शुक्रवार, 21 मई 2010

लज्जा : नारी का अभेद्य कवच

यदि लज्जा ही निर्लज्ज होकर
घूमेगी घर के आँगन में.
तो स्वयं नयन की मर्यादा
भागेगी छिपने कानन में.

यदि लज्जा ही मुख चूमन को
लिपटेगी अपनी काया से.
तो कैसे आकर्षित होंगे 'चख'
ह्री की श्रीयुत माया से.

यदि लज्जा ही अवगुंठन की
आलोचक बन जाए भारी.
तो कौन कवच ऐसा होगा
होगी जिसमें निर्भय नारी.

[श्री देव कुमार झा के लेख से प्रेरित]

9 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

bahut khoob sir naari ka utthaan bahut jaruri hai...aur use bhi apni swatantrta ka arth samajhna hoga...kahin wo uchchrinkhal na ho jaaye...

महफूज़ अली ने कहा…

Very Good..

kunwarji's ने कहा…

yttam vichaar....

kunwar ji,

देव कुमार झा ने कहा…

प्रतुल जी,
बहुत अच्छे शब्द और बहुत अच्छी भावना।
नारी वास्तव मे विधाता की सबसे अनमोल रचना है, नारी जननी है... नारी संसार का मूल है... नारी का आभूषण लज्जा और उसकी शीलता है।

यदि लज्जा ही अवगुंठन की
आलोचक बन जाए भारी.
तो कौन कवच ऐसा होगा
होगी जिसमें निर्भय नारी.

बहुत अच्छी प्रस्तुति... नारी पर लिखी श्रेष्ठतम कविताओं में से एक...

zeal ने कहा…

"Lajja' nari ka kawach nahi, gehna hai.

And yes, Only an aware and empowered woman is safe.

Divya

अमित शर्मा ने कहा…

तो स्वयं नयन की मर्यादा
भागेगी छिपने कानन में.

bhag chuki hai abtak jo bachi hai, sirf parchayi hai!

Pratul ने कहा…

दिव्या जी, नमस्ते.
हाँ, बिलकुल सही बात है कि सशक्त और जागृत महिला ही सुरक्षित रह सकती है. गहना यदि केवल सजने और सँवरने के लिये होता है तो इसका मतलब गरीब महिला गहनों के अभाव में सज-सँवर ही नहीं सकती; और यदि रिझाने के लिये होता है तो रूप के महात्म्य को कम कर देता है.

एक स्वामी जी गंभीर बहुत रहते थे. स्वामी जी की गंभीरता उनके प्रवचनों के लिये अच्छा वातावरण तैयार कर देती थी. गंभीरता कहने को उनकी वाणी का आभूषण थी. कहने को मधुर वचन भी वाणी का ही आभूषण होते हैं. और यही आभूषण उनके व्यक्तित्व का कवच भी थे. कवच का कार्य सुरक्षा देने का होता है. अब उनके इस कवच से क्या चीज़ सुरक्षित थी? सोचिये.

उनके इस कवच से सुरक्षित था उनका आदर, उनका सम्मान और उनके प्रति भक्त लोगों का आस्था-विश्वास.

इसी तरह नारी का लज्जा आभूषण तो है किन्तु यही आभूषण उसके नारीत्व की सुरक्षा भी करता है. सोचिये कैसे?

zeal ने कहा…

Pratul ji,

I agree with your points.They are indeed carrying a deeper meaning but try to see one another aspect also.

'Lajja' is her aabhushan, her beauty, her virtue. It makes her more faminine. Still i beg to differ with you on that particular mention.

Only wisdom, awareness, intellect and presence of mind can be her shield.

Lajja nari ka..
Aabhushan hai,
Gehna hai,
Gun hai,
Saundarya hai
lekin..
Kawach nahi hai.

'Lajja', enhances the beauty of a woman and a beautiful lady is always at risk.

But Pratul ji, I am not contradicting with you. You have written a wonderful poem and made prominent the most beautiful virtue of a woman.

aabhar !

Arvind Mishra ने कहा…

सुनदर कविता, जील का परिशिष्ट भी विचार योग्य !