कोई स्त्री बुद्धि-प्रधान बातें करती है। तब वह वैचारिक-भूमि पर पुरुष बुद्धियों के रैकटों के बीच शटल कोक की तरह मनोरंजन देती॥

पुरूषों की मानसिकता तो अनंत काल से अभी तक नहीं बदली। उनके लिए तो स्त्री उपभोग की वास्तु एवं मनोरंजन का विषय ही होती है।
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Pratul ने कहा…

# पुरूषों की मानसिकता तो अनंत काल से अभी तक नहीं बदली। उनके लिए तो स्त्री उपभोग की वस्तु एवं मनोरंजन का विषय ही होती है।
@ शायद सच है, नहीं पूर्णतया सच ही है.

"कुंठित है यौवन आज तपित मन काम अनल / हर पल चिंता रत जीवन कैसे जियें सरल/
हर विषय मनन से पूर्व करे मस्तिष्क वरण / नारी में बिन वस्त्रों की कल्पना का चित्रण।
उरु कसा पेंट हो विपर्यस्त परिधान वक्ष /
अथवा छोटे निक्कर के साथ बनियान, भक्ष / करने की सोचा करता हूँ नारी शरीर /
टिक जाते चख क्यों देख हरण द्रोपदी चीर।
टीवी में कनु के द्वारा उत्थित गोपी वसन /
नारी को नंगा देखन के अभ्यस्त नयन /
हो चुके, चाह कर भी न छूटती है आदत /
धर दिया ताक पर धर्म, पुण्य कर दिए विगत।
ले रहे श्वास अंतिम लटके हैं पाँव कबर /
फिर भी फिल्मी वृद्धों की जिह्वा लपर-लपर / करती स्ट्रक्चर देख बेटी का उत्तेजक /
लाते फिल्मों में दिखलाते उरु-वक्ष तलक।
फिल्मी निर्माता नव कन्या को दिखा सपन / मामला व्यक्तिगत ठहराता कर संग शयन / फैशन परेड में हो ऐय्याशों की जमघट / 'मोडल सुप्रीम' जजमेंट किया करते लम्पट।
है 'प्रतिस्पर्धा' आवश्यकता आधुनिक समय /
है सता रहा नारी को भी 'पिछडन' का भय / सो लगा दिया हैं दांव स्वयं का ही शरीर /
करवाने को तत्पर रहती खुद हरण-चीर।
क्षुद्रता प्रतिष्ठित करने का अब चला चलन /
है स्टिकी चेपी वाली नारी सम्मानित जन / 'उपभोग वस्तु' आवश्यकता होती मौलिक /
है भोगवादी कल्चर की नारी सिम्बोलिक।
मैं क्यों न कहूँ कटु उक्ति, देखता हूँ सब कुछ / अब नहीं हुवे संकोच देखने में दो कुच /
कर रहे श्रवन हैं आप, स्वयं करता वाचन / आनंद ले रहा स्यात आपका रमता मन।

ZEAL ने कहा…

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प्रतुल जी,
मेरा ये मानना है स्त्रियाँ जन्मजात-दासी एवं पुरुष जन्मजात-भेडिये होते हैं । लेकिन इसके कुछ अपवाद भी होते हैं। कुछ स्त्रित्रियाँ दासता से मुक्त होती हैं तो कुछ पुरुषों में देवत्व होता है। अब ये अपनी-अपनी समझ है की हम क्या बनना चाहते हैं, या दूसरों को क्या समझते हैं। वैसे स्त्री भावुक हो या बोद्धिक, दोनों ही स्थितियों में उसका स्थान एक पुरुष की निगाह में 'फ़ुटबाल' तथा 'शटल-कौक ' से ज्यादा कभी नहीं हो सकता। हर स्त्री इस निर्विवादित सत्य को जानती है , इसलिए वो अपनी जिंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर एक 'शिलालेख ' की तरह कोमल भावनाओं से विहीन हो जाती है।

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ZEAL ने कहा…

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शिलालेख को ' शुष्क शिला '** पढ़ा जाये

[correction]
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ashish ने कहा…

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पद तल में , क्षीर सिन्धु सी बहा करो जीवन के सुन्दत समतल में : "और अबला जीवन तेरी यही कहानी, अंचल में दूध आँखों में पानी " तो सुनकर लगता था की , स्त्री किसी और गृह की निवासी है या केवल उपभोग्या है . एक नारी की बुद्धिमता अगर का बोद्धिक पुरुषो के लिए कुपाच्य है तो , हम पुरुषो को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए .प्रतुल जी की टिपण्णी में सुशोभित कविता पढ़कर मन समाज की बीभत्सता का अनुमान लगा सकताहै.

Pratul ने कहा…

आशीष जी, इसे इस तरह कर लेना "..... पीयूष स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में." शीघ्रता में शायद त्रुटि हो गयी होगी.
# एक नारी की बुद्धिमत्ता अगर किसी बौद्धिक पुरुष के लिये कुपाच्य है तो हम पुरुषों को अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए.
@ मैंने वास्तविकता बयाँ की है. मित्र, मेरा प्रयास रहता है कि मैं स्वयं को केंद्र में रखकर [अपने माध्यम से] समाज की बीभत्सता को जग-ज़ाहिर करूँ.
जहाँ तक स्त्री-बौद्धिकता का प्रश्न है, पुरुष समाज में वह या तो सराही जाती है अथवा कटु आलोचना सहती है. दोनों ही प्रकार के पुरुष रैकट से खेलते नज़र आते हैं.
@ दूसरी बात, बौद्धिक स्त्री से अधिक आवश्यकता समाज को ममतामयी, कर्तव्य-समर्पिता, मननशीला, मितभाषी, मृदुभाषी एवं धीरा स्त्री की होती है.
@ तीसरी बात, उनका दायित्व यह क्या कम है कि वे अपनी संतान का लालन-पालन संस्कार सम्मत करें. अपनी विद्वता से वाचाल न बन जाएँ, प्रतिस्पर्धा में पड़कर संकीर्ण मानसिकता के पुरुषों के पीछे ही न पड़ी रहें.
@ अपशब्द का उत्तर कभी अपशब्द कभी नहीं होता.
@ पुरुषों में पुरुषत्व उसकी शोभा है. नारी में नारित्व उसकी शोभा है, यदि प्रतिस्पर्धा में पड़कर 'गाय' कुत्तों की तरह भौंकती नज़र आये या शेर की तरह शिकार करने लगे वह जँचेगा नहीं.
>>>>> आपने अपनी टिप्पणी में काफी अच्छी सोच रखी, भविष्य में आपकी समीक्षागत टिप्पणियों की प्रतीक्षा रहा करेगी.

मो सम कौन ? ने कहा…

एक बार फ़िर से अदभुत पंक्तियां, अदभुत भाव पढ़ने को मिले, आभार।