मंगलवार, 7 सितंबर 2010

हमने है ले लिया क्षणिक सुख

हमने है ले लिया क्षणिक सुख
देख आपको फिर प्रफुल्ल.
जब थे नयनों से दूर बहुत
यादें करती थीं खुल्ल-खुल्ल.


हम दुखी रहे यह सोच-सोच
तुम बैठ गये होकर निराश.
अथवा आते हो नहीं स्वयं
भयभीत कर रहा नेह पाश.


जैसे बदले हैं भवन कई
तुमने दो-दो दिन कर निवास.
वैसे ही क्या अब बदल रहे
चुपचाप छोड़ निज उर-निवास.


फिर भी लेते हैं ढूँढ नयन
तुमको, चाहे कर लो प्रवास.
होते उर में यदि भवन कई
तुम भवन बदलते वहीं, काश!

18 टिप्‍पणियां:

boletobindas ने कहा…

भाई प्रतुल
आपके ब्लॉग पर आता कम ही हूं इसके लिए क्षमा करेंगे। पर जब भी आता हूं जमकर आपकी कविता के बहाव में अठखेलियां करता हूं। आपने तो पिकनद व्यवस्था से नए सिरे से परिचित कराया तो लगा कि कोई अपना जो भूला सा था, आसपास था फिर से मिल गया। उसपर बादल पर ऋतुओं का चिल्लानाकि औ भैया....कितना सहज है..कहना ही क्या। प्रियतमे से मिलने वाली बाधा को सरलतम शब्द में कहा है। अपने को मेघो ने कितना तंग किया था ये फिर याद दिला दिया...मेरी एक पुरानी कविता है पिछली पोस्ट में ..लगी आज फिर वो सावन की झड़ी है 11 साल पुरानी। (कविता या जो भी है) बाकी रहा अनुप्रास का भेद तो भैया ये हमारी समझ में नहीं आया, क्योंकि इस मामले में हमारा दिमाग कमजोर तो नहीं ता पर इसने पेपर में काफी तंग किया था इसलिए इससे रुठे हुए हैं आजतक तो राजेंद्र जी की बात ही सुनना और मानना। अपन तो कुछ नहीं कह सकते। ....”मुझसे तुम घृणा करो चाहे” की पहली पंक्तियों की आखरी लाइन में ..तुम दो जो तुमसे सके बन...मैं कुछ लय टूटती सी लग रही है....। इसके अलावा पूरी कविता सीधी सरल औऱ जबरदस्त है। तीसरी लाइन की आखरी दोनो पंक्तियां वहीं पहुंचती लगी रही हैं जहां कहीं सुमित्रानंदन पंत पहुंचते हैं दोस्त....अंत आते आते वहीं से कुछ बटोर लाते हो..कल्पना है अपनी.सब कुछ अभाव में देती है...वाह भाई वाह....एक बात बताउं मित्र जरुरी नहीं कि हर परिचय स्वार्थपूर्ण संबंध में तब्दील हो जाए और स्थायी संबंध और पवित्र संबंध बनने में पूरा जीवन लग जाए। ये तो अपनी अपनी नियत पर है। अपना तो आपकी कविताओं से स्थायी संबंध बना रहे ये दुआ है। वैसे अपन किसी का पीछा जल्दी नहीं छोड़ते....(हजार कोस तक लोग कहते तो हैं ऐसा)
प्रेमोन्माद में महादेवी वर्मा की झलक लग रही है भाई। या शायद भावों में। मुझे तो लगा..। “हमने ले लिया है क्षणिक सुख” में लगा खुद ही टहल रहा हूं। दोस्त एक बात है आप लिखते हुए अक्सर नव प्रयोग करते हुए आसान शब्दों में खेलते हुए गूढ़ शब्दों को बड़ी माला में पिरोने की खूबसूरत कोशिश करते हैं। प्रयास में लगे रहें। अलंकारों की भाषा को समझना आज लोगो के लिए दुरह हो गया है। कारण ये है कि मूलभूत शिक्षा ही कमजोर होती जा रही है। शब्दों से खेलने की जगह कम्पयूटर पर गेम खेलने में समय लग रहा है। पश्चिचम अपनी भाषा के वर्चस्व के बाद अब पूर्व की भाषा सीख रहा है......। पर हम लोग अपनी भाषा को हाशिए पर पहुंचाने के बाद पाशाचात्य भाषा में पारंगत होने में विश्वास रखते हैं। ऐसे में अपनी भाषा की खूबसूरती को बचाए रखने की आप जो कोशिश कर रहे हैं उसमें लगे रहे भाई।

boletobindas ने कहा…
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boletobindas ने कहा…

भाई प्रतुल
आपके ब्लॉग पर आता कम ही हूं इसके लिए क्षमा करेंगे। पर जब भी आता हूं आपकी कविता के बहाव में खूब अठखेलियां करता हूं। पिकनद व्यवस्था से लगा जैसे नए सिरे से परिचित हो गया हूं...वो कोई अपना जो भूला सा था, आसपास था फिर से मिल गया। उसपर बादल पर ऋतुओं का चिल्लाना “औ भैया....”कितना सहज है..कहना ही क्या। प्रियतमे से मिलने वाली बाधा को सरलतम शब्द में कहा है। अपन को मेघो ने कितना तंग किया था ये फिर याद दिला दिया..पुरानी रग छेड़ दी....मेरी एक पुरानी कविता है पिछली पोस्ट में (कविता या जो भी है).. “लगी आज फिर वो सावन की झड़ी है” 11 साल पुरानी, हो सके तो पढ़ लेना.. बाकी रहा अनुप्रास का भेद तो भैया ये हमारी समझ में नहीं आया....इस मामले में हमारा दिमाग कमजोर तो नहीं था..पर वो क्या है न कि इसने पेपर में काफी तंग किया था इसलिए इससे रुठे हुए हैं आजतक..सो अपन तो कुछ नहीं कह सकते। ....एक और कविता ”मुझसे तुम घृणा करो चाहे” की पहली पंक्तियों की आखरी लाइन में ..तुम दो जो तुमसे सके बन...मैं कुछ लय टूटती सी लग रही है....। इसके अलावा पूरी कविता सीधी सरल औऱ जबरदस्त है। तीसरी लाइन की आखरी दोनो पंक्तियां वहीं पहुंचती लग रही हैं जहां कहीं सुमित्रानंदन पंत रहते हैं दोस्त....अंत आते आते लगता है वहीं से कुछ बटोर लाये हो...अंतिम में कल्पना...सही में भाई मेरे वो ही अपनी होती है...सब कुछ अभाव में देती है....फिर से वाह....वैसे एक बात बताउं मित्र जरुरी नहीं कि हर परिचय स्वार्थपूर्ण संबंध में तब्दील हो जाए और स्थायी संबंध और पवित्र संबंध बनने में पूरा जीवन लग जाए। ये तो अपनी-अपनी नियत पर है। हमारा तो आपकी कविताओं से स्थायी संबंध बना रहे ये दुआ है...वैसे अपन किसी का पीछा जल्दी नहीं छोड़ते....(हजार कोस तक लोग कहते तो हैं ऐसा) प्रेमोन्माद में महादेवी वर्मा की झलक लग रही है भाई..या शायद भावों में..कह नहीं सकता..पर मुझे लग रहा है..। “हमने ले लिया है क्षणिक सुख” में लगा हर लाइन में लगा जैसे खुद ही टहल रहा हूं। दोस्त एक बात है आप लिखते हुए अक्सर नव प्रयोग करते हुए आसान शब्दों में खेलते हुए गूढ़ शब्दों को बड़ी आसानी से माला में मोती पिरोने की खूबसूरत कोशिश करते हैं। अलंकारों की भाषा को समझना आज लोगो के लिए दुरह हो गया है। कारण ये है कि मूलभूत शिक्षा ही कमजोर होती जा रही है। शब्दों से खेलने की जगह कम्पयूटर पर गेम खेलने में समय लग रहा है। पश्चिचम अपनी भाषा के वर्चस्व के बाद अब पूर्व की भाषा सीख रहा है......। पर हम लोग अपनी भाषा का बंटाधार करके और उसे हाशिए पर पहुंचाने के बाद पाशाचात्य भाषा में पारंगत होने में विश्वास रखते हैं। ऐसे में अपनी भाषा की खूबसूरती को बचाए रखने की आप जो कोशिश कर रहे हैं उसमें लगे रहो बिरादर। खूशबू धीरे-धीरे ही फैलेगी। इसका अंदाज तो आपने खैर पहले ही लगा लिया है.....।

हीहीहीही बात कुछ लंबी हो गई.....लगता है कुछ ज्यादा ही बोलने लगा हूं आजकल...लेकिन क्या करुं जो दिल से सीधे निकला वो कह डाला.....खैर जो है सो है अब...।

boletobindas ने कहा…

पोस्ट से बड़ी टिप्पणी का रिकॉर्ड तो नहीं बन गया भाई मेरे

kunwarji's ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
kunwarji's ने कहा…

राम राम जी...

निरन्तर नहीं आना हो रहा है तो बताओ इस पर मै क्या कहूं...

आज जो ब्लॉग पर लिखा गया वो शायद ये भी कहना चाह रहा है कि आपको पढने के बाद क्या कुछ कैसे हो जाता है.....

आपके काव्य सौंदर्य के बारे में तो बोलने वाले बहुत बिंदास बोले है....

वैसे भी उधर कोई टिप्पणी मेरे जैस मूर्ख करे तो भी वो तो उचित नहीं होगा....बस आप ऐसे ही हमें क्षणिक सुख के आनंद की अनुभूतिया करवाते रहे....

अमित भाई साहब कहाँ है आज-कल?

कुंवर जी,

Pratul ने कहा…

रोहित जी,
आपने भावों के प्रवाह में काफी कुछ कह दिया, प्रवाह ऐसा ही तो होता है जिसमें आकार बाधा नहीं बनती. इतना प्रेम झलका आपके भावों से कि नहा गया.
कुछ बातें आपको अखरीं. उनका स्पष्टीकरण देना चाहता हूँ :
१] ......... अनुप्रास का भेद तो भैया ये हमारी समझ में नहीं आया,
@ जहाँ एक जैसे वर्णों [अक्षरों] का बार-बार प्रयोग आये वहाँ अनुप्रास होता है. इसके कई भेद हैं. अब तक पाँच भेद थे. मैं छठा भेद करके इतरा रहा हूँ. बस इतनी-सी बात है.
२] ..... पहली पंक्तियों की आखरी लाइन में ..तुम दो जो तुमसे सके बन...मैं कुछ लय टूटती सी लग रही है....।
@ यहाँ होना तो चाहिए था 'तुम दो जो तुमसे बन सके', लेकिन तुक भिड़ाने में मैंने उसे 'तुम दो जो तुमसे सके बने' कर दिया, दूसरी बात 'बन' के स्थान पर 'बने' लिखा है, और बलाघात 'सके' पर दिया है. यह एक मनोभाव है जिसमें हम अन्य से कहते हैं कि "जो तुमसे हो सके, वो करना". इसी भाव को यहाँ व्याकरण नियमों को तोड़कर व्यक्त किया है. गलती है, लेकिन मुझे कभी-कभी गलती करने में मुख-सुख मिलता है तो कर लेता हूँ. लगता है कि आपकी दृष्टि से आगे बच नहीं पाऊँगा.
३] एक बात बताउं मित्र जरुरी नहीं कि हर परिचय स्वार्थपूर्ण संबंध में तब्दील हो जाए और स्थायी संबंध और पवित्र संबंध बनने में पूरा जीवन लग जाए। ये तो अपनी अपनी नियत पर है।
@ सहमत होना चाहता हूँ लेकिन फिर मन नहीं मानता ..... जैसा समाज में संबंधों का निर्वाह देखा .... तो सूत्र गढ़ लिया.
हाँ, यह भी सही है ......... 'अपनी-अपनी नियत'


आपकी कविता पढूँगा, वही ११ साल पुरानी, "लगी आज फिर वो सावन की झड़ी है".

Pratul ने कहा…

# अलंकारों की भाषा को समझना आज लोगो के लिए दुरह हो गया है। कारण ये है कि मूलभूत शिक्षा ही कमजोर होती जा रही है। शब्दों से खेलने की जगह कम्पयूटर पर गेम खेलने में समय लग रहा है।

@ वास्तविकता बयाँ की आपने. फिर भी मेरे ब्लॉग का उद्देश्य यही है कि अलंकारों की तरफ ध्यान करवा पाऊँ.
मैं अलंकारों की परिभाषा को कुछ विस्तार देना चाहता हूँ.
"जो हमारी होती क्रिया को रोक दे, वह अलंकार है."
'अलम' अर्थात रोकना/ रुकावट/ समाप्त;
'कार' मतलब करने वाला/ कर्ता.
पूरा अर्थ हुआ ........ रोकने वाला, रुकावट डालने वाला.
जैसे विचारों को व्यक्त करते समय वाक्यों के बीच-बीच में अर्धविराम, विराम आदि चिह्न हमारे विचारों को भली-भाँति व्यक्त करते हैं, हमें पलभर का विश्राम विचारों के प्रति जोड़ देता है. या कहें, समझने में सुविधा देता है.
वैसे ही 'अलंकार' कविता के पाठकों को क्षण भर रोकता है. ध्यान को आकृष्ट कर्ता है. यह कार्य कभी-कभी इतनी तीव्रता से होता है कि हमें पता नहीं चलता कि हमारे भीतर क्या कार्य हुआ. हमारी दृष्टि की जड़ता और हमारी समझ का यह विश्राम कविता में छिपे सौन्दर्य को देखकर जड़ हो जाता है. यह क्रिया शब्द और अर्थ दोनों के स्तर पर होती है. यहाँ बाह्य क्रियायें रुक जाती हैं और आंतरिक क्रियायें घटित होने लगती हैं.

>>>> शायद मैं अपनी बात कह पाया, रोहित जी.

Pratul ने कहा…

मैं शब्दों के साथ हलंत नहीं लगा पा रहा हूँ. मुखे काफी अखर रहा है. यदि मालूम हो तो बतायें.

Pratul ने कहा…

राम राम कुंवरजी,
"आपके आने में उल्लास, छिपा देता मुझको संकेत, बसाना है अब प्रेम-निकेत."
अपनी सुविधा हो, तभी आना चाहिए, जबरन कभी नहीं, भाव कृत्रिम हुए तो व्यक्त करने का लाभ नहीं.
अमित जी के आने की प्रतीक्षा है, वे सामाजिक कार्यों को समय दे रहे हैं, जो ब्लॉग में आने से अधिक जरूरी हैं.
जीवन की गतिविधियाँ रोककर ब्लोगिंग नहीं करनी चाहिए.

ZEAL ने कहा…

.
प्रतुल जी,
मुझे कविता की ज्यादा समझ नहीं , इसलिए मेरी टिपण्णी शायद कविता के साथ न्याय न कर सके। रोहित जी और अमित जी तो पारखी निकले। मुझे तो बस 'क्षणिक-सुख ' की 'फेस- वैल्यू ' समझ आ रही है।

" Life is nothing but few 'moments ' to cherish . "

@-होते उर में यदि भवन कई
तुम भवन बदलते वहीं, काश!

उद्धव , मनं न भये दस-बीस !

ZEAL
.

Pratul ने कहा…

दिव्या जी,
#मुझे कविता की ज्यादा समझ नहीं....
[१] काव्य-जगत में दो प्रकार के जीव विशेष महत्व रखते हैं. पहला जीव कवि होता है. दूसरा जीव प्रेरणा.
प्रायः प्रेरणाओं को कवि द्वारा किये कर्म पर यही बोलते पाया जाता है कि उसे कविता की समझ नहीं.
और वैसे भी प्रेरणाओं को कविता समझने की आवश्यकता होती भी नहीं. वह बस प्रेरित करती रहे. उसका कर्तव्य समाप्त.
यदि जिस दिन प्रेरणा कविता समझने लग गयी तो अन-अर्थ हो जाएगा.

# रोहित जी और अमित जी तो पारखी निकले।
[२] रोहित जी तो हित चाहते ही हैं कविता का. अमित जी का उल्लेख भर है कुँवरजी को की गयी टिप्पणी में, उपस्थिति नहीं हुई है. वे अभी गैर-हाज़िर हैं.

# मुझे तो बस 'क्षणिक-सुख ' की 'फेस- वैल्यू ' समझ आ रही है।
[३] हाँ, ठीक पहचाना, 'क्षणिक सुख' मुख-दर्शन का मूल्य ही है.

# उद्धव, मनं न भये दस-बीस!
[४] है निज उर में बहुत खाली जगह, एक क्या अनेक बस सकते वहाँ,
उद्धव जी को जिन गोपियों ने अपनी विवशता बतलायी 'मन न भये दस-बीस'. यह तो उनका एकांगी प्रेम था, केवल कृष्ण के लिये.
लेकिन कृष्ण का प्रेम वृहत था, सृष्टि भर के लिये उन्होंने एक-भाव से प्रेम को निभाया. कुब्जा हो किवा रुक्मनी सब एक समान हो गये थे प्रेम के वृहत स्तर पर.
[कवियों की कपोल-कल्पित कृष्ण-कथाओं के आधार पर बात कही है लेकिन प्रेम का उदात्त रूप देखा जाए तो वहीं है.]

ZEAL ने कहा…

.
प्रतुल जी,

गोपिकाओं का प्रेम मानवीय था, कृष्ण का प्रेम ईश्वरीय। इसलिए यदि हम सांसारिक प्रेम की बात करें , तो गोपिकाओं का प्रेम स्तुत्य है। आपकी 'प्रेरणा' वाली बात से एकमत हूँ।

यदि 'उदात्त' का अर्थ बता दें तो आभारी रहूंगी.
..

Pratul ने कहा…

'उदात्त' का प्रायोगिक अर्थ है :
'ऊँचे आसन पर बैठा'
सीधा अर्थ है :
ऊँचा या बड़ा
व्यापक अर्थ है :
अधिक विस्तृत, संकुचितता से हटकर, दायरे से बाहर
निहितार्थ है :
कुंठाओं से निकला, मुक्त, निस्पृह
— शब्दकोश में शायद ये अर्थ न भी हों, लेकिन शब्द के 'अर्थ' दृष्टिकोणों पर भी आधारित होते हैं.

ZEAL ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अमित शर्मा ने कहा…

@जब थे नयनों से दूर बहुत
यादें करती थीं खुल्ल-खुल्ल.
बहुत कुछ मेरी परिस्थिति लग रही है मुझे, जो इतने दिन ब्लॉग जगत से दूर रहने पर महसूस किया मैंने. स्नेहियों के बिछोह में यादें खुल्ल खुल्ल किया करती थी.

ZEAL ने कहा…

Thanks for telling the meaning.

मो सम कौन ? ने कहा…

धीरे धीरे एक चौपाल सी बनती जा रही है यहाँ। संगोष्ठी ज्यादा उपयुक्त शब्द लगता है लेकिन चौपाल में अपनापन सा लगता है।
अमित के साथ अब रोहित भी, बल्ले बल्ले।
हम कविता के पारखी नहीं, लेकिन आनन्द ले लेते हैं।
कमेंट्स से आनंद द्विगुणित हो रहा है।
सभी धन्यवाद के पात्र हैं।