मंगलवार, 17 अगस्त 2010

"क्यू"

इन नयनों का इतिहास आपका सरल नहीं लगता दुरूह.
नर्तन विस्फारित नयन करें क्यूँ सम्मुख शिष्यों के समूह.
आँखों की भाषा सरल समझ आने वाला सौन्दर्य-व्यूह.
पर समझ नहीं पाता जल्दी उदगार आपके मैं दुरूह.
सुन कथन आपके मैं सोचूँ — "माँ सरस्वती में कौन रूह".
श्रद्धा के शब्दों की हृत में पूजा करने को लगी 'क्यू'.

[मैं हिंदी ओनर्स का विद्यार्थी कोलिज के दिनों में जब एक बार गलती से इतिहास की कक्षा में जा बैठा तो वहाँ
डॉ. पूजा जी हिस्टरी ओनर्स के स्टुडेंट्स की क्लास ले रहीं थीं. माध्यम इंग्लिश था. मेरे जो समझ आया मैंने वह कार्य करना शुरू किया. यह कविता इसी का नतीजा है.]

एक पुरानी रचना

7 टिप्‍पणियां:

boletobindas ने कहा…

पूरी जुलाई में 12, आधे अगस्त में 13.......इस पर इतिहास की आंखों की जगह आंखो का ही इतिहास टटोलने लगे बिरादर ...

Pratul ने कहा…

रोहित जी,
कृतार्थ हुआ. 'एकमात्र' होने का भी अपना सुख है, ईश्वर एकमात्र, सौर्य-मंडल का सूर्य एकमात्र, काफी कुछ एकमात्र है जो अपना महत्व बनाए हुए है. फिर एकमात्र टिप्पणी मिले तो खलता नहीं, हाँ पत्नी को ज़रूर बुरा लगने लगा है. और वह इस टिप्पणी-प्रतिस्पर्धा में मुझे पिछड़ता देख दुखी रहती है. उसे मैं तरह-तरह से समझाता हूँ. लेकिन यह प्रयास मुझे हर रोज करना पड़ता है.
पूरे जुलाई में १२ और अगस्त में १३ यह उतार-चढ़ाव केवल व्यस्तता में आती कमी व अधिकता के कारण से आया है. नयनों का इतिहास तो मुझे सदा से लुभाता रहा है. ऐसे में अपने इतिहास पर नज़र नहीं जाती.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

इन नयनों का इतिहास आपका सरल नहीं लगता दुरूह.
नर्तन विस्फारित नयन करें क्यूँ सम्मुख शिष्यों के समूह.
आँखों की भाषा सरल समझ आने वाला सौन्दर्य-व्यूह.
पर समझ नहीं पाता जल्दी उदगार आपके मैं दुरूह.

हा...हा...हा.....उस बेचारी शिक्षिका को तो दिखा देते उस पर क्या लिखा है ......!!

और ये 'श्रृद्धा' का अर्थ बतायेंगे ....?
और ये 'क्यू'....?

आने में जरा देर हुई ....क्षमा .....!!

Pratul ने कहा…

हरकीरत जी,
@ उनका चेहरा आज भी ज्यूँ का त्यूँ मानस में है. जहाँ तक उन्हें कविता को दिखाने का सवाल है वह प्रयास तो मैं आज भी नहीं कर पाता.

और ये 'श्रृद्धा' का अर्थ बतायेंगे ....?
@ 'श्रद्धा' का अर्थ :
यहाँ एक चित्र मेरे मानस में उपजा 'माँ सरस्वती का, जो अंग्रेजी में बोल रही हैं' और मैं सोच रहा हूँ कि माँ सरस्वती कि आत्मा हिंदी-प्रेमी है या अंग्रेजी-प्रेमी.
मेरे मन में श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिये भाँति-भाँति के शब्दों की एक 'Q' [क्यू] लग गयी :
लाइन में खड़े थे : नमस्ते, चरण-स्पर्श, पेरी पौना, प्रणाम, पाँव लागी, गोड लागी, माँ आशीर्वाद दो, मैं तेरा सच्चा पुजारी.

@ हरकीरत जी, मेरी वह शिक्षिका बिलकुल नहीं थी बेचारी.
उस सौन्दर्य के व्यूह में आज तक मन उलझा है.
@ हरकीरत जी, आपका आना वैसा ही जैसे कि जिह्वा पर कभी-कभी सरस्वती का बैठना.
इसलिये क्षमा नहीं मांगें. वह तो मेरे पास नहीं.

Avinash Chandra ने कहा…

सुन कथन आपके मैं सोचूँ — "माँ सरस्वती में कौन रूह".
श्रद्धा के शब्दों की हृत में पूजा करने को लगी 'क्यू'.

अद्भुत शब्द हैं... "क्यू" में लगे ये श्रद्धा के शब्द.
आपको सिर्फ आभार व्यक्त कर सकता हूँ ऐसे सुन्दर लेखन पर...

Dhirendra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ajit gupta ने कहा…

जब क्‍लास में कुछ समझ नहीं आता तो कविता का ही जन्‍म होता है।