बुधवार, 28 जुलाई 2010

कपोल-लली-२

खोलो अवगुंठन नहीं लली
तुम हो कपोल की कुंद कली.
लावण्य लूटने को मेरी
आँखें बन आती आज अली.

ओ रूप-पराग-गर्विते! सुन,
तुम अवगुंठन में बंद भली.
मत सोचो कभी निकलने का
बाहर बैठे निज नयन छली.

[कपोल-लली — लज्जा, अली — भ्रमर]

4 टिप्‍पणियां:

Avinash Chandra ने कहा…

क्या लय..क्या प्रवाह...मन हर्षित हुआ.

Avinash Chandra ने कहा…

क्या लय..क्या प्रवाह...मन हर्षित हुआ.

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

सुन्दर कविता.

अमित शर्मा ने कहा…

सुन्दर कविता.